Saturday, 19 April 2025

संघ का प्रचार विभाग: एक परिचय         अशोक कुमार सिन्हा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना भारत के नागपुर में वर्ष 1925 में डा. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी । संघ स्थापना का मूल उद्देश्य सम्पूर्ण हिंदू समाज का संगठन एवं व्यक्ति निर्माण करना था । चरित्रवान,अनुशासित,राष्ट्रभक्त समाज खड़ा करना चाहता है संघ ।हिंदू समाज का अर्थ है सम्पूर्ण समाज जो भारत को अपना देश ,अपनी मातृ/ पितृ भूमि मानता हो , उसकी परंपराओं के प्रति , उसके ऐतिहासिक महापुरुषों के प्रति , देश की सुरक्षा और उसके समृद्धि के प्रति,जिनकी अव्यभिचारी एवं एकान्तिक निष्ठा हो -वे जन हिंदू व राष्ट्रीय कहे जायेंगे, चाहे उनकी उपासना पद्धति अलग अलग ही क्यों न हो ।संघ उस समाज को भी संगठित करना चाहता है जो टेक्नीकली भारत का नागरिक बन कर रहना चाहते हैं ।वे सब हिंदू ही कहे जाएँगे । हिंदू ही इस राष्ट्र का सबसे अधिक जिम्मेदार नागरिक है क्यों कि इस देश का भाग्य और भविष्य हिंदुओं से ही जुड़ा हुआ है । हिंदू यह नाम है राष्ट्र का । वह राष्ट्र का रूप और प्राण है । हिंदुओं का संगठन अर्थात राष्ट्रीय संगठन ।संघ का उद्देश्य अपने इस भारत को दुनिया का एक सर्वश्रेष्ठ देश बनाना है ।ज्ञान विज्ञान ,अर्थ एवं सुरक्षा की दृष्टि में यह देश स्वावलंबी , अजेय और संपन्न हो । इसी कामना से प्रतिदिन शाखा के माध्यम से संघ व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन का कार्य करता है । संघ का स्वयंसेवक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संगठन खड़ा कर के सेवा का कार्य करता है ।

          संघ अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे करने जा रहा है । संघ स्थापना काल के समय जो परिस्थितियाँ थी उनमें समय -समय पर बदलाव होते रहे । संघ पहले प्रचार परांमुख था । देश सेवा ,समाज सेवा और मातृभक्ति को वह प्रचार का विषय नहीं मानता है । आज भी वह समस्त समाजसेवा के कार्य को सम्पूर्ण समाज के सहयोग से ही करता है अतः प्रचार कर के श्रेय अकेले संघ नहीं लेना चाहता है। कार्य करने से जो स्वयं प्रसिद्धि प्राप्त हो वही प्रचार है । जितना कार्य उसकी ही प्रसिद्धि समाज में हो , यही उचित है। इसी लिए संघ अनावश्यक प्रचार न करते हुए कार्य करने में विश्वास रखता है । परंतु संघ की बढ़ती प्रगति , कार्य व लोकप्रियता से अनेक लोगों के आँख की किरकिरी भी यह संगठन बना । जो शक्तियाँ देश विदेश में भारत को संगठित और शक्तिशाली होते नहीं देखना चाहती थीं, उनके नज़र में संघ भी खटकने लगा । देश के अंदर भी जिनके राजनैतिक हित, वोट बैंक और तुष्टिकरण के उपर संकट आने लगा , वे अपने भी संघ के उपर आरोप लगाने लगे । वामपंथियों ने तो लगातार संघ के उपर प्रहार करना जारी रक्खा।संघ पर देश में तीन बार प्रतिबंध लगे परंतु संघ हर बार सत्य की परीक्षा में उबरा और उसपर से प्रतिबंध लगाने वालो ने ही प्रतिबंध हटाया । संघ के समक्ष कई बार परिस्थितियां बदली ।देश का विभाजन हुआ , कई बार देश पर विदेशी आक्रमण हुए , समाज को बाँटने का प्रयत्न हुआ , घुसपैठ, मतांतरण , लव जिहाद , दंगे, रामजन्मभूमि आंदोलन ,इतिहास का विकृतिकरण , आपातकाल का दंश और हिंदू समाज पर अनेकों प्रहार हुए । प्राकृतिक आपदाएं आई परंतु संघ अविचल देश और समाज की सेवा में लगा रहा और समाज को सचेत करते हुए उसे संगठित करने का कार्य करता रहा । देश के उपर के आए हर संकट पर संघ समाज के साथ कंधे से कंधा मिला कर डटा रहा । अपने अपर लगे आरोपों का समय समय पर प्रतिउत्तर भी देता रहा । 

       भूमण्डलीकरण के कारण संचार व्यवस्था में क्रांति आई । 1948 में बालेश्वर अग्रवाल नामक एक स्वयंसेवक ने संघ के सहयोग से हिन्दुस्थान समाचार नामक एन न्यूज़ एजेंसी खड़ा किया ।उस समय संघ छोटा था , धनाभाव था परंतु हिन्दुस्थान समाचार की तकनीकी सबसे अच्छी थी । हिंदी में सत्य समाचारों का प्रेषण होने लगा । फिर प्रिंट मीडिया आई, समाचार पत्र आया , दृश्य संवाद आया । जानता तक पहुँच बढ़ी । रेडियो , दूरदर्शन , TV, इंटरनेट का युग आया।मोबाइल युग आया और आज देश में 120 करोड़ लोगों से अधिक के पास इंटरनेट मोबाइल है। सोशल मीडिया युग में आर्टिफीसियल इंटेलजेंस का प्रवेश हो चुका है ।समाज प्रबोधन में संघ ने भी इन सब साधनों का प्रयोग किया है ।

       संघ ने भी अपने संगठन में परिवर्तन किया है । शताब्दी वर्ष आते- आते 6 कार्य विभाग क्रमशः शारीरिक,बौद्धिक,व्यवस्था,संपर्क , सेवा एवं प्रचार विभाग कार्यरत हैं। 8 गतिविधियों में क्रमशः कुटुंब प्रबोधन ,गो सेवा, समग्र ग्राम्य विकास,सामाजिक समरसता,धर्म जागरण , सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण और मुख्य मार्ग विस्तार । 43 सम वैचारिक संगठन जो 6 समूहों में विभाजित किए गए हैं यथा वैचारिक,शिक्षा,आर्थिक , सामाजिक , सेवा एवं सुरक्षा समूह के अंतर्गत आते हैं । डेढ़ लाख से अधिक सेवा कार्य सम्पूर्ण देश में स्वयंसेवकों एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा संचालित हैं ।उनहत्तर हज़ार से अधिक स्थानों पर दैनिक प्रातः एवं सायं शाखाएं लगतीं है। सैतीस हज़ार साप्ताहिक मिलन, सत्रह हज़ार मासिक मिलन,व मंडली संचालित हैं। सम्पूर्ण विश्व को पाँच भागों में विभक्त कर विदेशों में तीन हज़ार से अधिक स्थानों पर भारतीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू स्वयंसेवक संघ नाम से विदेश विभाग शाखाएं संचालित कर रहा है।संघ के शताब्दी वर्ष में पंचप्रण नामक पंचमुखी कार्य योजना कार्यान्वित की जा रही है जो क्रमशः सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण , स्वदेशी भाव जागरण एवं नागरिक कर्तव्य के रूप में संचालित है। इसके अतिरिक्त विमर्श एवं सज्जन शक्ति संपर्क, समन्वय भाव जागरण का भी कार्य सम्पादित किया जा रहा है।

       रामजन्मभूमि आंदोलन के समय 1992 में अयोध्या में ग्राउंड जीरो से सम्पूर्ण विश्व को त्वरित समाचार हिंदी और अंग्रेजी में उपलब्ध कराने के उद्येश्य से प्रथम विश्व संवाद केंद्र स्थापित किया गया था जो बाद में लखनऊ में ट्रस्ट के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया था । आज ऐसा ही विश्व संवाद केंद्र 35 की संख्या में सम्पूर्ण भारत के सभी प्रदेशों में अपनी भवनों में स्थापित एवं संचालित हैं।यहाँ से विभिन्न पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन ,प्रेस वार्ता, नारद जयंती, विभिन्न महापुरुषों की जयंतियाँ, पत्रकार मिलन एवं सम्पर्क, गोष्ठियां आदि संचालित हो रहें है।

         संघ के छ कार्य विभाग के अंतर्गत प्रचार विभाग की जो स्थापना सम्पूर्ण भारत में की गई है उसका आज भी उद्देश्य राष्ट्रीय विचारों का प्रसार करना ,राष्ट्र विरोधी विभाजनकारी अलगाववादी शक्तियों के प्रति समाज में जागरूकता निर्माण और हिंदुत्व की सकारात्मक बातें, तथ्यात्मक जानकारी मीडिया के माध्यम से समाज तक पहुंचाना है। प्रचार विभाग का कार्य संघ का प्रचार करना या किसी व्यक्ति का प्रचार करना नहीं है। संघ की कार्य पद्दति ही प्रचार है । 

          प्रचार की जो पद्धति अपनायी जाती है उनमें प्रमुख हैं :- सोशल एवं इलेट्रानिक मीडिया के उपलब्ध माध्यमों का उपयोग,अपनी समानांतर प्रचार व्यवस्था खड़ा करना ,जहाँ कार्य नहीं वहाँ विचार पहुँचाने के उद्देश्य से जागरण पत्र/पत्रिकाओं का प्रकाशन,पांचजन्य एवं ऑर्गनाइज़र जैसी राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं का प्रकाशन,साहित्य विक्री, कंटेंट जेनरेशन,नागरिक पत्रकारिता प्रशिक्षण,मीडिया संवाद के अंतर्गत पत्रकारों की मीडिया प्रोफ़ाइल तैयार करना,मीडिया के मालिकों से ले कर रिपोर्टरों तक का नाम पता ईमेल,फ़ोन,और उनके विचारों की जानकारी रखना,मीडिया संपर्क का तंत्र विकसित करना, पत्रकारिता के छात्रों से संपर्क व संवाद ,टी वी पैनल डिस्केशंस में अपना विचार रखने वाले कार्यकर्ता का निर्माण करना,नारद जयंती आयोजित कराना,पत्रकारों के लिए संघ परिचय वर्ग तथा मीडिया कॉनक्लेव आयोजन ,संघ के बड़े उत्तरदायित्व धारी अधिकारियों के प्रवास के समय पत्रकारों से उनके निवास या कार्यस्थल पर सम्पर्क कराना ,स्तंभ लेखकों ,संपादकों , ब्लॉगरों, पोर्टल संचालकों से संपर्क , साहित्योसव मनाना, फ़िल्म महोत्सव का आयोजन करना , शाखा / नगर स्तर तक प्रचार दायित्वधारी बनाना , तथा प्रचार कार्यालयों की स्थापना , संसाधन, टेक्नोलॉजी , आर्थिक व्यवस्था , क़ानूनी व्यवस्था तथा प्रचार के सभी 

 की टोली खड़ी करना व वार्षिक कैलेंडर बनाना ।

       प्रचार विभाग के नौ आयाम तथा प्रांत स्तर तक आयाम प्रमुखों को दायित्व सौपना भी प्रचार विभाग का कार्य है । ये नौ आयाम है क्रमशः जागरण पत्रिका, सोशल मीडिया,स्तंभ लेखक,फ़िल्म , कार्यालय व्यवस्था,साप्ताहिक पत्रिका,साहित्य विक्री,कंटेंट जेनेरेशन तथा मीडिया संवाद ।

      अखिल भारतीय स्तर से ले कर नगर स्तर तक सम्पूर्ण भारत में प्रचार प्रमुख का गठन है । प्रांत स्तर पर डाटा बैंक , आर्काइव्स प्रकोष्ठ स्थापना , पुस्तकालयों की स्थापना , मीडिया मानेटरिंग का कार्य , पेपर कटिंग , समाचार तथा सूचनाओं का प्रेषण , फोटोग्राफी व वीडियो कैमरों का संचालन कार्य संपन्न होता है । यथा आवश्यकता वीडियो एवं साउंड स्टूडियो भी संचालित है। कम्युनिटी रेडियो स्टेशन का भी संचालन अपेक्षित रहता है।रेडियो जॉकी से भी संपर्क तथा उन्हें सांस्कृतिक , महापुरुषों की जीवनियाँ आदि उपलब्ध कराया जाता है।टीवी सीरियल निर्माता , फ़िल्म निर्माताओं , फ़िल्म निर्देशकों , फ़िल्म लेखकों आदि से भी सम्पर्क कर के उनको देशभक्ति पूर्ण निर्माण एवं लेखन के प्रति प्रेरणा देने का अनुरोध किया जाता है । फ़िल्मों में भी भारतीय विचारमूल्य दिखे यह अनुरोध रहता है।इन सब कार्यों के लिए अपने कार्यकर्ताओं को बराबर कार्यशालाओं के माध्यम से प्रशिक्षित भी किया जाता है।आज प्रचार कार्यकर्ता पर्यावरण, स्वच्छता,दिव्यांग कल्याण्, नारी स्वाभिमान जागरण,सांस्कृतिक मूल्यों का पुनर्जागरण में सहायता, सहभागिता कर रहा है। 

                        लेखक विश्व संवाद केंद्र लखनऊ के सचिव तथा उत्तर प्रदेश प्रांतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी हैं।


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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कुटुंब प्रबोधन 

          अशोक कुमार सिन्हा 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मूल में राष्ट्रभक्ति,व्यक्ति निर्माण कर हिंदू समाज का संगठन , समाजसेवा ,धर्म एवं संस्कृति रक्षण तथा राष्ट्र को परम् वैभव तक पहुंचाना है।यह कार्य समाज के सहयोग से सर्व समाज को साथ ले कर करने का लक्ष्य है।इस कार्य को पूर्ण करने में परिवार व्यवस्था का जागरण हमारे कार्य का आधार है ।संघ स्थापना के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं तथा इस शताब्दी वर्ष में संपूर्ण समाज के आधारभूत सकारात्मक परिवर्तन हेतु पाँच संकल्प लिए गए हैं जो क्रमशः सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, नागरिक कर्तव्यों का निर्वहन तथा स्व भावना के जागरण नामक परिवर्तन की पंचधारा के नाम से विख्यात् हैं । यह कार्य समाज को कर्तव्यबोध का स्मरण कराने तक सीमित नहीं वरन् स्वयंसेवकों द्वारा अपने आचरण से समाज को राष्ट्रनिर्माण में सहभागी बनाने का एक अभिनव प्रयास है।

       परिवार भारतीय समाज की वह प्रथम कड़ी है जहाँ परिवर्तन की नींव सशक्त बनती है। यह समाज की सशक्त पाठशाला है।यहीं आत्मीयभाव से बालमन पर संस्कार जन्म लेता है।यह एक ऐसी सामाजिक संस्था है जिसपर समाज की नींव टिकी है।जीवन का आनंद लेना है तो परिवार का वातावरण आनंदमय होना चाहिए ।परिवार संबंध बनाए रखने का प्रभावशाली माध्यम है।संपूर्ण समस्याओं का समाधान यहीं है। यहाँ संघर्षों को समझने में सहायता मिलती है।नए नियमों और संयम की स्थापना का केंद्रबिंदु कुटुंब होता है।परिवार के सदस्यों के आत्मविश्वास को यहीं बढ़ावा मिलता है।आचरण के नीतिगत मानदंडों की नींव यही संस्कारित होती है। कुटुंब ही सुखी और स्वस्थ परिवार सहित शांतिपूर्ण समाज की कुंजी है ।भारतीय परिवारों ने अन्य देशों की तुलना में अधिक अनुपालन और लचीलापन दिखाया है ।संस्कारों की नींव मजबूत परिवार की पहचान होती है ।परंतु समय और काल के अनुसार भारतीय संस्कारों के लिए विश्वविख्यात हमारे परिवारों को अनेक परिवर्तनों का सामना भी करना पड़ा है ।नए आर्थिक समीकरणों के कारण परिवार का आकार बदला है ।परिवार अब बड़े नहीं छोटे एकल परिवार होने लगें हैं।विज्ञान के विकास ने नए नए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण परिवारों को उपलब्ध करायें हैं ,जिससे मनुष्य का जीवन आसान बने हैं। सबसे अधिक परिवर्तन मोबाइल के अतिशय प्रयोग से परिवारों में उनके परस्पर संबंधों में आया है । शिक्षा में परिवर्तन आया है जिसके कारण पारिवारिक मूल्यों में गिरावट आई हैं वहीं बच्चे समय से पहले वयस्क विचारों से अवगत हो रहें हैं । यद्यपि बच्चों के ज्ञान प्राप्ति की गति भी तेज हुई है।वे अधिक कुशाग्र बन रहें है।माँ और पिता दोनों के कामकाजी होने पर बच्चों के जीवन एवं संस्कारों पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा है ।विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने की ललक ने परिवारों में आधुनिकता का राग बजा तो है ,तरक्की दिखी तो है परंतु परिवारों ने बहुत कुछ खोया भी है ।हमारे कुटुंब विकास का भारतीय प्रतिमान क्या होगा ? मनुष्य हित में क्या रास्ता चुनना है यह कैसे निर्धारित होगा ? नया ज्ञान रखते हुए नए सृजन का रास्ता चुनना होगा । निर्माणों के पावन युग में हम चरित्र निर्माण न भूलें । अपने राष्ट्र में विकास कर सम्पूर्ण विश्व के लिए हम कल्याणकारी हों , तभी हमारा परिवार और हमारा जीवन सार्थक होगा।

          परिवार में रिश्ते बहुत महत्वपूर्ण होते हैं । रिश्तों पर संकट संस्कृति और राष्ट्र पर संकट होगा ।इसलिए रिश्तों की समझ , जितने रिश्ते उतनें कर्तव्य हैं , यह हमें समझना होगा तभी परिवार अपने उद्देश्य को पूरा कर पायेगा ।भारत को ऐसा राष्ट्र बनाना है की रिश्ते नाते बनाये रखते हुए हमें आर्थिक रूप से अधिक विकसित और समृद्ध बन सकें ।योग से पूरी दुनिया आकर्षित हो रही है । यदि हम कुटुंब प्रबोधन में यह सिखायें कि परिवार व्यवस्था बनाये रखते हुए भी अधिक शांति और ख़ुशी योग से अपने जीवन में ला सकतें हैं तो यह दुनिया के लिए आश्चर्य का विषय हो सकता है।भारत को यह सुविधा मिलनी ही चाहिए कि वह अपनी संस्कृति और संस्कारों की परिवार में रक्षा करते हुए , स्व की रक्षा करते हुए विकास के रास्ते पर आगे बढ़े ।संघ के स्वयंसेवक समाज के सहयोग से भारत के हर परिवार में पहुंच कर यह बताने का प्रयास कर रहें हैं की बच्चों को ऐसी शिक्षा देने और दिलाने का प्रयास करें जिससे बच्चों और पारिवारिक सदस्यों का जीवन स्व आधारित होनी चाहिए।स्व का अर्थ आधुनिकता विरोधी नहीं सर्वश्रेष्ठ होना चाहिए।हमारा परिवार पर्यावरण की भी रक्षा करेगा , अपनी जीवन शैली पर्यावरण के अनुकूल बने । घर की बनावट ऐसी होनी चाहिए की उसे दिखने से ही हिंदू घर की छवि बने। घर में पूजा का स्थान अवश्य हो । घर चाहे कितना छोटा ही क्यों न हो परंतु तुलसी का बिरवा अवश्य स्थापित हो । हो सके तो गमले में ही सही केले का पौधा भी लगा हो । घर पर ॐ का या स्वास्तिक का चिह्न अवश्य बना हो ।घर पर यथा स्थान मंगल ध्वज भगवा रंग में स्थापित हो ।सायंकाल संध्यावादन , संध्या पूजन की परंपरा डालनी चाहिए।मंगल ध्वनि , शंख, घंटा घड़ियाल बजने से , आरती पूजन होने से , सुविधानुसार समय समय पर यज्ञ हवन से भी वातावरण शुद्ध और आनंददायक बनता है।घर का निर्माण या नवीनीकरण करें तो वास्तुशास्त्र का ध्यान अवश्य रखें ।यह विज्ञान प्रकृति से तालमेल रखने की एक विधा है।भारत में चेतना विज्ञान अत्यधिक विकसित था यह तथ्य निर्विवाद है।भारत का आध्यात्म संस्कृति विस्तार है अतः विज्ञान और प्रकृति का समन्वय यहाँ पग- पग पर देखने को मिलता है।कुटुंब रचना में भी विज्ञान है । भारत का हैपीनेस इंडेक्स इस वर्ष आठ अंक बढ़ा है यह प्रसन्नता का विषय है।परिवार में बालक को सिखाना चाहिए की जैसी परिस्थिति हो उसे सयंम पूर्वक स्वीकारना चाहिए।

              कुटुंब प्रबोधन में शिक्षा,संस्कार संगति, एकात्मकता और परिवार की भूमिका का बड़ा महत्व है। ध्यान रखना होगा कि बालक ठीक से शिक्षा प्राप्त कर रहें हैं की नहीं । मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा सर्वश्रेष्ठ माना जाता है ।परिवार की घरेलू शिक्षा जो माँ, पिता और बड़े बूढ़ों से प्राप्त होती है वह व्यवस्थित होनी चाहिए।माँ पिता द्वारा बच्चों को आध्यात्मिक,सांस्कृतिक गीत, श्लोक, भजन, प्रातः स्मरण आदि कंठस्थ कराने चाहिए।इसी प्रकार परिवार के बड़ों को संस्कार देने में सक्षम होना चाहिए। बिस्तर पर सोते समय कहिनियों के माध्यम से संस्कार देने की परंपरा प्राचीनकाल से चली आ रही है। इसके लिए समय निकालना होगा ।ध्यान देना होगा की बालकों की संगति ठीक हो। मित्र, खेल समूह और बड़ों की संगति भी ठीक होनी चाहिए।परिवार में सहयोग की भावना विकसित कर के पारिवारिक एकात्मकता का पाठ पढ़ाना आज की महती आवश्यकता है।यह भी ध्यान रखना होगा कि पूरा परिवार समाज और राष्ट्र धर्म में योगदान दे कर अपनी भूमिका निभा रहा है की नहीं।बच्चों और बड़ों में यह संदेश जाना चाहिए कि देश हमें देता है सबकुछ तो हम भी कुछ देना सीखें।इसकी शुरुआत स्वयं से अर्थात् फर्स्ट पर्सन सिंगुलर नंबर आई से प्रारंभ होना चाहिए। भारत का अस्तित्व अबतक बचा हुआ है क्योंकि भारत ने अनेकों युद्ध और झंझावात झेले परंतु अपनी परिवार व्यवस्था बचा कर रक्खा हुआ है। युग की माँग है की यह परंपरा हम जारी रखें। चुनौतियां आज भी सामने हैं। छोटे बच्चों के हाँथ में मोबाइल हैं। ओटीटी प्लेटफार्म हैं। पारिवारिक संबंध टूट रहे हैं। मातापिता दोनों को कमाना पड़ रहा है। देर से शादी हो रही है।हम दो हमारे एक का नारा चल पड़ा है। डिंक फैमिली की अवधारणा प्रबल है । विवाह फेल हो रहें हैं। मातापिता में विवाह विच्छेद की संख्या बढ़ रही है। बच्चों को सिंगल पैरेंट के साथ जीवनयापन करना पद रहा है।परंतु इन चुनौतियों का सामना करने का संकल्प संघ ने लिया है तो उसे पूरी निष्ठा से निपटने के लिए कुटुंब प्रबोधन का प्रकल्प चलाया जा रहा है।संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा बेंगलुरु में भी विचार विमर्श और रणनीति बनाई गई है। कार्यक्रम की समीक्षा की जा रही है।सफलता के लिए समाज को एकजुट हो कर सामने आना पड़ेगा ।

         नारी की भूमिका परिवार प्रबोधन में सर्वाधिक अग्रणी है। इसके लिए परिवार में नारी का सम्मान होना चाहिए । नारी संचालक है अतः सम्मानपूर्वक उसे भूमिका के संचालक में आगे आने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जगह-जगह संवाद, संगोष्ठी,विचार गोष्ठी ,सम्मेलन , प्रवचन , लेखन, परिचर्चा का आयोजन हो रहा है।नारी माँ जगतजननी शक्ति स्वरूपा , मातृ शक्ति है । कुटुंब प्रबोधन में नारी शक्ति की अपार संभावनाएं हैं अतः वे आह्वान पर हर जगह आगे आ कर दायित्व संभाल रही हैं ।सम्पूर्ण देशभर में कुटुंब प्रबोधन के कार्य में मातृशक्ति सबसे आगे चल रहीं है यह हर्ष का विषय है।

                संघ ने कुटुंब प्रबोधन में छ विंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया है । यह हैं भाषा, भूषा,भोजन, भजन,भवन एवं भ्रमण ।भारत में 45 संघ प्रांत निर्धारित है ।प्रत्येक प्रांत में कुटुंब प्रबोधन के संयोजक दायित्व संभाल रहें हैं।महर्षि अरविंद का 15 अगस्त 1947 को रेडियो पर भाषण है जिसमें उन्होंने कहा था कि आज इस देश का विभाजन हुआ है लेकिन यह देश अखंड हो कर रहेगा । इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। आपको संघर्ष करना पड़ेगा , सारी बातें होंगी, लेकिन एकदिन ऐसा आएगा , यह अखंड होगा ।इस विंदु को संघ ने ध्यान में रक्खा है । शताब्दी वर्ष में घर-घर पहुँच कर राष्ट्रीय एकता का संदेश देना है । परिवार को तैयार करना है की वह नई ऊर्जा से भर कर पारिवारिक संस्कारों के संवर्धन का कार्य करे और परिवार जागरण के यज्ञ में अपना योगदान दें।भाषा के अंतर्गत मातृभाषा में बच्चों को प्राथमिक शिक्षा दिलाए। इसके अतिरिक्त एक अन्य भारतीय भाषा को संपर्क भाषा के रूप में पढ़ने दें। अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में एक विदेशी भाषा भी पढ़ने दें ।भूषा में विशेष ध्यान दें की बच्चे विशेषकर बच्चियाँ विदेशी फैशन की नकल न करते हुए शालीन भारतीय वस्त्र पहनें।विदेशों की नकल न करते हुए जंक फ़ूड पिज़्ज़ा बर्गर डिब्बा बंद खाद्य पदार्थ से बच्चे। हेल्दी खाना देश काल परिस्थिति के अनुसार अपने क्षेत्रानुसार मोटे अनाज को सम्मिलित करते हुए खायें और उसमें रुचि उत्पन्न करने का प्रयास करें। घर में प्रातः या सायंकाल पूरा परिवार एकत्र होकर भजन में भाग लें । अपनी घर को भारतीय परम्परा के अनुसार सजाएँ। गाँव, देहात, नगर को स्वक्ष बनाये । हिन्दू प्रतीक चिन्हों को घर पर प्रदर्शित करें। भगवा ध्वज लहरायें।और परिवार के साथ अपनें गांव नगर प्रांत के साथ साथ देश के प्रमुख तीर्थ स्थलों का भ्रमण करें।परिवार के विवाह कार्यक्रमों में दिखावा न करें वरन् वास्तविक सप्तपदी, सातवचन ,हिंदू संस्कार और विवाह के रस्मों, रिवाजों पर ध्यान दें। सादगी के साथ वास्तविक ख़ुशी प्राप्त करें । विवाहों का व्यापारीकरण न होने दें । वास्तविक परंपराओं को महत्व दें न कि आडंबर, दंभ, दिखावा करें ।निश्चय ही हम इस यज्ञ में जहाँ हैं , जैसे हैं , उसी स्वरूप में वहीं से अपना योगदान दें ।

       

         


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लोकसंग्रही मानवशिल्पी डा. हेडगेवार 

श्रेष्ठ महापुरुष वाह्य उपकरणों के सहारे नहीं अपितु अपने सत्व के बल पर ही कार्य सफल कर विजय प्राप्त करते हैं ।

अपने क्रिया सिद्धि : के बल पर जागृत चिरंतन भारत राष्ट्र को हिंदुओं का राष्ट्र मानते और गर्जना के साथ कहते हुए उसे परमवैभव तक ले जाने का संकल्प पुनरपि प्रस्थापित करने वाले डा. केशवराव बलीराम हेडगेवार हमारे दीपस्तम्भ हैं।उन्होंने हमें प्रेरणा दी कि हम अपनेएमजे अविचल ध्येयनिष्ठा , उत्कट देशप्रेम ,निर्भीक पौरुष और अपने समाज का अभिमान लेकर भारत की नवचेतना को जगाने का कार्य करें।उन्होंने हमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मार्ग दिखा कर अपने समाज का अभिमान हृदय में बसा कर राष्ट्र जीवन के साथ एकात्म हो जाने का प्रकाश दिखाया ।महान कार्य करने वाले महापुरुषों में व्यक्ति की परख का गुण अवश्य पाया जाता है। डॉक्टर जी में मनुष्य को परखने का असाधारण गुण विद्यमान था।सन् 1910 में जब वे नागपुर से कलकत्ता मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई करने गए तो वे वहाँ महाराष्ट्र लॉज में रहते थे । वहाँ उनके कमरे में ही सरकारी खुफिया विभाग का एक व्यक्ति मित्रता का भाव दिखा कर रहने लगा था परंतु डा. जी ने उसे परख लिया था कि यह व्यक्ति हमारा हितैषी नहीं है तथा अपने सभी साथियों को उन्होंने सावधान कर दिया था तथा बाद में उन्होंने सिद्ध भी कर दिया था । यही गुण बाद में उन्होंने सकारात्मक रूप से संगठन निर्माण में दिखाया और अनेकों सुयोग्य और सक्षम प्रभावी स्वयंसेवकों को राष्ट्रनिर्माण में लगाने में दिखाया।उन्होंने मन, कर्म और वचन की एकरूपता को अपने कार्यपद्धति का अंग बनाया।हिंदुत्व का अभिमान उनके अंदर कूट कूटकर भरा हुआ था ।सहज विनय का कार्य व्यवहार संघ कार्य की निर्दोष रचना करने में सहायक बना। publish                  अविश्रान्त परिश्रम , उज्ज्वल चरित्र,व्यवहार कुशलता के कारण ही उन्होंने बड़ी संख्या में विश्वस्त व्यक्तियों का लोकसंग्रह किया।उनके लोकसंग्रही व्यक्तित्व के प्रभाव के कारण ही अनेकों मित्र बने जो संगठन खड़ा करनें में मील के पत्थर सिद्ध हुए।उनके विनोदी स्वभाव और अनुशासन पालन से प्रभावित हो कर उनके पास अधिक से अधिक समय व्यतीत करने वाले और देश सेवा के लिए तत्पर युवकों का एक बड़ा समूह खड़ा हो गया था।उनके बैठकों में हास्य के ठहाके लगते रहते थे।शारीरिक सुदृढ़ता और गहन अध्यनशीलता दोनों देवदुर्लभ गुण उनके अंदर विद्यमान थे जिनसे साथियों का अटल विश्वास उनके उपर था। भाषण देते समय शब्दों में अद्भुत शक्ति उनके अंदर आ जाती थी जो सुनने वालों के हृदय को झंकृत कर देती थी।यह कला भी उनके अंदर ईश्वरीय देन थी ।उनके जितने भी बौद्धिक या भाषण हुए हैं उनके अध्यन से यही सिद्ध होता है कि उनके बोलने में उनके प्रभावी व्यक्तित्व का बहुत बड़ा योगदान था ।व्यक्ति के चारित्र्य, तपश्चर्या और त्याग की भावना से ही उसके शब्दों में सर्वोच्च शक्ति का समावेश होता है।तर्क ,बहस , बुद्धि के चमत्कार, सब उस सर्वोच्च शक्ति के सामने तुच्छ सिद्ध होते हैं।महान आत्माओं द्वारा उच्चारित शब्दों में अप्रवाहित शक्ति का संचार हो जाता है। डाक्टर जी के शब्द अत्यंत सरल हुआ करते थे परंतु उनमें ऐसी ही अद्भुत शक्ति संचारित होती रहती थी।

                       डॉक्टर जी की कार्यपद्धति में प्रसिद्धि परान्मुखता एक महत्व का विषय हुआ करता था । अत्यंत श्रेष्ठ और ध्येयवादी व्यक्तित्व होने के बाद भी उन्होंने कभी बड़कपन का प्रदर्शन नहीं किया।कभी साथी या कार्यकर्ता उत्साहवश उन्हें माला पहनाना चाहते थे या मंच पर उदबोधन में अत्यंत आदरपरक शब्दों का प्रयोग करते थे तो वे इशारे से रोक लगा देते थे। कार्यपद्धति में भी वे खा करते थे कि भारत हमारी माता हैं। क्या माता की सेवा का प्रचार करना उचित होगा। यह तो पुत्र का कर्तव्य होता है।उनकी कार्यपद्धति के मूल में थी कि कार्यकर्ता के मन में लेशमात्र भी अहम् की भावना नहीं आना चाहिए।नाम, ख्याति पद या सत्ता प्राप्ति का पागलपन स्वयंसेवक के अंदर प्रवेश भी न करने पाए।इस निहंकारितता और प्रसिद्धि परानमुखता से ही वे सबकी श्रद्धा का पात्र बन कर वे इतना विशाल संगठन कड़ा कर सके।कार्य में अनुशासन हो , जीवन और व्यवहार में अनुशासन नितांत आवश्यक है यह सीख डॉक्टर जी स्वयं संघ शिविरों में कर के दिखाते थे। कई बार छूने की रेखा सीधी होनी चाहिए, यह सिखाते थे।वे छोटे-छोटे नियम का स्वयं पालन करते थे और सभी स्वयंसेवकों से अपेक्षा भी करते थे। वे कहते थे कि सबके हित के लिए बनी व्यवस्थाओं का सम्मान करने से किसी मानसिक संघर्ष का सामना नहीं करना पड़ता है।वे यह भी कहते थे की सामर्थ्यशाली, सुचारू, व्यवस्थित राष्ट्र जीवन की सहज स्वाभाविक आवश्यकता है -अनुशासन।

      डॉक्टर जी में स्वधर्म का स्वाभिमान इतना प्रखर था कि जब वे विदर्भ के एक तहसील पुसद में जंगल सत्याग्रह के लिए गए हुए थे जहाँ कसाई गाय काटने के लिए रास्ते में ले जाते मिले जिसे वे छुड़ा लाए और गोशाला की सुरक्षा में दे दिया था । हिंदुओं के लिए गाय की रक्षा हो या जंगल सत्याग्रह हो , दोनों समान थे। वे अकिंचन राष्ट्रसेवा में विश्वास करते थे। भयानक गरीबी उनकी सहचरी थी । जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं का अभाव उन्हें सदैव बना रहा परंतु यह सब उनके राष्ट्रकार्य में कभी भी बाधक नहीं बना।अभावों को वे प्रसन्नता से झेल गए और अविचलित रूप से राष्ट्र सेवा में जुटे रहे।स्वयंसेवकों के लिए यह जागृत सत्य प्रेरणा का स्रोत बन गया ।आत्मविश्वास उनमे इतना था कि 1928 में डॉक्टर जी कलकत्ता आए थे।नेता जी सुभाष चंद्र बोस उस समय कलकत्ता कारपोरेशन के मेयर थे।राष्ट्रोत्थान के विषय पर उन्होंने सुभास से मिल कर अपने विचार रखे।भेंट के लिए डॉक्टर जी को थोड़ा सा ही समय बोस जी ने दिया था परंतु वार्ता साढ़े तीन घंटे चलती रही।बातचीत के अंत में सुभाष जी ने डॉक्टर जी से कहा कि आपके संगठन की कल्पना अत्यंत शास्त्र-शुद्ध है , यह मुझे मान्य है परंतु अब हिंदू समाज मृतप्राय हो चुका है , यह फिर से पराक्रम और पुरुषार्थ का अधिकारी बन सकेगा , इसमें मुझे विश्वास नहीं है। डॉक्टर जी ने उत्तर दिया की संघ की कल्पना आपको मान्य है यह सुन कर संतोष हुआ । यह कार्य प्रत्यक्ष में करना संभव नहीं इतना ही कहना है आप का । परंतु मुझे पूर्ण विश्वास है की यह होकर रहेगा।बाद में ट्रेन में यात्रा करते समय सुभाषचंद्र जी ने संघ के गणवेशधारी स्वयंसेवकों का विशाल पथसंचलन देखा ।सुभाष जी अंग्रेज़ों के विरुद्ध शशस्त्र संघर्ष करना चाहते थे अतः वे 1940 में डाक्टरजी के मृत्यु के एकदिन पूर्व नागपुर मिलने आए थे ।डॉक्टर जी को दवा के कारण उस समय नींद आ गई थी और मुलाक़ात नहीं हो सकी । 

        नागपुर में 9 जून 1940 को संघ शिक्षा वर्ग के अंतिम सन्देश का भाषण सदैव अविस्मरणीय रहेगा जब उन्होंने बड़े मार्मिक स्वर में कहा था कि “हमलोग मरते समय तक स्वयंसेवक रहेंगे।प्रत्येक स्वयंसेवक को संघकार्य ही अपने जीवन का प्रमुख कार्य समझना चाहिए।” डाक्टर जी ने सामूहिक नेतृत्व, सामूहिक उत्तरदायित्व,आम सहमति के आधार पर निर्णय लेने की परंपरा स्थापित की थी जो आज तक विद्यमान है।संघ में शक्ति का केंद्र अपरिभाषित एवं अदृश्य रहता है क्यों की सब सामूहिक ही रहता है।संघ में सभी धर्मों से श्रेष्ठ राष्ट्रधर्म को माना गया है।हिंदू संगठन का कार्य राष्ट्रीय कार्य है।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के पूर्व 1915 se 1924 तक डॉक्टरजी ने अपनी आयु ले 10 वर्ष देश में होने वाले विभिन्न आंदोलनों एवं संस्थाओं का अभ्यासपूर्वक सूक्ष्म अवलोकन और विश्लेषण करने तथा राष्ट्र को ग्रसित करने वाले रोग का अचूक निदान खोज निकालने में व्यतीत किया था अतः संघ की कार्यपद्धति में उन्होंने वह सब समाहित किया जो उन्हें उचित लगा ।स्वप्रेरणा एवं स्वयंस्फूर्ति से राष्ट्र सेवा , राष्ट्रकायार्थ निर्मित संघ ही उनकी कार्यपद्धति का प्रमाण है।उन्होंने संगठन का आधार एकचालकानुवर्ती बनाने हेतु विश्वनाथराव केलकर,तात्याजी कलाकार, आप्पाजी जोशी,बापूराव म्यूच्यूअल, बाबासाहब कोलते, बालाजी हुद्दार, कृष्णराव मोहरीर, मार्तण्ड राव जोग एवं देवाईकर से गहन विचारविमर्श किया और निर्णय लिया।एकचालकानुवर्ती संघ को परम्परागत पाश्चात्य परम्परा के संगठनों से अलग स्वरूप प्रदान करता है।संगठन में व्यक्ति का महत्व नैतिक शक्ति से होता है।संगठन में पारिवारिक परिवेश एक कुटुंब के समान होता है। सभी सदस्य एक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए समान भाव से स्वैक्षिक समर्पण के द्वारा योग्य नेतृत्व के निर्देशन में काम करते हैं।डॉक्टर जी ने अपने कार्यों एवं व्यवहार से एकचालकानुवर्ती को एक आदर्श संघटनात्मक सिद्धांत बना दिया।उन्होंने निर्णय लिया कि संघ में धन स्वयंसेवक ही देगा । वर्ष में गुरुपूर्णिमा के दिन गुरु के समक्ष जो समर्पण राशि मिलेगी वही संघ कार्य के निमित्त होगा।इस कार्यपद्धति से परावलम्बन की भावना ही समाप्त हो गई।इसी प्रकार संघ शिक्षा वर्ग की रचना कर स्वयंसेवकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई। दैनिक शाखा की कार्यपद्धति से स्वयंसेवकों का दैनिक एकत्रीकरण और कार्यक्रमों के माध्यम से शारीरिक , बौद्धिक, सामाजिक सामूहिकता का विकास निर्धारित हुआ। सामाजिक महत्व के छह उत्सव मना कर समाज को समरस बनाने की कोशिश प्रारंभ की गई। डाक्टर जी ने स्वतंत्र चिंतन से हिंदू समाज में नवचेतना जगाने का अभिनव प्रयास किया ।उन्होंने व्यक्तिपूजा को कोई महत्व नहीं दिया फलस्वरूप संघ निरंतर अविभाजित स्वरूप में विकसित होकर परम पवित्र भगवत्ध्वज को गुरु मान कर राष्ट्र को परमवैभव पर पहुंचाने के व्रत का पालन करता रहा है।डाक्टर जी ने ऐसी कार्यपद्धति अपनाई कि सौ वर्ष हो गए इस संघटन के परंतु कोई भगवान यहाँ नहीं बन सका।सब स्वयंसेवक ही हैं, सभी कर्मयोगी है, सभी समान हैं।व्यक्ति पूजा का निषेध संघ संस्कृति का अंग बन गया है । फैक्टर जी हमारे बीच नहीं रहे परंतु संघ निरंतर सौवाँ वर्ष पूरा कर रहा है।डॉक्टरजी का “त्रयोदश वार्षिक सिहावलोकन “नाम का सुप्रसिद्ध भाषण , जिसमें उन्होंने संघ स्थापना से लेकर तबतक हुई संघकार्य की प्रगति का लेखाजोखा प्रस्तुत किया था , अविस्मरणीय माना जाता है।जैसा कहें वैसा करें, प्रथम करे तब बोलें ।उन्होंने जीवन में कोई कर्मकाण्ड नहीं अपनाया । वह कहा करते थे कि सार्वजनिक जीवन में शुद्ध मन से, सच्चे हृदय से समाजसेवा ही वास्तविक पूजा होती है।वे समाजदेवता-राष्ट्र देवता की पूजा करते थे।वे कर्मयोगी थे।संघ कार्य ईश्वरीय कार्य है।यह राष्ट्रीय कार्य है।संगठनात्मक गतिविधियों का लक्ष्य राष्ट्र की सबलता है।राष्ट्रीय जागरण का कार्य समझना संघ का अधिष्ठान है।मनुष्य को संस्कारित करना, उनमें समष्टि का भाव जगाना और राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण करना एक आध्यात्मिक कार्य है।हिन्दुस्थान एक राष्ट्र है और हिंदू एक समाज है। हमसब इसके एक अंग हैं और समाज का प्रत्येक अंग राष्ट्र के लिए है।मैं और राष्ट्र दोनों एक ही हैं,ऐसा समझ कर जो राष्ट्र से तन्मय हो वही सच्चा राष्ट्रसेवक है।

           उन्होंने पारस पत्थर की तरह सोच समझ कर जिसको छुआ वह सोना बन गया ।व्यक्तियों की परख इतनी थी कि किसके अंदर क्या योग्यता है , वह क्या , कहाँ सुंदरतम उपलब्धि दे सकता है , वहीं उसे भेजना और उसे खरा सोना साबित होना उसकी नियति बना देते थे।उनके लोकसंग्राहक वृत्ति में हर बात का उपयोग मनुष्यों को जोड़ना और उन्हें कार्यों में लगा कर कार्योपयोगी बनाना था।प्रभाकर बलवंत दाड़ी उपाख्य भैयाजी दाड़ीं, जो 1908 में उमरेड - जिला नागपुर में जन्मे , डाक्टर जी ने 1925 में जिन कुछ लोगों को लेकर नागपुर में संघ शाखा शुरू की , भैयाजी दाड़ी उनमें से एक थे। डाक्टरजी ने उन्हें प्रेरित कर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ने भेजा । महाराष्ट्र के बाहर पहली शाखा बी एच यू काशी में लगी। भैयाजी दाड़ी नें शाखा प्रारम्भ की। तब गुरुजी बी एच यू में प्राध्यापक थे।यहीं वे संघ शाखा के संपर्क में आए । यह उत्तर प्रदेश की पहली शाखा थी।भैयाजी गृहस्थ होते हुए भी प्रांत प्रचारक रहे।उत्तर प्रदेश में 1936 में भाऊ राव देवरस को डॉक्टरजी नें लखनऊ भेजा जहाँ उन्होंने ऐशबाग में शाखा प्रारम्भ की। भाऊ राव जी में लखनऊ विश्वविद्यालय से क़ानून की डिग्री ली तथा लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष भी रहे।पूरे उत्तर प्रदेश के प्रांत प्रचारक रहे तथा पूरे प्रदेश में शाखा विस्तार किया।पूज्य माधव सदाशिव गोलवरकर डॉक्टरजी की ही खोज थे।सन् 1939 से ही डॉक्टरजी का स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं रहता था ।वे अपनी कल्पना के अनुसार कार्य चलाने वाला कर्मठ , सन्यस्थ, निश्चयी,आधुनिक, विद्याविभूषित व्यक्ति को खोज रहे थे।वे 1937 से ही आध्यात्मिक प्रवृत्ति के आधुनिक विद्याविभूषित श्रीरामकृष्ण परमहंस के विचारों से प्रभावित व्यक्ति को संघकार्य से परिचित करा रहे थे।20 जून 1940 को प्रातःकाल श्रीगुरुजी को अपने कमरे में बुलाया और कहा कि अब चिकित्सक की राय से लंबर पंचर का समय आ गया है । मैं बच गया तो ठीक है अन्यथा संघ का सम्पूर्ण कार्य आप सम्भालिए। थोड़ा समय : बड़ा कार्य संपन्न कर शुक्रवार प्रातः साढ़े नौ बजे ज्येष्ठ द्वितीया १८६२ शक, तदनुसार 21जून 1940 ko स्वर्गवासी हुए।

       सन 1939 के मार्च महीने में कलकत्ते की पहली शाखा शुरू हुई तो बंगाल की अनुशीलन समिति के डाक्टर साहब के पुराने साथी विप्लवी नेता पुलिन बिहारी दास और अन्य साथियों ने संघ कार्य में सहयोग दिया । पुलिन दा ने तो अपनी वर्गीय हिंदू व्यायाम समिति का अखाड़ा केंद्र ही संघ कार्य हेतु सौंप दिया । कलकत्ते की पहली शाखा यहीं लगी । प्रारम्भ में श्री गुरुजी तथा श्री विट्ठल रावपत ही कलकत्ते में सक्रिय रहे बाद में ७ महीने बाद ( 15 नवंबर को) बालासाहेब देवरस ने वहाँ पहुँच कर कार्य संभाल लिया था ।

       उमाकांत केशव (बाबासाहेब) आप्टे ,दादाराव परमार्थ, एकनाथ रानाडे, श्री हरिकृष्ण (अप्पाजी) जोशी जैसे नजाने कितने साथी डॉक्टर जी के संपर्क में आए और जहाँ उन्होंने कार्य में लगाया वे जीजन से लग गए।अप्पा जी जोशी संघकार्य प्रारंभ होने के पूर्व से ही डॉक्टर जी के मित्र और साथी रहे।क्रांतिकारी कार्यों में भी साथ दिया । निविड अंधेरी रातों में भी यदि डॉक्टर जी ने किसी जोखिम के कार्य के लिए एकाएक आप से आकर कहा - चलो- तो सदैव साथ निकल पड़े थे ।ये संघ के पूर्व सरकार्यवाह, विदर्भ प्रांत के संघ चालक रहे हैं।इसी प्रकार विदर्भ प्रांत के प्रवास पर जब डॉक्टर साहब गए तो वहाँ बापू साहब सोहोनी को विदर्भ प्रांत का संघचालक नियुक्त किया । वहाँ पहले से ही कई लब्धप्रतिस्थित नेता मौजूद थे परंतु डॉक्टर साहब की नियुक्ति कितनी कारगर सिद्ध हुई यह आगे चल कर सिद्ध हुई।दादाराव परमार्थ।बड़े विचित्र ढंग से डा हेडगेवार से आप का संपर्क आया।सन् 1920 में लोकमान्य तिलक का निधन हुआ , उस समय दादाराव परमार्थ गेंद-बल्ला खेलने में बहुत रुचि रखते थे। उस दिन भी खेल रहे थे कि रह चलते एक साँवले से व्यक्ति ने उन्हें टोंका-“अरे , लोकमान्य की मृत्यु हो गई और तुम खेल रहे हो ? उस व्यक्ति ने दादाराव को कुछ ऐसी दृष्टि से देखा कि बहुत दिनों तक उस श्यामल पुरुष की वे काली चमकती आँखें वे भुला नहीं पाए- और एकदिन संघकार्य को ही अपना जीवन बना लिया । मद्रास प्रांत के वे प्रचारक बने । डाक्टर जी के साथ कांग्रेस सत्याग्रह में भाग लिया जहाँ उन्हें जेल हुई । वहीं उन्हें यक्ष्मा रोग हो गया। परंतु डा. केशव ने उनकी इतनी सेवा की कि उनको मौत के मग से खींच लाए।कार्य करते- करते ही दिल्ली के संघ शिक्षा वर्ग में आप ने अंतिम सांस तोड़ी।इसी प्रकार डा. साहब के सानिध्य में जिनको कार्य का अवसर मिला ऐसे एक कार्यकर्ता विश्वनाथ लिमये, संघ के जीवनब्रती प्रचारक । उत्तर प्रदेश में प्रांत प्रचारक बना कर भेजे गए।

    संघ मंदिर का निर्माण करने वाले राष्ट्र समर्पित कार्यकर्ताओं की सूची बहुत लंबी है जिन्होंने दीपस्तंभ डॉक्टर हेडगेवार से प्रेरणा ले कर अपना जीवन राष्ट्र को समर्पित कर दिया था।भय लग रहा है की अपनी अज्ञानता एवं असावधानी से किसी महाभाग का नामोल्लेख न करने का अपराध न कर बैठूँ। फिरभी भावी पीढ़ियों की जानकारी के लिए कतिपय कार्यकर्ताओं का नामोल्लेख करना समीचीन होगा।इस दृष्टि से सर्वश्री राजभाऊ पतुरकर, लक्ष्मण राव इनामदार,भास्करराव कलम्बी,नारायणराव तरटे , जनार्दनदत्त चिंचालकर,मधुकरराव देव,गोपालराव यरकुंटवार, विठ्ठलराव पत्तकी, बापूराव दिवाकर, नरहरि पारखी,माधवराव मूले,बाबाजी कल्याणी,के. डी. जोशी, मोरेश्वर मुंजे, बसंतकृष्ण ओक, कृष्णराव बड़ेकर,नारायणराव पुराणिक,कृष्णराव मोहरील,रामभाउ जामगड़े,बापूराव भिषिकर,शंकर राव कुरवे,अण्णा शेष, दत्तोपंत यादवाड़कर,मधुकर भागवत, आबाजी हेडगेवार,यादवराव जोशी, बच्छराज व्यास,गोपालराव पाठक,बालासाहब हरदास,नाथ मामा काले,गजाननराव जोशी,बालासाहेब सगदेव, प्रभाकर फ़ड़नवीस,दामोदर गंगाधर भावे,बालासाहेब इंदूरकर,दत्ताजी डीडोल्कर,राम मोलेदे,गोपालराव बाकले,सदु भाऊ चितले,बाबूराव पालथीकर,रामभाउ इन्दुरकर, बालासाहेब गोरे, मनोहर गुर्जर,अनंत रामचंद्र गोखले, माधवराव देवले, भाऊसाहेब भुस्कुटे,यादवराव जोशी, नालिनिकिशोर गुहा,डाक्टर अमूल्य रत्न घोष,श्रीमती लक्ष्मी बाई केलकर,अण्णा जी वैद्य,कृष्णबल्लभ नारायण प्रसाद सिंह, बाबासाहेब घटाटे आदि का नाम उल्लेख किया जा सकता है।

किसी स्वप्नद्रष्टा के जीवन एवं विचारों की सार्थकता उसके द्वारा भविष्य की पीढ़ियों एवं राष्ट्रीय जीवन को प्रभावित करने की क्षमता में निहित होती है ।डा. हेडगेवार ऐसे ही महापुरुष थे। 

    


           

                     

        

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Friday, 28 February 2025

संघ का प्रचार विभाग: एक परिचय         अशोक कुमार सिन्हा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना भारत के नागपुर में वर्ष 1925 में डा. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी । संघ स्थापना का मूल उद्देश्य सम्पूर्ण हिंदू समाज का संगठन एवं व्यक्ति निर्माण करना था । चरित्रवान,अनुशासित,राष्ट्रभक्त समाज खड़ा करना चाहता है संघ ।हिंदू समाज का अर्थ है सम्पूर्ण समाज जो भारत को अपना देश ,अपनी मातृ/ पितृ भूमि मानता हो , उसकी परंपराओं के प्रति , उसके ऐतिहासिक महापुरुषों के प्रति , देश की सुरक्षा और उसके समृद्धि के प्रति,जिनकी अव्यभिचारी एवं एकान्तिक निष्ठा हो -वे जन हिंदू व राष्ट्रीय कहे जायेंगे, चाहे उनकी उपासना पद्धति अलग अलग ही क्यों न हो ।संघ उस समाज को भी संगठित करना चाहता है जो टेक्नीकली भारत का नागरिक बन कर रहना चाहते हैं ।वे सब हिंदू ही कहे जाएँगे । हिंदू ही इस राष्ट्र का सबसे अधिक जिम्मेदार नागरिक है क्यों कि इस देश का भाग्य और भविष्य हिंदुओं से ही जुड़ा हुआ है । हिंदू यह नाम है राष्ट्र का । वह राष्ट्र का रूप और प्राण है । हिंदुओं का संगठन अर्थात राष्ट्रीय संगठन ।संघ का उद्देश्य अपने इस भारत को दुनिया का एक सर्वश्रेष्ठ देश बनाना है ।ज्ञान विज्ञान ,अर्थ एवं सुरक्षा की दृष्टि में यह देश स्वावलंबी , अजेय और संपन्न हो । इसी कामना से प्रतिदिन शाखा के माध्यम से संघ व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन का कार्य करता है । संघ का स्वयंसेवक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संगठन खड़ा कर के सेवा का कार्य करता है ।

          संघ अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे करने जा रहा है । संघ स्थापना काल के समय जो परिस्थितियाँ थी उनमें समय -समय पर बदलाव होते रहे । संघ पहले प्रचार परांमुख था । देश सेवा ,समाज सेवा और मातृभक्ति को वह प्रचार का विषय नहीं मानता है । आज भी वह समस्त समाजसेवा के कार्य को सम्पूर्ण समाज के सहयोग से ही करता है अतः प्रचार कर के श्रेय अकेले संघ नहीं लेना चाहता है। कार्य करने से जो स्वयं प्रसिद्धि प्राप्त हो वही प्रचार है । जितना कार्य उसकी ही प्रसिद्धि समाज में हो , यही उचित है। इसी लिए संघ अनावश्यक प्रचार न करते हुए कार्य करने में विश्वास रखता है । परंतु संघ की बढ़ती प्रगति , कार्य व लोकप्रियता से अनेक लोगों के आँख की किरकिरी भी यह संगठन बना । जो शक्तियाँ देश विदेश में भारत को संगठित और शक्तिशाली होते नहीं देखना चाहती थीं, उनके नज़र में संघ भी खटकने लगा । देश के अंदर भी जिनके राजनैतिक हित, वोट बैंक और तुष्टिकरण के उपर संकट आने लगा , वे अपने भी संघ के उपर आरोप लगाने लगे । वामपंथियों ने तो लगातार संघ के उपर प्रहार करना जारी रक्खा।संघ पर देश में तीन बार प्रतिबंध लगे परंतु संघ हर बार सत्य की परीक्षा में उबरा और उसपर से प्रतिबंध लगाने वालो ने ही प्रतिबंध हटाया । संघ के समक्ष कई बार परिस्थितियां बदली ।देश का विभाजन हुआ , कई बार देश पर विदेशी आक्रमण हुए , समाज को बाँटने का प्रयत्न हुआ , घुसपैठ, मतांतरण , लव जिहाद , दंगे, रामजन्मभूमि आंदोलन ,इतिहास का विकृतिकरण , आपातकाल का दंश और हिंदू समाज पर अनेकों प्रहार हुए । प्राकृतिक आपदाएं आई परंतु संघ अविचल देश और समाज की सेवा में लगा रहा और समाज को सचेत करते हुए उसे संगठित करने का कार्य करता रहा । देश के उपर के आए हर संकट पर संघ समाज के साथ कंधे से कंधा मिला कर डटा रहा । अपने अपर लगे आरोपों का समय समय पर प्रतिउत्तर भी देता रहा । 

       भूमण्डलीकरण के कारण संचार व्यवस्था में क्रांति आई । 1948 में बालेश्वर अग्रवाल नामक एक स्वयंसेवक ने संघ के सहयोग से हिन्दुस्थान समाचार नामक एन न्यूज़ एजेंसी खड़ा किया ।उस समय संघ छोटा था , धनाभाव था परंतु हिन्दुस्थान समाचार की तकनीकी सबसे अच्छी थी । हिंदी में सत्य समाचारों का प्रेषण होने लगा । फिर प्रिंट मीडिया आई, समाचार पत्र आया , दृश्य संवाद आया । जानता तक पहुँच बढ़ी । रेडियो , दूरदर्शन , TV, इंटरनेट का युग आया।मोबाइल युग आया और आज देश में 120 करोड़ लोगों से अधिक के पास इंटरनेट मोबाइल है। सोशल मीडिया युग में आर्टिफीसियल इंटेलजेंस का प्रवेश हो चुका है ।समाज प्रबोधन में संघ ने भी इन सब साधनों का प्रयोग किया है ।

       संघ ने भी अपने संगठन में परिवर्तन किया है । शताब्दी वर्ष आते- आते 6 कार्य विभाग क्रमशः शारीरिक,बौद्धिक,व्यवस्था,संपर्क , सेवा एवं प्रचार विभाग कार्यरत हैं। 8 गतिविधियों में क्रमशः कुटुंब प्रबोधन ,गो सेवा, समग्र ग्राम्य विकास,सामाजिक समरसता,धर्म जागरण , सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण और मुख्य मार्ग विस्तार । 43 सम वैचारिक संगठन जो 6 समूहों में विभाजित किए गए हैं यथा वैचारिक,शिक्षा,आर्थिक , सामाजिक , सेवा एवं सुरक्षा समूह के अंतर्गत आते हैं । डेढ़ लाख से अधिक सेवा कार्य सम्पूर्ण देश में स्वयंसेवकों एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा संचालित हैं ।उनहत्तर हज़ार से अधिक स्थानों पर दैनिक प्रातः एवं सायं शाखाएं लगतीं है। सैतीस हज़ार साप्ताहिक मिलन, सत्रह हज़ार मासिक मिलन,व मंडली संचालित हैं। सम्पूर्ण विश्व को पाँच भागों में विभक्त कर विदेशों में तीन हज़ार से अधिक स्थानों पर भारतीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू स्वयंसेवक संघ नाम से विदेश विभाग शाखाएं संचालित कर रहा है।संघ के शताब्दी वर्ष में पंचप्रण नामक पंचमुखी कार्य योजना कार्यान्वित की जा रही है जो क्रमशः सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण , स्वदेशी भाव जागरण एवं नागरिक कर्तव्य के रूप में संचालित है। इसके अतिरिक्त विमर्श एवं सज्जन शक्ति संपर्क, समन्वय भाव जागरण का भी कार्य सम्पादित किया जा रहा है।

       रामजन्मभूमि आंदोलन के समय 1992 में अयोध्या में ग्राउंड जीरो से सम्पूर्ण विश्व को त्वरित समाचार हिंदी और अंग्रेजी में उपलब्ध कराने के उद्येश्य से प्रथम विश्व संवाद केंद्र स्थापित किया गया था जो बाद में लखनऊ में ट्रस्ट के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया था । आज ऐसा ही विश्व संवाद केंद्र 35 की संख्या में सम्पूर्ण भारत के सभी प्रदेशों में अपनी भवनों में स्थापित एवं संचालित हैं।यहाँ से विभिन्न पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन ,प्रेस वार्ता, नारद जयंती, विभिन्न महापुरुषों की जयंतियाँ, पत्रकार मिलन एवं सम्पर्क, गोष्ठियां आदि संचालित हो रहें है।

         संघ के छ कार्य विभाग के अंतर्गत प्रचार विभाग की जो स्थापना सम्पूर्ण भारत में की गई है उसका आज भी उद्देश्य राष्ट्रीय विचारों का प्रसार करना ,राष्ट्र विरोधी विभाजनकारी अलगाववादी शक्तियों के प्रति समाज में जागरूकता निर्माण और हिंदुत्व की सकारात्मक बातें, तथ्यात्मक जानकारी मीडिया के माध्यम से समाज तक पहुंचाना है। प्रचार विभाग का कार्य संघ का प्रचार करना या किसी व्यक्ति का प्रचार करना नहीं है। संघ की कार्य पद्दति ही प्रचार है । 

          प्रचार की जो पद्धति अपनायी जाती है उनमें प्रमुख हैं :- सोशल एवं इलेट्रानिक मीडिया के उपलब्ध माध्यमों का उपयोग,अपनी समानांतर प्रचार व्यवस्था खड़ा करना ,जहाँ कार्य नहीं वहाँ विचार पहुँचाने के उद्देश्य से जागरण पत्र/पत्रिकाओं का प्रकाशन,पांचजन्य एवं ऑर्गनाइज़र जैसी राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं का प्रकाशन,साहित्य विक्री, कंटेंट जेनरेशन,नागरिक पत्रकारिता प्रशिक्षण,मीडिया संवाद के अंतर्गत पत्रकारों की मीडिया प्रोफ़ाइल तैयार करना,मीडिया के मालिकों से ले कर रिपोर्टरों तक का नाम पता ईमेल,फ़ोन,और उनके विचारों की जानकारी रखना,मीडिया संपर्क का तंत्र विकसित करना, पत्रकारिता के छात्रों से संपर्क व संवाद ,टी वी पैनल डिस्केशंस में अपना विचार रखने वाले कार्यकर्ता का निर्माण करना,नारद जयंती आयोजित कराना,पत्रकारों के लिए संघ परिचय वर्ग तथा मीडिया कॉनक्लेव आयोजन ,संघ के बड़े उत्तरदायित्व धारी अधिकारियों के प्रवास के समय पत्रकारों से उनके निवास या कार्यस्थल पर सम्पर्क कराना ,स्तंभ लेखकों ,संपादकों , ब्लॉगरों, पोर्टल संचालकों से संपर्क , साहित्योसव मनाना, फ़िल्म महोत्सव का आयोजन करना , शाखा / नगर स्तर तक प्रचार दायित्वधारी बनाना , तथा प्रचार कार्यालयों की स्थापना , संसाधन, टेक्नोलॉजी , आर्थिक व्यवस्था , क़ानूनी व्यवस्था तथा प्रचार के सभी 

 की टोली खड़ी करना व वार्षिक कैलेंडर बनाना ।

       प्रचार विभाग के नौ आयाम तथा प्रांत स्तर तक आयाम प्रमुखों को दायित्व सौपना भी प्रचार विभाग का कार्य है । ये नौ आयाम है क्रमशः जागरण पत्रिका, सोशल मीडिया,स्तंभ लेखक,फ़िल्म , कार्यालय व्यवस्था,साप्ताहिक पत्रिका,साहित्य विक्री,कंटेंट जेनेरेशन तथा मीडिया संवाद ।

      अखिल भारतीय स्तर से ले कर नगर स्तर तक सम्पूर्ण भारत में प्रचार प्रमुख का गठन है । प्रांत स्तर पर डाटा बैंक , आर्काइव्स प्रकोष्ठ स्थापना , पुस्तकालयों की स्थापना , मीडिया मानेटरिंग का कार्य , पेपर कटिंग , समाचार तथा सूचनाओं का प्रेषण , फोटोग्राफी व वीडियो कैमरों का संचालन कार्य संपन्न होता है । यथा आवश्यकता वीडियो एवं साउंड स्टूडियो भी संचालित है। कम्युनिटी रेडियो स्टेशन का भी संचालन अपेक्षित रहता है।रेडियो जॉकी से भी संपर्क तथा उन्हें सांस्कृतिक , महापुरुषों की जीवनियाँ आदि उपलब्ध कराया जाता है।टीवी सीरियल निर्माता , फ़िल्म निर्माताओं , फ़िल्म निर्देशकों , फ़िल्म लेखकों आदि से भी सम्पर्क कर के उनको देशभक्ति पूर्ण निर्माण एवं लेखन के प्रति प्रेरणा देने का अनुरोध किया जाता है । फ़िल्मों में भी भारतीय विचारमूल्य दिखे यह अनुरोध रहता है।इन सब कार्यों के लिए अपने कार्यकर्ताओं को बराबर कार्यशालाओं के माध्यम से प्रशिक्षित भी किया जाता है।आज प्रचार कार्यकर्ता पर्यावरण, स्वच्छता,दिव्यांग कल्याण्, नारी स्वाभिमान जागरण,सांस्कृतिक मूल्यों का पुनर्जागरण में सहायता, सहभागिता कर रहा है। 

                        लेखक विश्व संवाद केंद्र लखनऊ के सचिव तथा उत्तर प्रदेश प्रांतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी हैं।


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संघ का प्रचार विभाग: एक परिचय         अशोक कुमार सिन्हा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना भारत के नागपुर में वर्ष 1925 में डा. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी । संघ स्थापना का मूल उद्देश्य सम्पूर्ण हिंदू समाज का संगठन एवं व्यक्ति निर्माण करना था । चरित्रवान,अनुशासित,राष्ट्रभक्त समाज खड़ा करना चाहता है संघ ।हिंदू समाज का अर्थ है सम्पूर्ण समाज जो भारत को अपना देश ,अपनी मातृ/ पितृ भूमि मानता हो , उसकी परंपराओं के प्रति , उसके ऐतिहासिक महापुरुषों के प्रति , देश की सुरक्षा और उसके समृद्धि के प्रति,जिनकी अव्यभिचारी एवं एकान्तिक निष्ठा हो -वे जन हिंदू व राष्ट्रीय कहे जायेंगे, चाहे उनकी उपासना पद्धति अलग अलग ही क्यों न हो ।संघ उस समाज को भी संगठित करना चाहता है जो टेक्नीकली भारत का नागरिक बन कर रहना चाहते हैं ।वे सब हिंदू ही कहे जाएँगे । हिंदू ही इस राष्ट्र का सबसे अधिक जिम्मेदार नागरिक है क्यों कि इस देश का भाग्य और भविष्य हिंदुओं से ही जुड़ा हुआ है । हिंदू यह नाम है राष्ट्र का । वह राष्ट्र का रूप और प्राण है । हिंदुओं का संगठन अर्थात राष्ट्रीय संगठन ।संघ का उद्देश्य अपने इस भारत को दुनिया का एक सर्वश्रेष्ठ देश बनाना है ।ज्ञान विज्ञान ,अर्थ एवं सुरक्षा की दृष्टि में यह देश स्वावलंबी , अजेय और संपन्न हो । इसी कामना से प्रतिदिन शाखा के माध्यम से संघ व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन का कार्य करता है । संघ का स्वयंसेवक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संगठन खड़ा कर के सेवा का कार्य करता है ।

          संघ अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे करने जा रहा है । संघ स्थापना काल के समय जो परिस्थितियाँ थी उनमें समय -समय पर बदलाव होते रहे । संघ पहले प्रचार परांमुख था । देश सेवा ,समाज सेवा और मातृभक्ति को वह प्रचार का विषय नहीं मानता है । आज भी वह समस्त समाजसेवा के कार्य को सम्पूर्ण समाज के सहयोग से ही करता है अतः प्रचार कर के श्रेय अकेले संघ नहीं लेना चाहता है। कार्य करने से जो स्वयं प्रसिद्धि प्राप्त हो वही प्रचार है । जितना कार्य उसकी ही प्रसिद्धि समाज में हो , यही उचित है। इसी लिए संघ अनावश्यक प्रचार न करते हुए कार्य करने में विश्वास रखता है । परंतु संघ की बढ़ती प्रगति , कार्य व लोकप्रियता से अनेक लोगों के आँख की किरकिरी भी यह संगठन बना । जो शक्तियाँ देश विदेश में भारत को संगठित और शक्तिशाली होते नहीं देखना चाहती थीं, उनके नज़र में संघ भी खटकने लगा । देश के अंदर भी जिनके राजनैतिक हित, वोट बैंक और तुष्टिकरण के उपर संकट आने लगा , वे अपने भी संघ के उपर आरोप लगाने लगे । वामपंथियों ने तो लगातार संघ के उपर प्रहार करना जारी रक्खा।संघ पर देश में तीन बार प्रतिबंध लगे परंतु संघ हर बार सत्य की परीक्षा में उबरा और उसपर से प्रतिबंध लगाने वालो ने ही प्रतिबंध हटाया । संघ के समक्ष कई बार परिस्थितियां बदली ।देश का विभाजन हुआ , कई बार देश पर विदेशी आक्रमण हुए , समाज को बाँटने का प्रयत्न हुआ , घुसपैठ, मतांतरण , लव जिहाद , दंगे, रामजन्मभूमि आंदोलन ,इतिहास का विकृतिकरण , आपातकाल का दंश और हिंदू समाज पर अनेकों प्रहार हुए । प्राकृतिक आपदाएं आई परंतु संघ अविचल देश और समाज की सेवा में लगा रहा और समाज को सचेत करते हुए उसे संगठित करने का कार्य करता रहा । देश के उपर के आए हर संकट पर संघ समाज के साथ कंधे से कंधा मिला कर डटा रहा । अपने अपर लगे आरोपों का समय समय पर प्रतिउत्तर भी देता रहा । 

       भूमण्डलीकरण के कारण संचार व्यवस्था में क्रांति आई । 1948 में बालेश्वर अग्रवाल नामक एक स्वयंसेवक ने संघ के सहयोग से हिन्दुस्थान समाचार नामक एन न्यूज़ एजेंसी खड़ा किया ।उस समय संघ छोटा था , धनाभाव था परंतु हिन्दुस्थान समाचार की तकनीकी सबसे अच्छी थी । हिंदी में सत्य समाचारों का प्रेषण होने लगा । फिर प्रिंट मीडिया आई, समाचार पत्र आया , दृश्य संवाद आया । जानता तक पहुँच बढ़ी । रेडियो , दूरदर्शन , TV, इंटरनेट का युग आया।मोबाइल युग आया और आज देश में 120 करोड़ लोगों से अधिक के पास इंटरनेट मोबाइल है। सोशल मीडिया युग में आर्टिफीसियल इंटेलजेंस का प्रवेश हो चुका है ।समाज प्रबोधन में संघ ने भी इन सब साधनों का प्रयोग किया है ।

       संघ ने भी अपने संगठन में परिवर्तन किया है । शताब्दी वर्ष आते- आते 6 कार्य विभाग क्रमशः शारीरिक,बौद्धिक,व्यवस्था,संपर्क , सेवा एवं प्रचार विभाग कार्यरत हैं। 8 गतिविधियों में क्रमशः कुटुंब प्रबोधन ,गो सेवा, समग्र ग्राम्य विकास,सामाजिक समरसता,धर्म जागरण , सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण और मुख्य मार्ग विस्तार । 43 सम वैचारिक संगठन जो 6 समूहों में विभाजित किए गए हैं यथा वैचारिक,शिक्षा,आर्थिक , सामाजिक , सेवा एवं सुरक्षा समूह के अंतर्गत आते हैं । डेढ़ लाख से अधिक सेवा कार्य सम्पूर्ण देश में स्वयंसेवकों एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा संचालित हैं ।उनहत्तर हज़ार से अधिक स्थानों पर दैनिक प्रातः एवं सायं शाखाएं लगतीं है। सैतीस हज़ार साप्ताहिक मिलन, सत्रह हज़ार मासिक मिलन,व मंडली संचालित हैं। सम्पूर्ण विश्व को पाँच भागों में विभक्त कर विदेशों में तीन हज़ार से अधिक स्थानों पर भारतीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू स्वयंसेवक संघ नाम से विदेश विभाग शाखाएं संचालित कर रहा है।संघ के शताब्दी वर्ष में पंचप्रण नामक पंचमुखी कार्य योजना कार्यान्वित की जा रही है जो क्रमशः सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण , स्वदेशी भाव जागरण एवं नागरिक कर्तव्य के रूप में संचालित है। इसके अतिरिक्त विमर्श एवं सज्जन शक्ति संपर्क, समन्वय भाव जागरण का भी कार्य सम्पादित किया जा रहा है।

       रामजन्मभूमि आंदोलन के समय 1992 में अयोध्या में ग्राउंड जीरो से सम्पूर्ण विश्व को त्वरित समाचार हिंदी और अंग्रेजी में उपलब्ध कराने के उद्येश्य से प्रथम विश्व संवाद केंद्र स्थापित किया गया था जो बाद में लखनऊ में ट्रस्ट के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया था । आज ऐसा ही विश्व संवाद केंद्र 35 की संख्या में सम्पूर्ण भारत के सभी प्रदेशों में अपनी भवनों में स्थापित एवं संचालित हैं।यहाँ से विभिन्न पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन ,प्रेस वार्ता, नारद जयंती, विभिन्न महापुरुषों की जयंतियाँ, पत्रकार मिलन एवं सम्पर्क, गोष्ठियां आदि संचालित हो रहें है।

         संघ के छ कार्य विभाग के अंतर्गत प्रचार विभाग की जो स्थापना सम्पूर्ण भारत में की गई है उसका आज भी उद्देश्य राष्ट्रीय विचारों का प्रसार करना ,राष्ट्र विरोधी विभाजनकारी अलगाववादी शक्तियों के प्रति समाज में जागरूकता निर्माण और हिंदुत्व की सकारात्मक बातें, तथ्यात्मक जानकारी मीडिया के माध्यम से समाज तक पहुंचाना है। प्रचार विभाग का कार्य संघ का प्रचार करना या किसी व्यक्ति का प्रचार करना नहीं है। संघ की कार्य पद्दति ही प्रचार है । 

          प्रचार की जो पद्धति अपनायी जाती है उनमें प्रमुख हैं :- सोशल एवं इलेट्रानिक मीडिया के उपलब्ध माध्यमों का उपयोग,अपनी समानांतर प्रचार व्यवस्था खड़ा करना ,जहाँ कार्य नहीं वहाँ विचार पहुँचाने के उद्देश्य से जागरण पत्र/पत्रिकाओं का प्रकाशन,पांचजन्य एवं ऑर्गनाइज़र जैसी राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं का प्रकाशन,साहित्य विक्री, कंटेंट जेनरेशन,नागरिक पत्रकारिता प्रशिक्षण,मीडिया संवाद के अंतर्गत पत्रकारों की मीडिया प्रोफ़ाइल तैयार करना,मीडिया के मालिकों से ले कर रिपोर्टरों तक का नाम पता ईमेल,फ़ोन,और उनके विचारों की जानकारी रखना,मीडिया संपर्क का तंत्र विकसित करना, पत्रकारिता के छात्रों से संपर्क व संवाद ,टी वी पैनल डिस्केशंस में अपना विचार रखने वाले कार्यकर्ता का निर्माण करना,नारद जयंती आयोजित कराना,पत्रकारों के लिए संघ परिचय वर्ग तथा मीडिया कॉनक्लेव आयोजन ,संघ के बड़े उत्तरदायित्व धारी अधिकारियों के प्रवास के समय पत्रकारों से उनके निवास या कार्यस्थल पर सम्पर्क कराना ,स्तंभ लेखकों ,संपादकों , ब्लॉगरों, पोर्टल संचालकों से संपर्क , साहित्योसव मनाना, फ़िल्म महोत्सव का आयोजन करना , शाखा / नगर स्तर तक प्रचार दायित्वधारी बनाना , तथा प्रचार कार्यालयों की स्थापना , संसाधन, टेक्नोलॉजी , आर्थिक व्यवस्था , क़ानूनी व्यवस्था तथा प्रचार के सभी 

 की टोली खड़ी करना व वार्षिक कैलेंडर बनाना ।

       प्रचार विभाग के नौ आयाम तथा प्रांत स्तर तक आयाम प्रमुखों को दायित्व सौपना भी प्रचार विभाग का कार्य है । ये नौ आयाम है क्रमशः जागरण पत्रिका, सोशल मीडिया,स्तंभ लेखक,फ़िल्म , कार्यालय व्यवस्था,साप्ताहिक पत्रिका,साहित्य विक्री,कंटेंट जेनेरेशन तथा मीडिया संवाद ।

      अखिल भारतीय स्तर से ले कर नगर स्तर तक सम्पूर्ण भारत में प्रचार प्रमुख का गठन है । प्रांत स्तर पर डाटा बैंक , आर्काइव्स प्रकोष्ठ स्थापना , पुस्तकालयों की स्थापना , मीडिया मानेटरिंग का कार्य , पेपर कटिंग , समाचार तथा सूचनाओं का प्रेषण , फोटोग्राफी व वीडियो कैमरों का संचालन कार्य संपन्न होता है । यथा आवश्यकता वीडियो एवं साउंड स्टूडियो भी संचालित है। कम्युनिटी रेडियो स्टेशन का भी संचालन अपेक्षित रहता है।रेडियो जॉकी से भी संपर्क तथा उन्हें सांस्कृतिक , महापुरुषों की जीवनियाँ आदि उपलब्ध कराया जाता है।टीवी सीरियल निर्माता , फ़िल्म निर्माताओं , फ़िल्म निर्देशकों , फ़िल्म लेखकों आदि से भी सम्पर्क कर के उनको देशभक्ति पूर्ण निर्माण एवं लेखन के प्रति प्रेरणा देने का अनुरोध किया जाता है । फ़िल्मों में भी भारतीय विचारमूल्य दिखे यह अनुरोध रहता है।इन सब कार्यों के लिए अपने कार्यकर्ताओं को बराबर कार्यशालाओं के माध्यम से प्रशिक्षित भी किया जाता है।आज प्रचार कार्यकर्ता पर्यावरण, स्वच्छता,दिव्यांग कल्याण्, नारी स्वाभिमान जागरण,सांस्कृतिक मूल्यों का पुनर्जागरण में सहायता, सहभागिता कर रहा है। 

                        लेखक विश्व संवाद केंद्र लखनऊ के सचिव तथा उत्तर प्रदेश प्रांतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी हैं।

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Friday, 15 September 2023

 

इंडिया की जगह भारत बोलें  

                  अशोक सिन्हा

      भारत देश  को स्वतन्त्र हुए 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में देश अमृत महोत्सव मना  रहा है | इस अवसर पर देशवासियों ने स्वावलंबन, “स्व” की पहचान को बढ़ावा देने वाले प्रतीकों को प्राथमिकता देना और आत्मनिर्भरता की शपथ ली है|गुलामी के चिन्हों को हटा कर आत्मगौरव जगाया जा रहा है | ऐसे समय पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक श्री मोहन भागवत जी ने देशवासियों का आह्वान किया है कि हमें दैनिक व्यवहार में india  के स्थान पर अपने देश के प्राचीन नाम भारत का ही अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए| यह आह्वान सर्वथा समीचीन और सार्थक है | स्वतंत्रता के बाद भारतीय संस्कृति.सभ्यता, और सनातन धर्म की अत्यधिक उपेक्षा हुई है | संविधान निर्माण के समय इस देश का एक ही नाम रखा जाय इस पर बहुत बहस हुई थी| अधिकाँश की राय थी की भगवान् ऋषभदेव के पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर (स्कन्द पुराण,अद्ध्याय 37) इस देश का नाम भारत पड़ा अतः संविधान में देश का नाम  भारत ही रक्खा जाय | इस बात का समर्थन करने वाले सेठ गोविन्द दास,कमलापति त्रिपाठी ,कल्लूर  सुब्बा राव,,राम सहाय और हरगोविंद पन्त प्रमुख सदस्य थे | बाबा भीमराव आम्बेडकर जी ने भी बहुत अच्छी बहस की | इस अवसर पर सभा को अवगत कराया गया कि india नाम कोई बहुत पुराना नाम नहीं है |वेदों में तथा  पुराणों में कहीं  इसका जिक्र नहीं है | इसका प्रयोग यूनानियों, और अंग्रेजों ने देश की पहचान धूमिल करने हेतु  प्रारम्भ किया था | इसमें  भारत की आत्मा नहीं झलकती है|परन्तु अनेक तर्कों के बाद भी संविधान के अनुक्षेद एक में India that is Bharat लिखा गया | यह नामकरण निहित दृष्टिकोण से किया गया | अब भारत के स्वतन्त्र हुए 75 वर्षों का कालखंड बीत गया है  और आज भी कुछ लोग भारत जैसे प्राचीन नाम के स्थान पर  India नाम को अधिक प्रयोग करते हुए अपने को गौरवान्वित अनुभव कर रहें हैं | ऐसे लोग भूल जातें है की यह युग भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण  का काल है |हम गुलामी के हर चिन्ह को मिटाना चाहतें है

 

 व्याकरण के अनुसार विशिष्ठ नाम ( प्रॉपर नाउन ) का अनुवाद नहीं होता है |जैसे किसी व्यक्ति का नाम हजारा सिंह हो तो उसे इंग्लिश में  थाउजेंडा सिंह नहीं कहेंगे ,क्यों की यह उसका विशिष्ठ नाम है |उसे अंग्रेजी भाषा में भी  Hajara Singh ही लिखा जायेगा | इसी प्रकार धर्म को भी अंग्रेजी भाषा में Dharma ही लिखा जाता है | देश के नाम में यही सूत्र काम  करता है | अमेरिका को English में भी America ही कहते हैं| जापान को English में भी Japan ही कहते हैं| भूटान को English में भी Bhutan ही कहते हैं| श्रीलंका को English में भी Sri Lanka ही कहतेहैं, बांग्लादेश को English में भी Bangladesh ही कहतें और बोलते है | नेपाल को English में भी Nepal ही कहते हैं, पाकिस्तान को English में भी Pakistan ही कहते हैं| फिर भारत को English में India क्यों कहते हैं? Oxford Dictionary के पृष्ठ नं० 789 पर लिखा है Indian जिसका मतलब ये बताया है old-fashioned & criminal peoples अर्थात् पिछडे और घिसे-पिटे विचारों वाले अपराधी लोग। अत: इण्डिया (India) का अर्थ हुआ असभ्य और अपराधी लोगों का देश। भारत माता तथा भारतीयों का अपमान करने के लिए विदेशियों ने भारत को India  नाम रखा था। इससे देश में भ्रम उत्पन्न हुआ और हम स्व से दूर होते गए | फलतः  भारत के तीन नाम प्रचालन में आ गए 1- भारत 2- हिंदुस्तान  3- India.

भारत नाम  की प्राचीनता के कई प्रमाण प्राचीन ग्रंथो में उपलब्ध है | विष्णु पुराण में वर्णन आया है :-

 उत्तरम् यत् समुद्रस्य, हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।

 वर्षं तद् भारतम् नाम, भारती यत्र संतति:।।

                                   - विष्णु पुराण 2.3.1

अर्थात्: समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो देश स्थित है उसका नाम "भारत" है और उसकी संतानें यानी उसके निवासी "भारती" कहे जाते हैं|

 

विष्णु पुराण के दूसरे खंड के तीसरे अध्याय के 24वें श्लोक के अनुसार-

 

गायन्ति देवाकिल गीतकानिधन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयपुरूषा सुरत्वात्

अर्थ है- देवता हमेशा से यही गान करते हैं कि, जिन्होंने स्वर्ग और अपवर्ग के बीच में बसे भारत में जन्म लिया, वो मानव हम देवताओं से भी अधिक धन्य हैं.

महाभारत के आदिपर्व में दूसरे अध्याय के श्लोक 96 के अनुसार -

शकुन्तलायां दुष्यन्ताद् भरतश्चापि जज्ञिवान
यस्य लोकेषु नाम्नेदं प्रथितं भारतं कुलम्

अर्थ है- राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत के नाम से यह भरतवंश संसार में प्रसिद्ध हुआ.  दुष्यंत और शकुंलता की प्राचीन प्रेम कहानी बहुत प्रचलित है. राजा दुष्यंत और शकुंतला के बेटे के नाम भरत पर ही देश का नाम भारत पड़ा

 

भागवत पुराण के अध्याय में एक श्लोक के अनुसार-

येषां खलु महायोगी भरतो ज्येष्ठश्रेष्ठगुण
आसीद् येनेदं वर्षं भारतमिति व्यपदिशन्ति

अर्थ है कि- भगवान ऋषभ को अपनी कर्मभूमि अजनाभवर्ष में 100 पुत्र प्राप्त हुए थे, जिनमें उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र महायोगी भरत को अपना राज्य दिया.कहा जाता है कि इन्हीं के नाम से देश का नाम भारतवर्ष पड़ा.

इसके साथ ही अन्य पुराण जैसे स्कंद पुराण, ब्रह्मांड पुराण, अग्नि पुराण और मार्कंडेय पुराण आदि में भी भारत नाम का उल्लेख  मिलता है. यही कारण है कि, आज भी जब हिंदू धर्म में कोई भी पूजा या अनुष्ठान होते हैं तो इसकी शुरुआत में जब संकल्प लिया जाता है तो इसमें भारत के कई प्राचीन नामों का उच्चारण किया जाता है. जैसे जम्बू द्वीपे भारत खंडे आर्यावर्ते आदि , लेकिन इन नामों में इंडिया का जिक्र नहीं आता है | हम भारत माता की जय का उद्घोष बड़े गर्व से करते है | यह नारा स्वतंत्रता संग्राम का नारा है | गाँधी जी ने भारत छोड़ो का नारा दिया था | हौसला बढ़ने वाले शब्द मन को मजबूत करतें है |

संविधान का पहला अनुच्छेद इन शब्दों के साथ शुरू होता है : इंडिया, दैट इज़ भारत...।इसे भारत दैट इज इंडिया भी लिखा जा सकता है | राष्ट्रगान में भारत भाग्य विधाता  शब्द प्रमुखता से आता है। भारत संचार निगम लिमिटेड, भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड, भारत पेट्रोलियम जैसे दर्जनों उदाहरण हैं। ऐसा नहीं है कि भारत शब्द अचानक ही देश की चेतना में लाया  जा रहा हो। भुबनेश्वर, ओडिशा की हाथीगुम्फा के अभिलेखों में इसके पहले प्रमाण मिलते हैं। कलिंग के राजा खारवेल (50 ई.पू.) के साम्राज्य का वर्णन करते हुए यह अभिलेख कहता है कि अपने शासनकाल के दसवें वर्ष में उन्होंने भारतवर्ष की विजय का अभियान छेड़ा। भारत या भारतवर्ष शब्द से भारतीयों का गहरा भावनात्मक लगाव है और कोई भी इसे ठेस नहीं पहुंचाना चाहेगा। खुद पं. नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में लिखा है कि भारत माता का मतलब है उसके लोग और उसकी जीत का मतलब है उसके लोगों की जीत। अमिताभ बच्चन और वीरेंद्र सहवाग ने  भारत नाम के  पक्ष में  टिप्पणियां कीं। अक्षय कुमार ने अपनी आगामी फिल्म की टैगलाइन बदल ली। लॉजिस्टिक कंपनी ब्लू डार्ट ने बड़ा एलान किया है। कंपनी ने अब अपनी प्रीमियम सेवा डार्ट प्लस का नाम बदलकर भारत प्लस कर दिया है। ब्लू डार्ट कंपनी  ने अपने फैसले की वजह बताते हुए कहा, "यह कदम हमारे उपभोक्ताओं की लगातार विकसित होती जरूरतों के साथ कदमताल करने की प्रक्रिया के लिए लक्षित है।" कंपनी ने कहा कि वह सभी हितधारकों को इस बदलाव वाली यात्रा से जुड़ने का न्योता देती है, जिससे हम भारत को पूरी दुनिया और दुनिया को भारत से जोड़ना जारी रख रहे हैं। प्रधानमंत्री इंडोनेशिया यात्रा पर गए तो अधिकृत घोषणा की गई कि भारत के प्राइम-मिनिस्टर आसियान समिट में शामिल होने जा रहे हैं! 

                                 भारत की प्राचीनता को ध्यान में रखते हुए भारत के सर्वोच्य न्यायालय में इस देश का नाम केवल भारत रखने के लिए एक वाद भी दायर किया गया था जिसको एस. ऐ . बोबडे की अध्यक्षता में तीन जजों की खंड पीठ ने वाद को निरस्त कर दिया था | तर्क यह दिया गया था कि संविधान के अनुसार दोनों ही नाम प्रयोग किया जा सकता है | राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मू ने जी 20 सम्मलेन के अवसर पर सितम्बर २०२३ में  जब रात्रिभोज  के अवसर पर भेजे गए निमंत्रण पत्र पर प्रेसिडेंट ऑफ़ भारत लिखा तब  विपक्ष के दलों ने हंगामा खड़ा किया की देश का नाम बदलने का प्रयास हो रहा है | मोदी I.N.D.I.A. नामक विपक्षी गठबंधन को घृणा करते हैं और उसे तोड़ना चाहतें है | नरेंद्र मोदी ने इसकी बिना परवाह करते हुए समेलन में भारत के प्रधानमंत्री का खूब प्रयोग किया और नाम पट्टिका भी लगाई | पूरे  विश्व में सन्देश गया कि भारत अपने पुराने नाम भारत से ही विश्व में पुकारा जाना पसंद करता है | देश के निवासियों में इस कारण गर्व की अनुभूति हुई और एक नवचेतना का संचार हुआ | आज आवश्यकता इस बात की है कि जनभावना और भारत के “स्व” का पुनर्जागरण करने हेतु हम भारत के लोग इंडिया के स्थान पर आज से केवल भारत नाम का ही प्रयोग करें तथा राजनीतिज्ञों को विवश करें की समय और सामर्थ्य आने पर जनभावना के अनुसार संविधान में संशोधन कर के देश का एक ही नाम भारत करें |

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* लेखक उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी हैं |सम्प्रति विश्व संवाद केंद्र लखनऊ के सचिव |संपर्क :९४५३१४००३८

 

          

 

 

 

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