Thursday, 21 May 2026

आत्मबोध जगाता वि.हिन्दू परिषद का कार्यकर्ता विकास वर्ग 

लेखक:- अशोक सिन्हा , उपाध्यक्ष , विश्व संवाद केंद्र, अवध , लखनऊ।

             विश्व हिंदू परिषद को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समवैचारिक संगठन के परिप्रेक्ष्य में देखना अनुचित नहीं होगा क्योंकि इसे संघ के स्वयंसेवकों ने साधु संतों तथा समाज के सहयोग से सांस्कृतिक और धार्मिक स्तर पर उस अवश्यकता के प्रत्युत्तर में स्थापित किया था जिसमें हिंदू समाज की सांस्कृतिक पहचान,, परंपराओं , धार्मिक संस्थानों के संरक्षण तथा वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक संवाद की आवश्यकता स्थापित करना था। संगठन का उद्देश्य समाज को सांस्कृतिक आधार पर संगठित करना , समरसता को बढ़ावा देना - कार्यों का विस्तार करना और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को सुदृढ़ करना है। समाज में सांस्कृतिक जागरूकता, धार्मिक सहिष्णुता , परम्पराओं के प्रति सम्मान और सामूहिक पहचान की भावना का विस्तार सहित सामाजिक एकता और आत्मबोध को इस संगठन की स्थापना से बल मिला है ।

                   विश्व हिंदू परिषद की स्थापना श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन वर्ष 1964 में मुंबई के पवई स्थित स्वामी श्री चिन्म्यमनंद के संदीपनी आश्रम में हुई । स्वयं सरसंघचालक माधवराव सदाशिव गोलवरकर के पहल पर और उनकी देखरेख में इस संगठन की नींव पड़ी । विश्व कल्याण की कामना से विश्व के हिंदुओं का सशक्त और अजेय संगठन खड़ा करना , हिंदू दर्शन , आस्थाओं,जीवन मूल्यों, परंपराओं, धर्म की रक्षा करने के साथ-साथ विश्वभर में फैले हिंदुओं से समन्वय स्थापित करना संगठन का प्रमुख कार्य है। संगठनात्मक तंत्र में सम्पूर्ण भारत को तेरह क्षेत्रों,47 प्रांतों,353 विभागों, 1125 जिलों, 10,330 प्रखंडों, 21,205 खंडों और 46,588 ग्राम व बस्तियों में बाटा गया है। विदेश के राष्ट्रों में चैप्टर स्थापित हैं। भारत में प्रन्यासी मंडल में 143 और विदेशों में 73 सदस्य कार्यरत हैं। इसके केंद्रीय स्थायी समिति के सदस्यों की संख्या 16 और कार्यकारिणी में 76 सदस्य हैं । अपनी स्थापना के बाद इसकी प्रथम विश्व हिंदू सम्मेलन प्रयाग कुंभ में जनवरी 1966 में संपन्न हुई जिसमें मैसूर महाराज चमराज वाडियार अध्यक्ष और दादासाहेब आप्टे जी को महामंत्री घोषित किया गया । परावर्तन (घरवापसी) को एक मुख्य कार्यक्रम घोषित किया गया। संगठन का बोधवाक्य “ धर्मो रक्षति रक्षितः “ और बोध चिन्ह “ अक्षय वटवृक्ष “ निर्धारित किया गया । द्वितीय विश्व हिंदू सम्मेलन जनवरी 1979 में पुनः प्रयाग कुंभ में हुआ जिसमें अट्ठारह राष्ट्रों के साठ हज़ार हिंदुओं सहित देश के समस्त शंकराचार्य, स्वामी, दलाई लामा, नागारानी गाईडील्यू की सहभागिता रही । प्रकृति पूजक बनवासी समुदाय हिंदू समाज का ही अभिन्न अंग है , इसकी घोषणा हुई।दिसम्बर 1969 में कर्नाटक के उडुपी धर्म संसद में हिंदुओं में छुआछूत को शास्त्र- बाह्य घोषित करते हुए उद्घोष किया गया कि “ हिंदव: सोदरा सर्वे, ना हिंदू पतितो भवेत “। इस घोषणा को व्यवहारिक रूप देने के लिए 1994 के धर्म संसद में काशी के डोमराजा को अनेक संतों द्वारा निमंत्रण दे कर उनके घर खिचड़ी को प्रसाद रूप में ग्रहण कर अगले दिन धर्मसंसद में मंच पर साधुसंतों के मध्य बैठा कर स्वागत किया गया। 

     विश्व हिंदू परिषद के महिलाओं के मध्य एक आयाम के रूप में दुर्गा वाहिनी और पुरुषों के मध्य बजरंग दल का गठन करना दूरगामी सोच का परिणाम था। 1982 में एकात्मकता यात्रा का आयोजन हुआ जिसमें छ करोड़ हिंदुओं में सहभाग किया। वर्तमान में परिषद के विभिन्न आयामों द्वारा 7152 सेवाकार्य शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक और स्वावलंबन के क्षेत्रों में संचालित हो रहें हैं। गोरक्षा एवं गोसंवर्धन के अंतर्गत नस्लसुधार , पंचगव्य अनुसंधान केंद्र , औषधि निर्माण केंद्र आदि संचालित हो रहे हैं। बजरंग दलों और गौरक्षकों द्वारा पच्चीस लाख गायों को कसाइयों के हाथों से मुक्त कराया गया। चालीस लाख हिंदुओं का मत परिवर्तन रोकने के साथ नौ लाख हिंदुओं की घर वापसी करायी गई है। श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन का एक नियोजित संघर्ष शिलापूजन , कारसेवा, न्यायालय में वाद का क्रमबद्ध कार्यक्रम विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल दुर्गा वाहिनी सहित समस्त राष्ट्रवादी संगठनों ने चलाया । 2024 का अक्षत आंदोलन और 2026 में मंदिर की सम्पूर्णता कार्यक्रम सबसे प्रभावी कार्यक्रम रहे । इसके अतिरिक्त श्री राम सेतु रक्षा , जम्मू एवं काश्मीर की अमरनाथ यात्रा कार्यक्रम में बजरंगदल जैसे संगठनों ने अतुलनीय योगदान किया । ग्यारह राज्यों में धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम पास कराना और समरसता कार्यक्रमों के माध्यम से परिषद ने जो कार्यकर्ताओं की फ़ौज खड़ी की यह आज के युवाओं के प्रेरणास्रोत बने।

             दुर्गा वाहिनियाँ और बजरंग दल सहित विश्व हिंदू परिषद के देव- देवियों ने जो राष्ट्र को योगदान दिया और बड़े बड़े कार्य संपादित किए इसके पीछे उनका समर्पण, अनुशासन, निष्ठा, राष्ट्रभक्ति और देशसेवा की भावना जगी एक अनूठे संगठन क्षमता और गहन प्रशिक्षण से जो प्रतिवर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक के आयोजित होने वाले संघ शिक्षा वर्ग के समतुल्य प्रशिक्षण कैंपों से जिसे परिषद प्रतिवर्ष देश विदेशों में प्रतिवर्ष आयोजित करता है।दुर्गावाहिनी , विश्व हिंदू परिषद तथा बजरंगदल के प्रशिक्षण शिविर वर्ष में एक बार अक्सर मई या जून के महीनों में आयोजित होते हैं क्यों की इस समय स्कूल कॉलेजों में अवकाश रहता है जिससे स्कूल प्रबंधन से बात कर वहाँ भवन और मैदान प्राप्त किया जा सकता है। छात्रों की गर्मियों की छुट्टी रहती है अतः उनको भी भाग लेने में आसानी होती है। यह शिविर बीस दिनों या उससे भी अधिक दिनों के आयोजित होते हैं। कार्यकर्ताओं और प्रशिक्षणार्थिओं को इतने दिनों तक घर जाने की अनुमति नहीं होती है। वे पूरे चौबीस घंटे का प्रशिक्षण कार्यक्रम बना कर वहीं अपना बिस्तर , खाने के बर्तन व आवश्यक कपड़े लेकर पूर्ण समर्पित भाव से वहाँ जातें है। मोबाइल प्रयोग की वहाँ अत्यंत न्यूनतम समय के लिए अनुमति रहती है। पूरे भवन और प्रशिक्षार्थियों की सुरक्षा व्यवस्था कार्यकर्ता स्वयं शिफ्टवार ड्यूटी लगा कर करतें हैं। वहाँ अस्थाई रूप से कार्यालय, भोजनालय, अतिथि कक्ष, स्टोर, चिकित्सालय, बौद्धिक कक्ष, प्रेस रूम, स्वागती कक्ष , योग , खेल , व्यायाम के लिए मैदान आदि की व्यवस्था प्रशिक्षण के पूर्व ही व्यवस्थित कर ली जाती है। समुचित शौचालयों, स्नानघर की व्यवस्था भी बनाई जाती है। व्यवस्था पर आने वाले व्यय को स्वयं कुछ सीमा तक प्रशिक्षणार्थी वहन करते है तथा कम पड़ने पर समाज , मंदिरों या धार्मिक संस्थाओं से चंदा माँग कर पूरा किया जाता है। भोजन व्यवस्था, रक्षा व्यवस्था, मीडिया प्रबंधन, बौद्धिक विभाग, परिवहन एवं पार्किंग विभाग, व्यवस्था विभाग,स्वक्षता विभाग, अतिथि विभाग, शारीरिक शिक्षण विभाग , प्रशिक्षक व्यवस्था और शिविराधिकारी की पूर्ण व्यवस्था शिविर प्रारम्भ होने के एक महीने या और अधिक पहले से ही विधिवत बना ली जाती है तथा तैयारियों का समय- समय पर बैठकें कर के व्यवस्था सुनिश्चित की जाती है।

                   अपने संगठनों की क्या आवश्यकता है। लक्ष्य प्राप्त करने के लिए क्या शारीरिक, बौद्धिक , आर्थिक , रणनीतिक आवश्यकता होगी इसका आंकलन करके ही संपूर्ण व्यवस्था तैयार की जाती है। प्रशिक्षण पाठ्यक्रम और विषयवस्तु क्या होगी इसकी तैयारी बहुत समय पहले से ही की जा चुकी होती है। प्रातः चार बजे से रात्रि शयन तक का पूर्ण कार्यक्रम पोस्टर बना कर नोटिसबोर्ड पर लगा दिया जाता है और सभी को सामूहिक एकत्रीकरण के समय घोषित कर के समझा दिया जाता है। सबके वस्त्रों और उनके रंगों के बारे में पहले से ही सूचना रहती है। प्रातःकाल उठते ही नित्यक्रिया से निपटने के बाद एक बड़े हाल में एकत्र हो कर प्रार्थना, प्रातः स्मरण पाठ का वाचन आदि करने के बाद सभी मैदान में पहुँच जाते हैं जहाँ शारीरिक गतिविधियों, खेलकूद , नियुद्ध, दंड प्रहार आदि के कार्यक्रम होते है । सम्पूर्ण उपस्थित संख्या को आयु, क्षमता के अनुसार गटों में विभाजित कर के खेल- कूद , व्यायाम कराए जातें है। प्रातः आठ बजे तक एक से डेढ़ घंटे का अवकाश जलपान के लिए दिया जाता है। पुनः दस बजे से भोजन अवकाश के मध्य तक विभिन्न आवश्यक विषयों पर बौद्धिक ( लेक्चर ) का आयोजन होता है। प्रबोधन से कुशल व्यवस्था संपादन का लक्ष्य लेकर यह कालांश पूर्ण किया जाता है। तत्पश्चात सामूहिक भोजन और विश्राम का समय होता है । सायंकाल का समय खेल कूद , विभिन्न शारीरिक और सैन्य रणनीति के अनुसार कार्य करने का होता है । संध्या वंदन वि लघु अवकाश के बाद रात्रि में सामूहिक भोजन तत्पश्चात सामूहिक सभा में चर्चा , बौद्धिक, प्रश्नोत्तर , तथा रात्रि दस बजे सिटी बजने पर रात्रि विश्राम हेतु निर्धारित स्थान पर जाना।

             दुर्गा वाहिनी और बजरंगदल के शिविर अलग- अलग होते है । दुर्गा वाहिनी के शिविर में आत्मरक्षा हेतु नियुद्ध, दंड प्रहार, और अस्त्र- शस्त्रों का विशेष प्रक्षिक्षण दिया जाता है। ऐसे विकास वर्ग में समाज को ध्येय के साथ जोड़ना, अनुशासन का कठोर अभ्यास करना, सबको साथ लेकर काम करना , अहंकार विहीन आत्मविश्वास उत्पन्न करना, सहकारियों से परामर्श करते हुए लक्ष्य पूरा करना , सहकारियों को अवसर एवं प्रोत्साहन देना , संकट के समय स्वयं आगे रहना , श्रेय सबको बाँटना, स्वयं पीछे रहना, आपदा प्रबंधन, समाज सुरक्षा , धर्म रक्षा हेतु कटिबद्ध रहना और अपने जैसा कुशल कार्यकर्ता निर्माण करना आदि गुण विकसित होते हैं।


From Blogger iPhone client

Sunday, 22 March 2026

भारतीय नववर्ष का महत्व

भारतीय नववर्ष का महत्व 


लेखक :- अशोक कुमार सिन्हा, 

        उपाध्यक्ष,विश्व संवाद केंद्र , लखनऊ ।

               भौतिकवादी विश्व को भारतीय विचारधारा एवं ज्ञान- विज्ञान ने प्रभावित किया है । भारत सृष्टि रचना का मूल विंदु है। वर्षों पूर्व कालगणना का केंद्र भारत की अवंती ( वर्तमान उज्जयिनी )नगरी ही थी। भारतीय नववर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नवसंवत्सर के रूप में प्रारम्भ होता है । प्राचीनतम सनातन धर्म में नवसंवत्सर उपयोगी , प्रभावी एवं व्यवहारिक है । भारत भूमि देवताओं के द्वारा पूजित है।भारतीय संस्कृति में प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठा कर जीवन जीना सिखाया जाता है। काल को निरंतर और चिरगामी माना जाता है ,यह अनादि है शिव है एवं समस्त ब्रह्मांड का मूल कारण है। ऋषि प्रज्ञा भारतीय वेद , दर्शनशास्त्र की यह पराकाष्ठा सम्पूर्ण अस्तित्व के समग्र चिंतन का परिचायक है।आधुनिक विज्ञान मानता है कि कालयात्रा एक बिंदु से प्रारंभ होती है । बिग- बैंग जब होता है वहाँ से सृष्टि की उत्पत्ति मानी जाती है। अन्य प्राचीन काल गणनाओं में से भारतीय कालयात्रा ही मात्र एक है जो आधुनिक विज्ञान के साथ मेल खाती है क्यों की भारतीय मनीषियों ने काल को खंड में भी बड़ी सुंदरता से समझा है और प्रस्तुत किया है। गणना सूक्षतम माप से लेकर विशाल स्तर तक अलग-अलग संज्ञाओं से की गई है जो ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान स्थिति तक काल यात्रा के रूप में वर्णित हैं।भारत में विविधता में एकता का एक सर्व समावेशी दर्शन मान्य है । संस्कृति सबकी एक चिरंतन खून रगों में हिंदू है , यह गीत हम संघ की शाखाओं में गाते आए हैं । भारत एक बड़ा देश है । भाषा, रहन - सहन , वेशभूषा , खानपान , रंगरूप में भिन्नता होने पर भी पूरे राष्ट्र में सांस्कृतिक एकता ही इस देश की धरोहर है । पूरे भारतवर्ष में विभिन्न नामों से नववर्ष मनाए जातें हैं जिसमें मुख्य हैं वसंतोत्सव, चैत्रमाह प्रतिपदा , बंगाल का नववर्ष है नवरात्र , आंध्र तेलंगाना में इसे कहतें हैं उगादि, तमिल क्षेत्र में इसका नाम है - विशु। महाराष्ट्र में नववर्ष है गुड़िपाड़वा । उत्तरपूर्व के राज्यों में इसे बिहू के नाम से जानते हैं।केरल में पोंगल को नव वर्ष होने का गौरव प्राप्त है। जैन मतावलंबी 13 पंथी श्रमण दीपावली को महावीर स्वामी की अवतरण तिथि एवं नव वर्ष के रूप में आयोजित करतें है। राजस्थान और गुजरात में व्यापारी इसी तिथि से नई बहियाँ बनाते हैं , पंजाबी इसे वैशाखी और सिंधी इसे चेटीचंद से जोड़ते हैं। सौराष्ट्र में इसे तुलसी विवाह कहतें हैं , पारसी इसे नवरोज नाम देते हैं ।आर्यसमाज इसे आर्यवत्सर कहता है।इस प्रकार भारतीय जीवन में यह नववर्ष एक ओर आध्यात्म और दूसरी ओर कृषि उत्पादन से प्रभावित है।लंबे कालखंड के ग़ुलामी में आत्मविस्मृति एवं आत्महीनता से ग्रस्त मैकाले एवं मार्क्स के मानसपुत्रों के प्रभाव से ग्रस्त स्वतंत्र भारत के राजपुत्रों नें पश्चिमी जगत के भौतिक चकाचौंध से अभिभूत होकर ग्रेगेरियन कैलेंडर पर आधारित पहली जनवरी को नववर्ष मनाना स्वीकार कर लिया। 1952 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नें प्रोफेसर मेघानाद साहा की अध्यक्षता में पंचांग सुधार समिति बनाई थी । इसी समिती के सुझाव पर ग्रेगेरियन कैलेंडर का पिछलग्गू शक संवत् बना जिसे राष्ट्रीय पंचांग कहा गया । भारत सरकार ने स्वयं को भारतीय संस्कृति का पुजारी दर्शाने के लिए 22 मार्च 1957 को पंचांग भी लागू कर दिया।

              युग - युग से भारतीयों का यह मत रहा है कि मानव जीवन महाकाल की अखंड उपासना है।ब्रह्मांड चिंतन करते हुए खगोल तथा भूगोल की दशा और दिशा का विचार करके सूर्य चंद्र तथा नक्षत्र अंतरिक्ष का पूर्वाभास करके फलित गणित के आधार पर जो समयसारणी तैयार की गई उसे पंचांग कहा जाता है । उसके सहारे ग्रहगोचर स्थिति के शुभाशुभ योग की गणना की जाती है।इसकी परंपरा वैदिक युग से प्राप्त होती है किंतु इसे व्यवस्थित रूप दिया महाराज विक्रमादित्य ने । इस लिए भारतीय लोकजीवन में नववर्ष को विक्रम संवत्सर कहा जाता है । भारतीयों का यह नववर्ष प्रारंभ होता है चैत्र प्रतिपदा से । इसे संस्कृति का स्वर्णिम प्रभात कहा जाता है । भगवान भुवन भास्कर अपनी सिंदूरी किरणों के साथ जब उदयाचल से अवतरित होते हैं तब हम उसे भक्तिभाव पूरित प्रणामांजलि अर्पित करते हैं और फिर प्रारंभ होती है नववर्ष की मंगलबेला । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सामाजिक महत्व के जिन छ उत्सवों को वर्ष भर में मनाता है उनमे यह वर्ष प्रतिपदा के नाम से प्रसिद्ध है ।ब्रह्म पुराण के अनुसार ब्रह्माजी ने चैत्र मास शुक्लपक्ष के प्रथम दिन सूर्योदय होने पर जगत सृष्टि की । इसी कारण उसी दिन से नए संवत्सर का प्रारंभ माना जाता है ।राष्ट्र के स्वाभिमान व देश प्रेम को जगाने वाले अनेक प्रसंग चैत्रमास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से जुड़े हुए हैं ।

ऐतिहासिक महत्व :

1- शृष्टि रचना का प्रथम दिन : आज से एक अरब 95 करोड़ 58 लाख 85 हज़ार 128 वर्ष पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्मा जी ने जगत की रचना की थी।

2- प्रभु राम का राज्याभिषेक दिवस: प्रभु राम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अयोध्या आने पर अपने राज्याभिषेक के लिए चुना।

3-नवरात्र स्थापना: शक्ति आराधना और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नौरात्रि प्रारम्भ, कलश स्थापना , पूजन और ध्वजारोहण का दिन।यह शुभ दिन इस वर्ष 19 मार्च 2026 को पड़ेगा।

4- गुरु अंगददेव जी का प्रकटोत्सव: सिक्ख परंपरा के द्वितीय गुरु का जन्मदिन ।

5- आर्यसमाज स्थापना दिवस :समाज को श्रेष्ठ ( आर्य )मार्ग पर प ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन को आर्यसमाज स्थापना दिवस के रूप में चुना।

6-संत झूले लाल जन्म दिवस: सिंध समाज के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरुणावतार संत झूलेलाल का जन्मदिवस ।

7- डा . केशवराव बलिराम हेडगेवार जन्म दिवस : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक एवं संगठन के आद्य सरसंघचालक डा हेडगेवार का जन्म दिवस।

8- शालिवाहन संवत्सर का प्रारम्भ दिवस : विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना।

9- युगाब्द संवत्सर का प्रथमदिन महाराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक इसी दिन हुआ था ।

10- महाराज विक्रमादित्य द्वारा शकों पर प्राप्त विजय दिवस के उपलक्ष्य में विक्रमी संवत् का प्रारंभ दिवस ।विक्रमी संवत् 2083 का प्रारम्भ इस वर्ष इसी दिन से होगा।

11- युगाब्द संवत्सर 5125 का प्रथम दिन इस वर्ष मनाया जाएगा ।

12- महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन महीना और वर्ष की गणना करते हुए पंचांग की रचना की थी ।

13- इसी तिथि को रेवती नक्षत्र , विष्कुंभ योग में दिन के समय भगवान के प्रथम अवतार मत्स्यरूप का प्रादुर्भाव माना जाता है।

प्राकृतिक महत्व :

              पतझड़ की समाप्ति और वसंत का प्रारम्भ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है। शरद ऋतु के पश्चात व ग्रीष्म के आगमन के पूर्व वसंत अपने चरम पर होता है । सभी पौधों, पेड़ आदि पर नए किसलय निकलतें है। आम के बृक्षों में बौर लगतीं हैं जिसकी मनमोहक सुगन्ध चहुँओर छा जाती है। कोयल की कूंक गुंजायमान होती रहती है। खेतों में फसल उम्मत और परिपक्व अवस्था में पहुँच जाती है।

आध्यात्मिक महत्व:

               वर्ष प्रतिपदा से ही नौरात्री अर्थात् नौ दिन तक शुद्ध सात्विक जीवन जी कर शक्ति की आराधना , दिन-दुखियों की सेवा, सहायता हेतु समाज प्रेरित होता है। सभी मांगलिक कार्य इन नौ दिनों में निर्विघ्न माने जाते हैं। नवें दिन नौ कन्याओं व एक लंगूर ( किशोर) का पूजन कर आदरपूर्वक स्वादिष्ट भोजन करा कर दक्षिणा से उन्हें प्रफुल्लित किया जाता है।

वैज्ञानिक महत्व :

             सौरमंडल के ग्रहों, नक्षत्रों की चाल और निरन्तर उनकी बदलती स्थिति पर ही हमारे दिन , महीने , वर्ष और उनके सूक्ष्मतम भाग आधारित होते हैं।पूरे भूचक्र अर्थात 360 डिग्री को बारह बराबर भागों में बांटा गया है जिसे राशि कहा जाता है। प्रत्येक नक्षत्रों को पुनः चार भागों में बांटा गया है जिसका एक चरण तीन डिग्री बीस मिनट का होता है । जन्म के समय जो राशि पूर्व दिशा में होती है उसे लग्न कहा जाता है।इसी वैज्ञानिक और गणितीय आधार पर विश्व की प्राचीनतम कालगणना की स्थापना हुई।

कैसे मनाये नया वर्ष :

                नव वर्ष की पूर्व संध्या पर दीपदान करें। घरों में सायंकाल सात बजे शंख, घंटा घड़ियाल बजा कर सपरिवार मंगलध्वनि करके नव वर्ष का स्वागत करें। भवनों, व्यवसायिक स्थानों पर भगवा ध्वज गहरायें। द्वार पर शुभकामना तोरण बाँधे। शोसल मीडिया पर , छपे कार्ड द्वारा, यथाशक्ति होर्डिंग, बैनर , बधाई पत्रों, ईमेल, संदेश तथा एस एम एस द्वारा शुभकामना संदेश प्रेषित करे । प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व मंगलाचरण कर सूर्यदेव को प्रणाम करें। प्रभातफेरियां निकाले, हवन करें तथा जीवन के लिए हितकारी एक संकल्प लें। कालोनियों , अपार्टमेंट्स में परिचितों, अपरिचितों सभी से मुलाकात कर बधाई दें मिष्ठान बांटे तथा खुश रहे। वर्ष का प्रारम्भ आनंदित हो कर करें। किसी मंदिर , उपासनास्थल में पूजा करें। मन में स्व जागरण की अनुभूति करें ।आप सभी को नव वर्ष की शुभकानाएँ ।

                 ——-

           


From Blogger iPhone client

Friday, 16 January 2026

राष्ट्र आराधना की प्रेरणा देते संघ गीत

राष्ट्र आराधना की प्रेरणा देते संघ गीत 

             *अशोक कुमार सिन्हा 

          राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदू समाज को संगठित कर उसे शक्तिशाली ,सामर्थ्य संपन्न बनाना चाहता है ।संघ का कार्य एक सार्वजनिक कार्य है।संघकार्य की चेतनाशक्ति कार्यकर्ता स्वयंसेवक हैं ।प्रतिदिन लगने वाली शाखा उसकी कार्यपद्धति है जिसकी पाँच विशेषताएँ है । पहली दैनिक, दूसरी एक घंटे का कार्यक्रम,तीसरी सर्व दूर , चौथी सभी के लिए और पांचवीं सामान्य कार्यक्रम ।प्रयास यह होता है कि जहाँ हिंदू हो वहाँ शाखा लगे ।कहीं पर भी जाइए वहाँ शाखा हो सकती है । कार्यकर्ता इन्ही शाखाओं पर तैयार या उत्पादित होते हैं।संघस्थान की मिट्टी में कार्यकर्ताओं की फसल उगती है।यह कार्यकर्ता समूह में कार्य करने वाला होता है।इस कार्यपद्धति को व्यक्ति निर्माण की संज्ञा मिली है।60 मिनट की सुनियोजित शाखा में शक्ति की उपासना ,अनुशासन,विजिगीषु वृत्ति और देशभक्ति की भावना स्वयंसेवक में विकसित होती है । वह एक सज्जन शक्ति का समुच्चय बन कर उभरता है।शाखा में योग, सूर्यनमस्कार,दौड़, दंड प्रहार,प्राथमिक समता, खेलकूद,देशभक्ति के गीत , अमृत वचनों के साथ मातृभूमि की प्रार्थना की जाती है।संघ के गीत राष्ट्र आराधना की प्रेरणा देतें है।ये गीत संदेशयुक्त प्रेरणादायी और हृदयग्राही होतें है। शब्द इतने सरल, स्पष्ट,मन को छूनेवाले होते हैं तथा सामूहिक गायन के रूप में गाते- गाते हृदय में भावना भर कर कभी-कभी आँसू भी छलका देते हैं ।इसकी एक ही धुन होती है जो जय-जय भारत के अर्थ समेटे होती है।समूहगान होने से हर कार्यकर्ता इसको निःसंकोच भाव से स्वतः गाना, गुनगुनाना सीख जाता है । उच्यस्वर में वह बेझिझक होकर गाने लगता है। धीरे -धीरे वह सबके सामने खड़े होकर सबके सामने गाता और गाते हुए दूसरों को अनुसरण कराना सीख जाता है ।यह गीत कौन लिखता है , कब लिखता है,कहाँ लिखता है , यह पता ही नहीं चलता है क्यों की रचनाकार स्वयंसेवक व प्रचारकों में से ही होते है परंतु वे कभी भी अपना नाम उजागर नहीं करते या कहिये की वे श्रेय नहीं लेना चाहते हैं।इन गीतों में देशप्रेम की अभिव्यक्ति, मातृभूमि से गहरा प्रेम , सम्मान ,समर्पण ,त्याग और बलिदान की भावना भरी होती है। इन गीतों को गणगीत कहा जाता है।कुछ स्वयंसेवक जिनका स्वर बहुत अच्छा होता है वे अभ्यास कर के संघ उत्सवों या विशेष अवसरों पर मुख्य वक्ता के भाषणों,जिन्हें संघ में बौद्धिक कहा जाता है , के ठीक पहले भाव उत्पन्न करने, श्रोताओं को एकाग्र करने तथा वक्ता कें लिए मार्गदर्शक विंदु या प्रस्तावना के रूप में एकल गीत के रूप में भी गाये जातें हैं। यह गीत कोरस नहीं होता।इस गीत को एक स्वयंसेवक ही पूर्ण आत्मविश्वास के साथ व्यवस्थित अभ्यास के बाद बिना किसी पार्श्व संगीत के गाता है।उल्लेखनीय है कि संघ के किसी गीत में किसी भी प्रकार के वाद्यसंगीत के उपकरणों का प्रयोग नहीं किया जाता है ।सभी गीत सुर, ताल, लय, छंद एवं संगीत के शास्त्रीय पद्धतियों से युक्त होते हैं। संघ गीत भारतवर्ष में बोली जाने वाली सभी भाषाओं में लिखे और गाए जातें हैं और देश - विदेश की सभी शाखाओं पर सब भारतीय भाषाओं के गीत गाये और दुहराए जातें है।संस्कृत और हिंदी के गीत अधिकांश संख्या में सभी भाषा- भाषी प्रदेशों के स्वयंसेवक निश्छल भाव से गाते मिल जाएँगे। स्वयंसेवकों के अंदर स्वाभाव से ही भाषा, प्रांत, जाति, क्षेत्रीयता का भेद संस्कारवश नहीं पनपने पाता तथा वे अपने अंदर सभी भाषाओं के प्रति आदर और प्रेम की भावना स्वभाववश रखने

 लगतें हैं।  

       सामान्यतः संघ गीतों को मातृ-वंदना , राष्ट्र-अर्चना , केशव माधव वंदन, पथ संचलन गीत, सहगान, एकल गान, जनजागरण का शंखनाद करते गीत,संघ उत्सवों के भाव अनुरूप गीत तथा प्रासंगिक एवं विविध गीतों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।संघ गीत जहाँ राष्ट्रीय एकता और अखंडता का संदेश देते हैं वहीं यह जाति, धर्म भाषा के उपर राष्ट्रीय एकता को महत्व देतें हैं।उत्साह और प्रेरणा के साथ-साथ जनमानस में साहस, जोश,कर्तव्यबोध, गौरवशाली इतिहास, भारतीय संस्कृति , स्वर्णिम अतीत,संघर्ष और हिंदू उपलब्धियों का चित्रण भी करते हैं।संघ गीतों की सरल प्रभावशाली भाषा ओजपूर्ण राष्ट्रीयता का संदेश देने वाली होती है।यह स्वयंसेवकों और सामान्य जनमानस में नैतिक मूल्यों का संचार करने के साथ- साथ उनमें सत्य, साहस,कर्तव्य, अनुशासन, सेवा , राष्ट्रीय भावना, जिम्मेदारी की भावना जैसे आदर्शों को मजबूत बनाने में सहायक सिद्ध हुई हैं ।संघ के सौ वर्षों की यात्रा में इन गीतों ने पाथेय बनने के साथ साथ राष्ट्र जागरण का अनुपम कार्य किया है।

           पूरे विश्व में संघ की शाखाओं पर प्रतिदिन परमपवित्र तत्वज्ञान केरूप में गुरु स्थान पर विराजित भगवा ध्वज के समक्ष आज जो प्रार्थना संस्कृत भाषा में गायी जाती है वह 1925 में पहले मराठी और हिंदी में गायी जाती थी । वह प्रार्थना संघ स्थापना के 14 वर्ष बाद फ़रवरी 1939 में नागपुर के सिंदरी बैठक में डा. बाबा साहेब आप्टे,बालासाहेब देवरस,अप्पाजी जोशी तथा नानासाहेब टालातुले की उपस्थिति में नरहरि नारायण भिड़े द्वारा संस्कृत भाषा में रूपांतरित किया गया जो 23 अप्रैल 1940 में पुणे के संघ शिक्षा वर्ग में यादवराव जोशी द्वारा गाया गया । इसमें कुल तीन श्लोक में तेरह पंक्तियां हैं जिसकी अंतिम पंक्ति हिंदी भाषा में भारत माता की जय से पूर्ण होता है।इसका प्रथम श्लोक भुजंग प्रयात छंद में रचित है जिसमें मातृवंदना की गई है।द्वितीय एवं तृतीय श्लोक मेघ निर्घोष छंद में रचित है।द्वितीय श्लोक में ईश्वर से अजेय शक्ति , सुशीलता, ज्ञान , वीरव्रत और अक्षय धियानिष्ठा जैसे पाँच गुणों की माँग की गई है।तृतीय श्लोक में ध्येय की पूर्ति का मार्ग प्रशस्त करने की प्रार्थना की गई है।इस प्रार्थना को अभी हाल में ही स्वप्रेरणा से सुमधुर संगीत में पिरो कर वाद्य यंत्रों की ध्वनि के साथ प्रसिद्ध फिल्मी जगत के संगीतकार एवं गायक शंकर महादेवन नें बड़ी सावधानी के साथ उसी स्वर में गाने का प्रयास किया है जैसी प्रार्थना सस्वर स्वयंसेवक संघस्थान पर गाते है। सोशल मीडिया पर यह प्रार्थना गीत बहुत प्रसारित भी हुया है ।कुछ संघ गीतों का सहजरूप में टीवी चैनलों के लिए बनाई गई फ़िल्मों में भी प्रयोग सामयिक संदर्भों के उपयोगिता की दृष्टि से किया गया है जो संघ गीतों के महत्व का प्रतीक है जैसे उदाहरण स्वरूप प्रसिद्ध टीवी सीरियल “चाणक्य “में एक पुराने संघ गीत “ हम करे राष्ट्र आराधन , तन से मन से धन से ,तन मन धन जीवन से “ को तक्षशिला के छात्रों द्वारा भगवा ध्वज हाँथ में लहरा कर 

गाते हुए दर्शाया गया है ।कदाचित जब इस सीरियल का प्रोमो दूरदर्शन को सीरियल के निर्देशक चंद्र प्रकाश द्विवेदी द्वारा आगे के एपिसोड फिल्माने की स्वीकृति के लिए जमा किया गया तब उस समय के तत्कालीन नरसिंहाराव सरकार के अधीन दूरदर्शन नें बिना कारण बताए बहुत दिनों तक स्वीकृति से रोक दिया था। विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने तब नरसिंहाराव जी से व्यक्तिगत रूप से मिलकर फ़िल्म प्रोमो को देखने और राष्ट्रीय और सांस्कृतिक महत्व के होने के कारण स्वीकृति देने की तथा अस्वीकृति की दशा में राष्ट्रव्यापी आंदोलन करने की बात कही थी ।अनुरोध को स्वीकार कर नरसिंहाराव जी ने दूरदर्शन से मंगा कर प्रोमो को देखा तथा कोई आपत्तिजनक विषयवस्तु को न पाकर आगे की फिल्मांकन की अनुमति प्रदान कराई।बाद में जब पूरी फ़िल्म बन कर प्रदर्शित हुई तो रामायण महाभारत सीरियल के बाद सबसे लोकप्रिय सीरियल सिद्ध हुई और संदर्भित संघ गीत भी दर्शकों में बहुत लोकप्रिय हुई।

              संघ शाखाओं पर गाये जाने वाले अनेक गीत हैं जो राष्ट्र के लिए जीने की प्रेरणा देतें हैं यथा “ धर्म के लिए जियें समाज के लिए जियें । ये धड़कने ये श्वास हो पुण्यभूमि के लिए। कर्म भूमि के लिए ।। इसी प्रकार का दूसरा गीत है -“ आर्य भूमि में गूंज उठा फिर जन -जन का आह्वान । भरत भूमि के साथ विश्व का करना है कल्याण। जागे वीर जवान- जागे वीर जवान ।।” एक अन्य गीत है -एक संस्कृति एक धर्म है, एक हमारा नारा। एक भारती की संतति हम , भारत एक हमारा ।। इसी प्रकार यह गीत भी बहुत लोकप्रिय था “ नमन है इस मातृभू को , विश्व का सिरमौर भारत। तप तपस्या साधना का, शौर्य का परिणाम भारत ।। “ जीवन पुष्प चढ़ायेंगे, माँ की ज्योति जगायेंगे।माँ की रक्षा हित हम शत-शत, हिंदू बलि हो जाएँगे।।

    सामाजिक समरसता को प्रेरित करता यह गीत बहुत प्रसिद्ध है- पथ का अंतिम लक्ष्य नहीं सिंहासन चढ़ते जाना , सब समाज को लिए साथ में , आगे है बढ़ते जाना।। इसी प्रकार का एक गीत है-“ हिन्दु जगे तो विश्व जगेगा, मानव का विश्वास जागेगा। भेद भावना तमस हटेगा, समरसता अमृत बरसेगा।।संस्कृत भाषा में एक गीत सबको स्मरण होगा “ मनसा सततम स्मरणीयम, बचसा सततम वदनीयम ।लोकहितम मम करणीयम ।।एक गीत जो बचपन में शरीर में रक्तसंचार को बढ़ा देता था - रक्त शिराओं में राणा का , रह - रह आज हिलोरे लेता । मातृभूमि का कण-कण तृण- तृण हमको आज निमंत्रण देता ।। दूसरा गीत है- यह हिमालय सा उठा , मस्तक न झुकने पाएगा।रोक दूँगा मैं प्रभंजन, जो प्रलय के गीत गाता।।” पंजाबी भाषा का एक गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था -पिता वारया ते लाल चारे वारे, ओ हिन्दु तेरी शान बदले।जन्म गुरांदा पटने साहिबदा, आनंदपुर डेरा लाया, ओ हिंदु तेरी शान बदले ।।

      संघ गीत की अनेकों शृंखलाएँ है जिनको सुनते गाते हम संस्कारित हुए है। भावी पीढ़ी नए तकनीकी से दृश्य श्रव्य माध्यम से इन गीतों को देखेगी, सुनेगी और प्रेरणा लेगी ।

From Blogger iPhone client

Thursday, 16 October 2025

RSS: संघ ने कैसे 1947 में विफल किया पाकिस्तानी षड़यंत्र

पाकिस्तानी षड़यंत्र को 1947 में संघ ने किया था विफल 

लेखक : अशोक कुमार सिन्हा , उपाध्यक्ष , विश्व संवाद केंद्र, लखनऊ ।

           सन् १९४६ के मध्य तक कश्मीर घाटी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाएं अपने यौवन पर पहुँच चुकी थीं। चढ़ती उम्र के पढ़े-लिखे जवान संपर्क में आने लगे थे । शाखाओं पर आने वाले स्वयंसेवकों में अधिकांश कश्मीरी हिंदू नवयुवक ही होते थे।श्री गुरूजी का अटर भारत का प्रवास चल रहा था, अतः श्रीनगर में भी एक विशाल जनसभा आयोजित करने की योजना बनाई गई।सभी स्वयंसेवक कार्यकर्ता प्रसन्नता से झूम उठे । यह स्वाभाविक ही था। जिस कश्मीर में ९०% मुसलमान समाज हो, सदियों से हिंदू समाज आस्थाविहीन हो कर चल रहा हो , धार्मिक स्थानों की पवित्रता नष्ट हो चुकी हो और हिंदू समाज स्वाभिमान शून्य होकर जी रहा हो , उस स्थान पर एक अखिल भारतीय शक्तिशाली हिंदू संगठन के नेता का आना एक बहुत बड़ी बात थी।डी.ए.वी. कॉलेज श्रीनगर के प्रांगण में कार्यक्रम हुआ।एक हज़ार से अधिक स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में उपस्थित हुए। नगर के गणमान्य व्यक्तियों को निमंत्रित किया गया था । वे पूरी निष्ठा एवं उत्साह से आए । श्री गुरुजी ने हिन्दू समाज की एकता पर बल देते हुए देशद्रोहियों की हरकतों से सतर्क रहने और उन्हें एकजुट हो कर निरस्त करने का आव्हान किया । इस कार्यक्रम सीआर कश्मीर घाटी में एक विशेष प्रकार का उत्साह का संचार हुआ , जिसका स्पष्ट परिणाम १९४७ के पाकिस्तानी आक्रमण के समय दिखाई पड़ा। देश विभाजन के समय संघ के इन तरुण स्वयंसेवकों ने कश्मीर की रक्षा के लिए जो बलिदान दिए, वे भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाने योग्य हैं।१५ अगस्त १९४७ को प्रातः श्रीनगर में पाकिस्तानी तत्वों नें गड़बड़ी करनी प्रारंभ कर दी।सभी सरकारी भवनों पर पाकिस्तान के हरे रंग के झंडे फहरा दिए गए। संघ के देशभक्त स्वयंसेवकों ने इस चुनौती को स्वीकार किया । तुरंत संघ कार्यालय पर योजना बनी । दस बजे तक अमीराक़दल के पुल के पास हज़ारों स्वयंसेवक एवं एनी हिन्दू लोग इक्कठे हो गए। इनका राष्ट्रप्रेम देखने लायक़ था ।कश्मीरी पंडितों को डरपोक और कायर कहने वाले तथाकथित चौधरियों ने भी उस दिन दाँतो तले उँगली दबा ली । देखते ही देखते पाकिस्तान के झंडे उतर फेंके गए और नगर के प्रमुख सड़कों पर विशाल जुलूस निकाला गया ।पाकिस्तानी तत्वों को ललकारा गया । सारा वातावरण भारत माता की जय के नारों से गुंजायमान हो उठा।हिंदू समाज का हौसला बढ़ा और महाराज हरि सिंह को भी संघ की शक्ति और भक्ति का रोमांचक आभास हुआ ।

      संघ के दो प्रमुख प्रचारकों श्री हरीश भनौत तथा श्री मंगलसेन ने पाकिस्तानी अफ़सरों से संबंध स्थापित किए और कई मास तक मुसलमान बन कर पाकिस्तान की सैनिक गतिविधियों एवं संभावित आक्रमण की पूरी सूचना श्री बलराज मधोक को दी।श्री बलराज मधोक उस समय श्रीनगर के डी ए वी कॉलेज में इतिहास के प्राध्यापक थे।वे जम्मू-काश्मीर राज्य में संघ में सक्रिय थे तथा संघ कार्य के प्रमुख थे ।इन्होंने आक्रमण के मार्ग और तिथि तक की जानकारी दी।महाराजा हरि सिंह ने बलराज मधोक को बुलाया । श्रीनगर में महाराजा के महल में उनकी भेंट हुई।सारी जानकारी प्राप्त होने के बाद महाराजा नें संघ के २०० स्वयंसेवक मांगे ताकि उन्हें शस्त्र दे कर नगर की रक्षा व्यवस्था का दायित्व सौपा जा सके। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए श्री माधोक ने दूसरे दिन प्रातः दो सौ स्वयंसेवक उपस्थित करने का आश्वासन दे दिया । रात्रि दो बजे स्वयंसेवकों को आकस्मिक सूचना घरों में भेजी गई - प्रातः ६ बजे आर्यसमाज मंदिर पहुँचो।प्रातः ६ बजे दो सौ स्वयंसेवक वहाँ उपस्थित थे।सभी कॉलेज के छात्र थे और देश पर बलिदान होने की भावना लेकर घर से आए थे।सामूहिक गणगीत हुई । संघ की प्रार्थना की गई । थोड़ी देर बाद फौजी ट्रक आए और इन तरुणों को ले कर बादामीबाग़ छावनी में पहुंच गए।यहां कुछ सैनिक तैयार खड़े थे। उन्होंने तुरंत स्वयंसेवकों को रायफल चलाना सिखाना प्रारम्भ कर दिया । सायंकाल तक वह युवक मोर्चे पर जा पहुँचे । भारतीय फौजों के आने तक दो दिन तक इन स्वयंसेवक सिपाहियों ने पाकिस्तानी फ़ौज को रोके रक्खा । इतिहास के इस अद्भुत बलिदानी घटना को सब जानते हैं परंतु बोलता कोई नहीं । शेख़ अब्दुल्ला भी जानता था । वही शेख़ अब्दुल्ला श्रीनगर पर आक्रमण की जानकारी मिलते ही कश्मीरी जानता को छोड़ कर परिवार सहित कश्मीर से भाग गया था।घाटी को सम्भाला और बचाया था पहले संघ के इन स्वयंसेवकों ने और बाद में भारतीय सेना ने । भगोड़े शेख अब्दुल्ला ने नहीं ।

      1947 में ही स्वाधीनता मिलने के बाद पूरा देश उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था। इनमें जम्मू-कश्मीर का हाल सबसे खराब था। वहां राजा हिन्दू था, पर अधिकांश प्रजा मुसलमान। शेख अब्दुल्ला अपनी अलग ढपली बजा रहा था। प्रधानमंत्री नेहरू जी का हाथ उसकी पीठ पर था। पूरे देश के एकीकरण का भार सरदार पटेल पर था; लेकिन जम्मू-कश्मीर में नेहरू जी अपनी चला रहे थे।


24 अक्तूबर को विजयादशमी का पर्व था। हर साल इस दिन महाराजा की शोभायात्रा श्रीनगर में होती थी। हिन्दुओं के साथ मुसलमान भी उत्साह से इसमें शामिल होते थे। पाकिस्तान समर्थकों ने इस शोभायात्रा पर हमला कर राजा के अपहरण या हत्या का षड्यंत्र रचा। इससे वे पूरे राज्य में अफरातफरी मचाना चाहते थे। उस दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सैकड़ों कार्यकर्ता देश की रक्षा के लिए प्रयासरत थे। उन्हें इस षड्यंत्र का पता लग गया।


इससे एक दिन पूर्व बारामूला और उड़ी के मार्ग से सैकड़ों पाकिस्तानी सैनिक कबाइलियों के वेष में श्रीनगर की ओर चल दिये थे। उनकी योजना 24 अक्तूबर को श्रीनगर पर कब्जा करने की थी। शोभायात्रा स्थगित करने से राज्य में गलत संदेश जाने का भय था। अतः राज्य प्रशासन ने संघ से संपर्क कर एक योजना बनायी। इसके अनुसार 24 अक्तूबर को सुबह छह बजे तक 200 युवा स्वयंसेवक वजीरबाग के आर्य समाज मंदिर में पहुंच गये।


वहां उन्हें पूरी योजना समझाई गयी। इसके बाद संघ प्रार्थना हुई। फिर उनमें से 150 युवक सैन्य वाहन से बादामी बाग छावनी भेज दिये गये। वहां अगले कुछ घंटे तक उन्हें राइफल चलाना सिखाया गया। पहले नकली और फिर असली कारतूसों ने निशानेबाजी का अभ्यास हुआ। सैन्य अधिकारी उन्हें सीमा पर भेजना चाहते थे। संघ के स्वयंसेवक इसके लिए तैयार थे; पर गहन विचार विमर्श के बाद उन्हें शोभायात्रा की सुरक्षा में तैनात कर दिया गया।


शाम को पांच बजे शोभायात्रा शुरू हुई। सबसे आगे रियासत का प्रमुख बैंड था। उसके पीछे सौ घुड़सवार सुंदर वेशभूषा में अपने भालों पर रियासत का लाल तथा केसरी ध्वज लिये आठ-आठ की पंक्तियों में चल रहे थे। उसके पीछे छह घोड़ों की एक सुंदर और सुसज्जित बग्घी पर राजा, युवराज और उनके दो अंगरक्षक बैठे थे। जरी की अचकन और केसरी पगड़ी में पिता-पुत्र बहुत सुशोभित हो रहे थे। उसके पीछे की बग्घियों में राज्य मंत्रिमंडल के सदस्य तथा कुछ बड़े जागीरदार थे। उनके पीछे फिर सौ घुड़सवार थे। शोभायात्रा धीरे-धीरे अपने निर्धारित मार्ग पर बढ़ रही थी।


जहां से भी यह शोभायात्रा गुजरती, लोग उत्साह से ङ्गमहाराजा बहादुर की जयफ के नारे लगाते थे। राज्य की पुलिस के साथ ही साधारण वेशभूषा में 150 स्वयंसेवक भी पूरे रास्ते पर तैनात थे। झेलम नदी के पुल से होकर शोभायात्रा अमीराकदल के चैक में पहुंची। वहां दर्शकों की अपार भीड़ थी। जैसे ही महाराजा की सवारी चैक के बीच में पहुंची, दर्शकों में से किसी ने काले रंग की गेंद जैसी कोई चीज महाराजा पर फेंकनी चाही। वह वस्तुतः एक बम था; पर तभी दर्शकों में खड़े एक युवक ने उसका हाथ पकड़ लिया। दो युवाओं ने उस बमबाज को गले से पकड़ा और भीड़ से बाहर खींच लिया। आम लोग शोभायात्रा देखने में व्यस्त थे। उन्हें कुछ पता नहीं लगा।


शोभायात्रा अपने निर्धारित समय पर राजगढ़ के महल में पहुंच गयी। वहां आठ बजे दरबार शुरू हुआ, जिसमें कुछ लोगों को उपहार तथा उपाधियां आदि दी गयीं। नौ बजे महाराजा और उनके परिजन अपने आवास पर लौट गये। इस प्रकार स्वयंसेवकों ने एक भारी षड्यंत्र को विफल कर दिया। इसके दो दिन बाद राजा के हस्ताक्षर से जम्मू-कश्मीर भारत का अंग बन गया।

स्मरणीय है कि इसके पूर्व महाराजा हरिसिंह के दरबारियों, सहयोगियों और मंत्रिपरिषद के मंत्रियों ने पूरा जोड़ लगाया कि राष्ट्र के हिट में जम्मू-कश्मीर का विलय भारत में कर देना चाहिए। सरदार पटेल और महात्मा गांधी जैसे व्यक्तियों ने भी प्रयास किया था परंतु महाराजा तैयार न हुए । वे नेहरू की सत्ता स्वीकार नहीं करना चाहते थे।उधर पाकिस्तान की हौज कश्मीर के द्वार पर आ पहुंची ।राजनेताओं के प्रयास विफल हो चुके थे । समय की नाजुकता बढ़ती जा रही थी।ऐसी परिस्थिति में सरदार पटेल ने व्यक्तिगत तौर पर मेहरचंद महाजन द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री माधव सदाशिव गोलवरकर को विशेष संदेश भेज कर आग्रह किया कि महाराजा को विलय करने के लिए तैयार करने में वे अपने प्रभाव का प्रयोग करें।श्री गुरुजी तुरंत अपने राष्ट्रीय कर्तव्य की पूर्ति के लिए अपने समस्त पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम को स्थगित करते हुए विमान द्वारा नागपुर से नई दिल्ली और नई दिल्ली से श्रीनगर दिनांक १७ अक्टूबर १९४७ को पहुँचे।श्री प्रेम चंद्र डोगरा और श्री मेहरचंद महाजन के प्रयास से श्री गुरुजी की भेंट १८ अक्टूबर १९४७ को महाराजा हरिसिंह से हुई । भेंट के समय १५-१६ वर्षीय युवराज कर्ण सिंह जांघ की हड्डी टूटने से प्लास्टर में बंधे लेटे हुए थे । मेहर चंद्र महाजन भेंट के समय उपस्थित थे।राष्ट्र की अखंडता के लिए यह एक ऐतिहासिक भेंट थी । जिस महाराजा पर देश के अनेक राष्ट्रीय नेताओं का कुछ भी असर न हुआ , उस महाराजा हरि सिंह ने एक साधारण वेश वाले राष्ट्रीय तपस्वी के आगे सिर झुका दिया ।उसे अपने राष्ट्र की रक्षा और धर्म का महत्व समझ में आ गया ।श्रीगुरुजी ने स्वयंसेवकों को जम्मू - कश्मीर की रक्षा के लिए रक्त के अंतिम बूंद तक बहाने का निर्देश दे कर चले गए । संघ और स्वयंसेवकों ने इस प्रकार पाकिस्तान की कश्मीर हड़पने की एक और चाल विफल कर दी थी ।  

     सन् १९४७ में ही कश्मीर पर अधिकार करने की प्रबल कुचालों के वशीभूत हो कर पाकिस्तानी सैनिकों ने कबाइलियों के भेष में कोटली नामक कस्बे पर आक्रमण कर दिया था।भारतीय सेना तब तक काश्मीर पहुँच चुकी थी।कोटली के संकरी घाटी में नाले के उसपार पाकिस्तानी सेना के फायरिंग रेंज में भारतीय वायुसेना के विमानों ने जल्दीबाजी में गोलाबारूद, आम्युनेशन और हथियारों से भरे लोहे के बड़े- बड़े बक्से गिरा दिए थे। उसे उठा कर लाना था । कौन लाएगा? यह प्रश्न उठा। पाकिस्तान लगातार एलएमजी गनों से फायरिग झोंक रहा था। भारतीय सैनिकों की संख्या बहुत कम थी।यदि बक्से उठाकर लाए नहीं जाते तो भारतीय सैनिकों के गोला बारूद खत्म हो रहे थे । अपने सैनिकों के निहत्थे मरने की आशंका थी। कोटली का सेना टुकड़ी का कमांडर सोच-विचार कर तुरंत स्थानीय संघ कार्यालय पहुंचा जहाँ उसकी भेंट पंजाब नेशनल बैंक के स्थानीय शाखा के मैनेजर श्री चंद्र प्रकाश जी, जो कोटली संघ शाखा के नगर कार्यवाह भी थे,उनसे हुई ।उन्होंने सैनिक कमांडर की बात और समस्या ध्यान से सुनी और पूछा की कितने स्वयंसेवक चाहिए। सैनिक कमांडर बोला - आठ से काम चल जाएगा ।चन्द्रप्रकाशजी जी , जो देश पर बलिदान होने के लिए भावुक हो रहे थे , ने कहा “ ठीक है एक मैं हूँ - बाक़ी सात को मैं आधे घंटें में ले कर आता हूँ । आप यहाँ निश्चिंत हो कर बैठे ।इतना कह कर चंद्रप्रकाश जी बड़ी फुर्ती से शहर में आए । निर्देश मिलते ही तीस से उपर ही नौजवान स्वयंसेवक तैयार हो कर आ गए।चंद्रप्रकाश जी को उनमें से सात का चुनाव करना कठिन हो रहा था क्यों की सभी चलने को उद्दत हो रहे थे।अंत में अधिकारी की आज्ञा पर सात छाँट लिए गए बाक़ी ने अनुशासनवश रुककर अपने आठों स्वयंसेवकों को भावभीनी विदाई दी।सब इस विदाई का अर्थ समझते थे इस लिए मौन विदाई थी यह ।चन्द्रप्रकाश जी तुरंत प्रतीक्षा कर रहे सैनिक कमांडर के पास पहुँचे तथा तुरंत मोर्चे पर पहुँच गए।कमांडर ने उन्हें पाकिस्तानी सेना की नजरों से बच कर बारूद की पेटियों तक पहुँचने , उन्हें उठाने और फिर सभी बक्सों को अपनी सैनिक टुकड़ी तक पहुँचाने की योजना समझाई।सारी योजना को भलीभाँति समझ कर आठों स्वयंसेवक रेंगते, फिसलते और गिरते हुए उस नाले के करीब पहुँच गए जहाँ उस पार बारूद के बक्शे पड़े हुए थे। नाला तो पानी से भरा हुआ था और बहाव भी तेज था । स्वयंसेवकों ने नाला पर किया । एक-एक स्वयंसेवकों ने बक्सा उठाया और पुनः नाले को पार करने लगे ।लौटते समय चंद्रप्रकाश जी और वेदप्रकाश को गोलियां लग गई क्यों की नाले में हलचल से पाकिस्तानी आक्रमणकारियों को खबर लग गई थी । छ स्वयं सेवक तो बक्से के साथ वापस आ गए परंतु वे पुनः अपने साथियों को वापस लाने के लिए नाला पार कर उनके शरीर को पीठ पर बाँध कर वापस आने लगे । दुर्भाग्यवश दो और स्वयंसेवकों को कनपटी में गोली लगी । अब जीवित चार नौजवानों नें चार शवों को लादा और नाला पर कर अपने सैनिकों के पास सुरक्षित लौट आए। आठ जीवित गए थे , चार ही जीवित लौटे। सबको आंखे नाम थी।लक्ष्य पूरा तो हुआ परंतु चार स्वयंसेवक बलिदान हो गए। शयनकक्ष नगरवासियों के समक्ष चार चितायें जलाई गई परंतु कोटली नगर की रक्षा हो गई । पाकिस्तानी षड्यंत्र विफल हुआ।

     इसी उपरोक्त घटना के कुछ समय बाद ही कोटली नगर से २० किलोमीटर दूर अटर पक्षिम दिशा में पलंधरी से समाचार आया कि १२०० सौ हिन्दू सिखों को दुश्मन ने घेर लिया है तथा उनका जीवन खतरें में है । सेना के अधिकारियों ने घटना के गंभीरता को समझा परंतु उनके पास केवल नगर की सुरक्षाभर ही सैनिक थे।संघ के स्वयंसेवकों ने सैनिक कमांडरों को समझाया कि हमारे लगभग एक सौ स्वयंसेवक आप की सहायता के लिए तत्पर है आप तुरंत एक टुकड़ी सेना भेज कर घिरे भारतीयों की जान बचाइए। तुरंत सेना नें ३१ सैनिक लेफ्टिनेंट ईश्वर सिंह के नेतृत्व में घटनास्थल को रवाना किया साथ में १०० के लगभग स्वयंसेवक भी थे।कोटली के मुसलमान तहसीलदार ने गद्दारी करते हुए इन सैनिकों की रवानगी की गुप्त सूचना पाकिस्तानी सेना को भेज दी ।पलंधरी पहुँचने पर सेना व स्वयंसेवकों का सामना पहाड़ी पर चढ़ते समय पाकिस्तानियों से गोलीबारी के साथ हो गया । दुश्मन ऊँचाई पर था ।अनपेक्षित आक्रमण और गोलाबारी के बीच भी हरेक सैनिक और स्वयंसेवकों ने अनेक दुश्मनों को मार डाला ।साधनों की कमी होने पर भी कई घंटों तक संघर्ष चला । एक भी सैनिक या स्वयंसेवक ने पीछे मड कर नहीं देखा। अनेक शत्रुओं को यमलोक पहुँचा कर ये सब भी देश की सेवा में एक-एक कर बलिदान हो गए। सैनिकों और स्वयंसेवकों के रक्त से लाल पलनधरी की यह भूमि की मिट्टी को आज भी मस्तक पर लगाने पर हृदय में बलिदानी उमंगें हिलोरें लेने लगती हैं ।

     भारत की सेना जब अल्प समय में सूचना पा कर हवाई मार्ग से श्रीनगर हवाईअड्डे पहुँचने की योजना बना रही थी तब उन्हें सूचना मिली की वहाँ की हवाई पट्टी पर हालात बहुत ख़राब है। रनवे को जगह-जगह जेहादी तत्वों के द्वारा क्षतिग्रस्त कर दिया गया है ।सेना ने कश्मीर में संघ से संपर्क 

किया और स्वयंसेवकों की सहायता से तत्काल हवाईपट्टी की मरम्मत की गई और उसी दिन भारतीय सैनिक हवाईजहाज से श्रीनगर हवाईअड्डे पहुंचे।इस प्रकार जिहादियों की यह षड्यंत्र भी संघ की मदद से विफल हुआ था। 




CONTACT-NO- 9453140038


From Blogger iPhone client

Monday, 22 September 2025

पंच परिवर्तन एक संकल्प: जन चेतना से राष्ट्र चेतना की ओर

पंच परिवर्तन एक संकल्प:जान चेतना से राष्ट्र चेतना की ओर 

स्व- आत्मबोध का दीप दिखाता संघ 

लेखक:- अशोक सिन्हा 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में ईश्वरीय कार्यों के रूप में हुई थी और ईश्वरीय इक्षा से ही इस ध्येयनिष्ठ संगठन के शतायु वर्ष की सबल सक्षम अटूट पूर्णता हुई है ।यह एक अल्पविराम है। व्यक्ति निर्माण, अनुशासन , देशभक्ति के माध्यम से भारत माता की सेवा को केंद्र में रख कर संघ का निर्माण हुआ है और इसकी सार्थकता भारत के विश्वगुरु बनने में है । समाज को संगठित करना , हिंदुत्व विचारधारा का प्रसार , भारतीय संस्कृति और मूल्यों को बनाये रखना तथा स्वयंसेवकों का राष्ट्रनिर्माण में योगदान यही संघ विचार का लक्ष्य है । भारत माता की जय इस संघटन का जयघोष है और विश्व को एक परिवार मान कर मानवीय संवेदना से राष्ट्रसेवा का कर्तव्य निभाना , सुपंथ पर चलकर संगठन खड़ा करते हुए सम्पूर्ण हिंदू समाज की आत्मचेतना को जागृत करते हुए आत्मीयभाव से साथ उसका मार्गदर्शन करना ही ईश्वरीय कार्य है ।दीप से दीप जला कर संघ के स्वयंसेवक स्वयं नए कार्यकर्ता तैयार करते हैं।राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी उठाना , स्व बोध से समाज विस्मृति की बेड़ियां तोड़ कर समाज को नई दिशा देना , समरस समाज से विराट शक्ति खड़ी कर शक्तिशाली , परम वैभवशाली हिंदू समाज की विश्वगुरु भारत बनने की दिशा में संघ एक दीप स्तंभ बनने की भूमिका निभा रहा है। 

          हिंदू एक सर्वसमावेशी राष्ट्रीयतासूचक विचार है।संघर्ष नहीं सबका समन्वय हमारे चिंतन के केंद्र में है।विविधता की एकता ही भारत की पहचान है । देशभक्ति और सनातन पूर्वजों की परंपरा से संघ ओतप्रोत है।स्वावलंबी संघटन से व्यक्तिनिर्माण हमारी कार्यपद्धति है । विचार , संस्कार और आचार ठीक रहे यह निरंतर प्रयास है ।देश जब परतंत्र था , समस्याओं से घिरा था तब डा. हेडगेवार जी ने सभी आंदोलनों की कार्यपद्धति को समझा , क्रांतिकारियों से संपर्क स्थापित किया । उनके साथ रहकर चर्चा की और अपना निष्कर्ष निकाला कि केवल नेताओं और संगठनों के भरोसे देश का कल्याण नहीं होगा।उन्हें अनुभव हुआ कि समाज में गुणात्मक सुधार और एकजुटता से ही देश का स्थायी कल्याण होगा।इसी निष्कर्ष से संघ की स्थापना हुई । अपने स्थापना काल से ही संघ समाज का मार्गदर्शन करता रहा ।संघ ने कहा की देवभक्ति और देशभक्ति एक ही कार्य है । यह तर्क नहीं अनुभव है।संघ को समझना सरल नहीं है संघ की तुलना की जाय ऐसी कोई संस्था न होने के कारण उसका उपमान नहीं है। सदियों से समाज को सही दिशा दिखाने के कारण और भारतीय दर्शन, सभ्यता , संस्कृति के आधार पर व्यक्ति निर्माण कर देश व विश्व की मंगलकामना करते हुए मानवहित में रत इस संगठन को यदि सम्पूर्ण विश्व का दीपस्तंभ माना जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी ।संघ ने अपने स्थापनाकाल से ही समाज को यह संदेश देना प्रारम्भ किया कि संगठित भारतीय समाज से ही यशस्वी भारत बन सकता है। संघ ने समाज को अपनी प्रारंभिक अवस्था में ही अनुभव कराना प्रारंभ कर दिया था कि हमको दुर्बल नहीं रहना है वरन् संगठित हो कर सबकी चिंता करनी है ।संघ ने चरित्र निर्माण, संगठन , दैनिक शाखा और अनुशासन के आधार पर समाज को विश्वास दिलाने का प्रयास किया की भारत की संस्कृति, परंपरा और अर्थव्यवस्था परम वैभव संपन्न , शक्तिसंपन्न राष्ट्र की रही है। संगठन में ही शक्ति है । हमारा काम सबको जोड़ने का है।देश की विविधता में हमे एकता देखनी है।वैचारिक मतभेद होने पर भी हम सब भारतीय हैं , हिंदू हैं।हम संवाद से एक बनेगें तथा हम भारत को महान बनायेंगे।भारत में जन्मे सभी मत, पंथ, संप्रदाय और उपासना पद्धतियों का एक सामूहिक मूल्यबोध है और उसी का नाम हिंदुत्व है। परंपरा, राष्ट्रीयता, मातृभूमि, पूर्वजों से हम हिंदू हैं।हमारा कोई शत्रु नहीं है और यदि कोई मानता भी है तो हमारा प्रयास उनको भी साथ लेने और जोड़ने की है।हमारी पहचान हिंदू पहचान है जो हमें सबका आदर करना,भला करना , सबको अपना मान कर मेलमिलाप करना सिखाती है। संघ इसीलिए इस हिंदू समाज को संगठित कर भारत को विश्वगुरु के स्थान पर पुनः स्थापित करना चाहता है।

         हमारी संस्कृति सर्वसमावेशी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना से ही सम्पूर्ण भारत में यह संदेश गया कि डॉक्टर हेडगेवार ने हिंदू एकता और अनुशासन का जो शंख बजाया है वही सब समस्याओं से मुक्ति दिलायेगा।गुरु जी श्री माधव सदाशिव गोलवरकर के समय में संघ ने यह संदेश देकर कि संघ सर्वस्पर्शी संगठन है,समाज के प्रत्येक स्थान पर पहुँच कर शाखा न केवल शाखा विस्तार किया वरन् जीवन के प्रत्येक क्षेत्र समवैचारिक संगठनों की स्थापना की।सभी स्वयंसेवकों को और सम्पूर्ण समाज को यह संदेश मिला की दशों दिशाओं में जावो, दलबादल से छा जावो, उमड़-घुमड़ कर इस धरती को नंदनवन सा सरसाओ।इससे सम्पूर्ण हिंदू समाज को संघकार्यों की स्वीकार्यता मिली और हिंदू समाज का मनोबल सर्वोच्यता पर पहुँच गया।श्री बालासाहेब देवरस जी के नेतृत्व में समाज में अस्पृश्यता के विषबेल को काटने के लिए सभी हिंदू सहोदर है , एक ही मातृभूमि की सब संताने है , यह भाव जगा।छुआ-छूत यदि पाप नहीं है तो इस दुनिया में कुछ भी पाप नहीं है , यह मंत्र गूंजने लगा। इससे हिंदू समाज का आत्मचिंतन जगा ।सामाजिक परिवर्तन की लहर उठी।देश में आपातकाल जब लागू हुआ तब संघ ने इसे जनतंत्र और जन स्वतंत्रता पर आघात कहकर प्रबल विरोध किया । यद्यपि संघ पर प्रतिबंध लगा पर संघ भूमिगत रह कर जनजागरण करता रहा । अनेकों कार्यकर्ता जेल में भी बंद रहे परंतु चाहे जयप्रकाश नारायण आंदोलन रहा हो या जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में रहकर संघ ने देश और जनतंत्र की रक्षा की।राष्ट्रीय सांस्कृतिक जनजागरण के लिए श्रीरामजन्म भूमि आंदोलन में राष्ट्रीय कार्य मान कर संघ नें विश्व हिंदू परिषद, समाज व साधु-संतों के साथ मिल कर हर प्रकार की लड़ाई लड़ी और श्रीरामजन्मभूमि पर नव्य-भव्य मंदिर निर्माण से हिंदू नवसांस्कृतिक नवजागरण का संदेश संघ ने दिया।हिंदू समाज के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के जिस स्तर पर आज यह समाज खड़ा है इसके पीछे संघ के करोड़ों स्वयंसेवकों का अथक परिश्रम, बलिदान तथा संगठन का मार्गदर्शन समाहित है।संघ के स्वयंसेवकों ने विदेशों में भी जाकर हिंदू समाज को संगठित करने और उनको अस्मिता को सुरक्षित रखने में जो योगदान दिया है वह संघ की प्रेरणा से ही संभव हुआ है।दुनिया के 50 से भी अधिक देशों में भारतीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू स्वयंसेवक संघ के नाम से शाखाओं का संचालन संघ के विदेश विभाग से हो रहा है।संघ की ही प्रेरणा, प्रयास और निर्देशों से जब सुदूर दक्षिणभारत के कन्याकुमारी में विवेकानंद शिला स्मारक का ध्वज लहराता हर भारतीय देखता है तो वह इस प्रकाश स्तंभ को देख कर भारतीय होने पर गर्व करता है।संघ की प्रेरणा, मार्गदर्शन और प्रशिक्षण से तप कर निकले दो स्वयंसेवक जब राजनीति के सेवा क्षेत्र में प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए तो उन्होंने राजनीति में जनसेवा के नए मानदंड स्थापित कर दिया ।जिस प्रकार श्रीमदभागवत गीता मानव जीवन के प्रत्येक अवसर के लिए अपना पवित्र संदेश देती है ठीक उसी प्रकार संघ विचार भी समाज को हर समय संदेश देने और मार्गदर्शन देने का कार्य करती रहती है।

            संघ के शतायु वर्ष 2025 में स्वयंस्फूर्ति से राष्ट्र सेवा हेतु तत्पर स्वयंसेवकों के लिए गौरवान्वित करनेवाला अवसर आया है।डॉक्टर जी ने जो राष्ट्रभक्ति का बीज बोया था उसके आकार लेने का स्पंदन हम अनुभव कर रहें हैं।संघ ने सौ वर्षों तक जो अथक परिश्रम से समाज संगठन का स्वरूप खड़ा किया है वह केवल एक अर्ध विराम का गणित है , अभी इसका विराट स्वरूप आना शेष है ।निरंतर यात्रा के इस मोड़ पर पुनः संघ ने आवश्यक समाज परिवर्तन की आवश्यकता का अनुभव किया है ।राष्ट्रीय परिदृश्य में राष्ट्र की समृद्धि के लिए पाँच ऐसे महत्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तन कि आवश्यकता संघ ने आवश्यक समझा जो प्रत्येक भारतीय नागरिकों को अपनाने चाहिए ।ये परिवर्तन पंच परिवर्तन या पंच प्रण के रूप में घोषित किए गए हैं। शताब्दी वर्ष में स्वयंसेवकों के कार्य के मूलाधार बनेंगे ।ये परिवर्तन सूत्र सरल, भावपूर्ण, व्यावहारिक एवं समाज द्वारा आसानी से ग्रहणयोग्य है ।ये परिवर्तन सूत्र हैं :- 

1- समाज में “स्व” की अनुभूति । 

2- सामाजिक समरसता ।

3- कुटुम्ब प्रबोधन ।

4- नागरिक कर्तव्यों का बोध । 

5- पर्यावरण सुरक्षा ।

                 सामाजिक परिवर्तन की यह पंच धारा भारत के सभी मत, पंथ, संप्रदाय और विचारों को आसानी से स्वीकार्य होंगें ।किसी को भी इसे अपनाने और सहभागी बनने में संकोच नहीं होगा।भारत को संपन्न राष्ट्र बनने में यह प्राणवायु की तरह प्रभावशाली होंगे।यह भारत की सांस्कृतिक आत्मा का भी परिचय हैं ।इन परिवर्तनों से विश्वगुरु भारत का अभ्युदय प्रारम्भ होगा।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक श्री मोहन भागवत जी ने इन पंच परिवर्तन के भावों को स्पष्ट करते हुए पहले ही कह दिया है कि राष्ट्र की उन्नति अपनी प्रकृति पर आधारित होनी चाहिए।सद्भाव व समरसता से ही जाएगी जाती-पाति की कुरीति।कुटुंब है बालकों की प्रथम आचारशाला । भारत में नागरिक अनुशासन का पालन सर्वोपरि है।विकास एवम पर्यावरण में संतुलन अनिवार्य होना चाहिए। समाज को नवचैतन्यता प्रदान करने के लिए इन पाँच परिवर्तन का विमर्श खड़ा करना होगा।समाज प्रबोधन के लिए भारत के हर गांव, घर में गहन संपर्क करना होगा । प्रबुद्ध समाज में संवाद गोष्ठियां करनी होगी। सम्मेलन, रैलियां करके जनजागरण करना होगा। संघ इस निमित्त बस्ती को केंद्र मान कर वर्षभर जनजागरण के कार्यक्रम आयोजित कर रहा है।2अक्टूबर से 12 अक्टूबर तक विजयदशमी उत्सव के निमित्त बस्तियों में कार्यक्रम आयोजित कर जनसामान्य के मध्य स्वावलंबी भारत , समर्थ भारत , सक्षम भारत की बात हुई है । पुनः 5 से 16 नवंबर के मध्य सामाजिक सद्भाव जागरण हेतु बस्तियों में गोष्ठियां आयोजित होंगी ।20 नवंबर से 21 दिसम्बर तक स्वयंसेवक व्यापक गृह सम्पर्क अभियान चला कर पंच परिवर्तन की बातें घर-घर तक पहुँचा कर उसकी आवश्यकता और महत्ता से जनसामान्य को जागरूक करेंगे । अगले वर्ष 2026 में एक जनवरी से 31 जनवरी तक ग्राम-ग्राम , बस्ती -बस्ती में हिंदू सम्मेलनों का आयोजन होगा।23 से 28 फ़रवरी तक प्रबुद्ध जनों की जनगोष्ठियाँ आयोजित होंगी जिसमें पाँच परिवर्तन के विषयों पर व्यापक चर्चा होगी। आगे एक सितंबर से 20 सितंबर तक इन कार्यक्रमों में युवा वर्ग केंद्रित कार्यक्रम होंगे जिसमें युवकों की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।इस प्रकार संघ केवल मार्गदर्शन ही नहीं देगा वरन् राष्ट्रहित में परिवर्तन की लहर सम्पूर्ण समाज को उद्वेलित कर सके यह प्रयास भी किए जायेंगे। यह कार्य वर्तमान समय में राष्ट्र की उन्नति में अवश्य ही कारगर होंगे । देश की जनता का मनोबल बढ़ेगा । समाज में हमे वैश्विक हिंदू खड़ा करना है । आर्थिक क्षेत्र में हमें नौकरी करनेवाला ही नहीं जॉब क्रिएटर बनना होगा यह भाव युवकों में जगाना होगा तभी हम इनवैश्विक चुनौतियों का सामना करनें में सक्षम बन सकेंगे ।हम माँ लक्ष्मी के उपासक हैं।देश विश्व गुरु बने इसके लिए देश की आर्थिक शक्ति के साथ- साथ सामाजिक शक्ति भी सर्वोपरि बने यही संघ का स्वप्न है।पंच परिवर्तन संघ का समाज परिवर्तन के लिए एक संकल्प है। जनचेतना से राष्ट्र चेतना की ओर आगे बढ़ने का संकल्प है । भारत को विश्वगुरु बनाने के लिए संघ को कई पीढ़ियों को मार्गदर्शन दे कर राष्ट्रचेतना से स्फूर्त बनाना होगा।







CONTACT-NO- 9453140038


From Blogger iPhone client

Saturday, 19 April 2025

संघ का प्रचार विभाग

संघ का प्रचार विभाग: एक परिचय         अशोक कुमार सिन्हा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना भारत के नागपुर में वर्ष 1925 में डा. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी । संघ स्थापना का मूल उद्देश्य सम्पूर्ण हिंदू समाज का संगठन एवं व्यक्ति निर्माण करना था । चरित्रवान,अनुशासित,राष्ट्रभक्त समाज खड़ा करना चाहता है संघ ।हिंदू समाज का अर्थ है सम्पूर्ण समाज जो भारत को अपना देश ,अपनी मातृ/ पितृ भूमि मानता हो , उसकी परंपराओं के प्रति , उसके ऐतिहासिक महापुरुषों के प्रति , देश की सुरक्षा और उसके समृद्धि के प्रति,जिनकी अव्यभिचारी एवं एकान्तिक निष्ठा हो -वे जन हिंदू व राष्ट्रीय कहे जायेंगे, चाहे उनकी उपासना पद्धति अलग अलग ही क्यों न हो ।संघ उस समाज को भी संगठित करना चाहता है जो टेक्नीकली भारत का नागरिक बन कर रहना चाहते हैं ।वे सब हिंदू ही कहे जाएँगे । हिंदू ही इस राष्ट्र का सबसे अधिक जिम्मेदार नागरिक है क्यों कि इस देश का भाग्य और भविष्य हिंदुओं से ही जुड़ा हुआ है । हिंदू यह नाम है राष्ट्र का । वह राष्ट्र का रूप और प्राण है । हिंदुओं का संगठन अर्थात राष्ट्रीय संगठन ।संघ का उद्देश्य अपने इस भारत को दुनिया का एक सर्वश्रेष्ठ देश बनाना है ।ज्ञान विज्ञान ,अर्थ एवं सुरक्षा की दृष्टि में यह देश स्वावलंबी , अजेय और संपन्न हो । इसी कामना से प्रतिदिन शाखा के माध्यम से संघ व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन का कार्य करता है । संघ का स्वयंसेवक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संगठन खड़ा कर के सेवा का कार्य करता है ।

          संघ अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे करने जा रहा है । संघ स्थापना काल के समय जो परिस्थितियाँ थी उनमें समय -समय पर बदलाव होते रहे । संघ पहले प्रचार परांमुख था । देश सेवा ,समाज सेवा और मातृभक्ति को वह प्रचार का विषय नहीं मानता है । आज भी वह समस्त समाजसेवा के कार्य को सम्पूर्ण समाज के सहयोग से ही करता है अतः प्रचार कर के श्रेय अकेले संघ नहीं लेना चाहता है। कार्य करने से जो स्वयं प्रसिद्धि प्राप्त हो वही प्रचार है । जितना कार्य उसकी ही प्रसिद्धि समाज में हो , यही उचित है। इसी लिए संघ अनावश्यक प्रचार न करते हुए कार्य करने में विश्वास रखता है । परंतु संघ की बढ़ती प्रगति , कार्य व लोकप्रियता से अनेक लोगों के आँख की किरकिरी भी यह संगठन बना । जो शक्तियाँ देश विदेश में भारत को संगठित और शक्तिशाली होते नहीं देखना चाहती थीं, उनके नज़र में संघ भी खटकने लगा । देश के अंदर भी जिनके राजनैतिक हित, वोट बैंक और तुष्टिकरण के उपर संकट आने लगा , वे अपने भी संघ के उपर आरोप लगाने लगे । वामपंथियों ने तो लगातार संघ के उपर प्रहार करना जारी रक्खा।संघ पर देश में तीन बार प्रतिबंध लगे परंतु संघ हर बार सत्य की परीक्षा में उबरा और उसपर से प्रतिबंध लगाने वालो ने ही प्रतिबंध हटाया । संघ के समक्ष कई बार परिस्थितियां बदली ।देश का विभाजन हुआ , कई बार देश पर विदेशी आक्रमण हुए , समाज को बाँटने का प्रयत्न हुआ , घुसपैठ, मतांतरण , लव जिहाद , दंगे, रामजन्मभूमि आंदोलन ,इतिहास का विकृतिकरण , आपातकाल का दंश और हिंदू समाज पर अनेकों प्रहार हुए । प्राकृतिक आपदाएं आई परंतु संघ अविचल देश और समाज की सेवा में लगा रहा और समाज को सचेत करते हुए उसे संगठित करने का कार्य करता रहा । देश के उपर के आए हर संकट पर संघ समाज के साथ कंधे से कंधा मिला कर डटा रहा । अपने अपर लगे आरोपों का समय समय पर प्रतिउत्तर भी देता रहा । 

       भूमण्डलीकरण के कारण संचार व्यवस्था में क्रांति आई । 1948 में बालेश्वर अग्रवाल नामक एक स्वयंसेवक ने संघ के सहयोग से हिन्दुस्थान समाचार नामक एन न्यूज़ एजेंसी खड़ा किया ।उस समय संघ छोटा था , धनाभाव था परंतु हिन्दुस्थान समाचार की तकनीकी सबसे अच्छी थी । हिंदी में सत्य समाचारों का प्रेषण होने लगा । फिर प्रिंट मीडिया आई, समाचार पत्र आया , दृश्य संवाद आया । जानता तक पहुँच बढ़ी । रेडियो , दूरदर्शन , TV, इंटरनेट का युग आया।मोबाइल युग आया और आज देश में 120 करोड़ लोगों से अधिक के पास इंटरनेट मोबाइल है। सोशल मीडिया युग में आर्टिफीसियल इंटेलजेंस का प्रवेश हो चुका है ।समाज प्रबोधन में संघ ने भी इन सब साधनों का प्रयोग किया है ।

       संघ ने भी अपने संगठन में परिवर्तन किया है । शताब्दी वर्ष आते- आते 6 कार्य विभाग क्रमशः शारीरिक,बौद्धिक,व्यवस्था,संपर्क , सेवा एवं प्रचार विभाग कार्यरत हैं। 8 गतिविधियों में क्रमशः कुटुंब प्रबोधन ,गो सेवा, समग्र ग्राम्य विकास,सामाजिक समरसता,धर्म जागरण , सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण और मुख्य मार्ग विस्तार । 43 सम वैचारिक संगठन जो 6 समूहों में विभाजित किए गए हैं यथा वैचारिक,शिक्षा,आर्थिक , सामाजिक , सेवा एवं सुरक्षा समूह के अंतर्गत आते हैं । डेढ़ लाख से अधिक सेवा कार्य सम्पूर्ण देश में स्वयंसेवकों एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा संचालित हैं ।उनहत्तर हज़ार से अधिक स्थानों पर दैनिक प्रातः एवं सायं शाखाएं लगतीं है। सैतीस हज़ार साप्ताहिक मिलन, सत्रह हज़ार मासिक मिलन,व मंडली संचालित हैं। सम्पूर्ण विश्व को पाँच भागों में विभक्त कर विदेशों में तीन हज़ार से अधिक स्थानों पर भारतीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू स्वयंसेवक संघ नाम से विदेश विभाग शाखाएं संचालित कर रहा है।संघ के शताब्दी वर्ष में पंचप्रण नामक पंचमुखी कार्य योजना कार्यान्वित की जा रही है जो क्रमशः सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण , स्वदेशी भाव जागरण एवं नागरिक कर्तव्य के रूप में संचालित है। इसके अतिरिक्त विमर्श एवं सज्जन शक्ति संपर्क, समन्वय भाव जागरण का भी कार्य सम्पादित किया जा रहा है।

       रामजन्मभूमि आंदोलन के समय 1992 में अयोध्या में ग्राउंड जीरो से सम्पूर्ण विश्व को त्वरित समाचार हिंदी और अंग्रेजी में उपलब्ध कराने के उद्येश्य से प्रथम विश्व संवाद केंद्र स्थापित किया गया था जो बाद में लखनऊ में ट्रस्ट के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया था । आज ऐसा ही विश्व संवाद केंद्र 35 की संख्या में सम्पूर्ण भारत के सभी प्रदेशों में अपनी भवनों में स्थापित एवं संचालित हैं।यहाँ से विभिन्न पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन ,प्रेस वार्ता, नारद जयंती, विभिन्न महापुरुषों की जयंतियाँ, पत्रकार मिलन एवं सम्पर्क, गोष्ठियां आदि संचालित हो रहें है।

         संघ के छ कार्य विभाग के अंतर्गत प्रचार विभाग की जो स्थापना सम्पूर्ण भारत में की गई है उसका आज भी उद्देश्य राष्ट्रीय विचारों का प्रसार करना ,राष्ट्र विरोधी विभाजनकारी अलगाववादी शक्तियों के प्रति समाज में जागरूकता निर्माण और हिंदुत्व की सकारात्मक बातें, तथ्यात्मक जानकारी मीडिया के माध्यम से समाज तक पहुंचाना है। प्रचार विभाग का कार्य संघ का प्रचार करना या किसी व्यक्ति का प्रचार करना नहीं है। संघ की कार्य पद्दति ही प्रचार है । 

          प्रचार की जो पद्धति अपनायी जाती है उनमें प्रमुख हैं :- सोशल एवं इलेट्रानिक मीडिया के उपलब्ध माध्यमों का उपयोग,अपनी समानांतर प्रचार व्यवस्था खड़ा करना ,जहाँ कार्य नहीं वहाँ विचार पहुँचाने के उद्देश्य से जागरण पत्र/पत्रिकाओं का प्रकाशन,पांचजन्य एवं ऑर्गनाइज़र जैसी राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं का प्रकाशन,साहित्य विक्री, कंटेंट जेनरेशन,नागरिक पत्रकारिता प्रशिक्षण,मीडिया संवाद के अंतर्गत पत्रकारों की मीडिया प्रोफ़ाइल तैयार करना,मीडिया के मालिकों से ले कर रिपोर्टरों तक का नाम पता ईमेल,फ़ोन,और उनके विचारों की जानकारी रखना,मीडिया संपर्क का तंत्र विकसित करना, पत्रकारिता के छात्रों से संपर्क व संवाद ,टी वी पैनल डिस्केशंस में अपना विचार रखने वाले कार्यकर्ता का निर्माण करना,नारद जयंती आयोजित कराना,पत्रकारों के लिए संघ परिचय वर्ग तथा मीडिया कॉनक्लेव आयोजन ,संघ के बड़े उत्तरदायित्व धारी अधिकारियों के प्रवास के समय पत्रकारों से उनके निवास या कार्यस्थल पर सम्पर्क कराना ,स्तंभ लेखकों ,संपादकों , ब्लॉगरों, पोर्टल संचालकों से संपर्क , साहित्योसव मनाना, फ़िल्म महोत्सव का आयोजन करना , शाखा / नगर स्तर तक प्रचार दायित्वधारी बनाना , तथा प्रचार कार्यालयों की स्थापना , संसाधन, टेक्नोलॉजी , आर्थिक व्यवस्था , क़ानूनी व्यवस्था तथा प्रचार के सभी 

 की टोली खड़ी करना व वार्षिक कैलेंडर बनाना ।

       प्रचार विभाग के नौ आयाम तथा प्रांत स्तर तक आयाम प्रमुखों को दायित्व सौपना भी प्रचार विभाग का कार्य है । ये नौ आयाम है क्रमशः जागरण पत्रिका, सोशल मीडिया,स्तंभ लेखक,फ़िल्म , कार्यालय व्यवस्था,साप्ताहिक पत्रिका,साहित्य विक्री,कंटेंट जेनेरेशन तथा मीडिया संवाद ।

      अखिल भारतीय स्तर से ले कर नगर स्तर तक सम्पूर्ण भारत में प्रचार प्रमुख का गठन है । प्रांत स्तर पर डाटा बैंक , आर्काइव्स प्रकोष्ठ स्थापना , पुस्तकालयों की स्थापना , मीडिया मानेटरिंग का कार्य , पेपर कटिंग , समाचार तथा सूचनाओं का प्रेषण , फोटोग्राफी व वीडियो कैमरों का संचालन कार्य संपन्न होता है । यथा आवश्यकता वीडियो एवं साउंड स्टूडियो भी संचालित है। कम्युनिटी रेडियो स्टेशन का भी संचालन अपेक्षित रहता है।रेडियो जॉकी से भी संपर्क तथा उन्हें सांस्कृतिक , महापुरुषों की जीवनियाँ आदि उपलब्ध कराया जाता है।टीवी सीरियल निर्माता , फ़िल्म निर्माताओं , फ़िल्म निर्देशकों , फ़िल्म लेखकों आदि से भी सम्पर्क कर के उनको देशभक्ति पूर्ण निर्माण एवं लेखन के प्रति प्रेरणा देने का अनुरोध किया जाता है । फ़िल्मों में भी भारतीय विचारमूल्य दिखे यह अनुरोध रहता है।इन सब कार्यों के लिए अपने कार्यकर्ताओं को बराबर कार्यशालाओं के माध्यम से प्रशिक्षित भी किया जाता है।आज प्रचार कार्यकर्ता पर्यावरण, स्वच्छता,दिव्यांग कल्याण्, नारी स्वाभिमान जागरण,सांस्कृतिक मूल्यों का पुनर्जागरण में सहायता, सहभागिता कर रहा है। 

                        लेखक विश्व संवाद केंद्र लखनऊ के सचिव तथा उत्तर प्रदेश प्रांतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी हैं।


From Blogger iPhone client

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कुटुंब प्रबोधन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कुटुंब प्रबोधन 

          अशोक कुमार सिन्हा 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मूल में राष्ट्रभक्ति,व्यक्ति निर्माण कर हिंदू समाज का संगठन , समाजसेवा ,धर्म एवं संस्कृति रक्षण तथा राष्ट्र को परम् वैभव तक पहुंचाना है।यह कार्य समाज के सहयोग से सर्व समाज को साथ ले कर करने का लक्ष्य है।इस कार्य को पूर्ण करने में परिवार व्यवस्था का जागरण हमारे कार्य का आधार है ।संघ स्थापना के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं तथा इस शताब्दी वर्ष में संपूर्ण समाज के आधारभूत सकारात्मक परिवर्तन हेतु पाँच संकल्प लिए गए हैं जो क्रमशः सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, नागरिक कर्तव्यों का निर्वहन तथा स्व भावना के जागरण नामक परिवर्तन की पंचधारा के नाम से विख्यात् हैं । यह कार्य समाज को कर्तव्यबोध का स्मरण कराने तक सीमित नहीं वरन् स्वयंसेवकों द्वारा अपने आचरण से समाज को राष्ट्रनिर्माण में सहभागी बनाने का एक अभिनव प्रयास है।

       परिवार भारतीय समाज की वह प्रथम कड़ी है जहाँ परिवर्तन की नींव सशक्त बनती है। यह समाज की सशक्त पाठशाला है।यहीं आत्मीयभाव से बालमन पर संस्कार जन्म लेता है।यह एक ऐसी सामाजिक संस्था है जिसपर समाज की नींव टिकी है।जीवन का आनंद लेना है तो परिवार का वातावरण आनंदमय होना चाहिए ।परिवार संबंध बनाए रखने का प्रभावशाली माध्यम है।संपूर्ण समस्याओं का समाधान यहीं है। यहाँ संघर्षों को समझने में सहायता मिलती है।नए नियमों और संयम की स्थापना का केंद्रबिंदु कुटुंब होता है।परिवार के सदस्यों के आत्मविश्वास को यहीं बढ़ावा मिलता है।आचरण के नीतिगत मानदंडों की नींव यही संस्कारित होती है। कुटुंब ही सुखी और स्वस्थ परिवार सहित शांतिपूर्ण समाज की कुंजी है ।भारतीय परिवारों ने अन्य देशों की तुलना में अधिक अनुपालन और लचीलापन दिखाया है ।संस्कारों की नींव मजबूत परिवार की पहचान होती है ।परंतु समय और काल के अनुसार भारतीय संस्कारों के लिए विश्वविख्यात हमारे परिवारों को अनेक परिवर्तनों का सामना भी करना पड़ा है ।नए आर्थिक समीकरणों के कारण परिवार का आकार बदला है ।परिवार अब बड़े नहीं छोटे एकल परिवार होने लगें हैं।विज्ञान के विकास ने नए नए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण परिवारों को उपलब्ध करायें हैं ,जिससे मनुष्य का जीवन आसान बने हैं। सबसे अधिक परिवर्तन मोबाइल के अतिशय प्रयोग से परिवारों में उनके परस्पर संबंधों में आया है । शिक्षा में परिवर्तन आया है जिसके कारण पारिवारिक मूल्यों में गिरावट आई हैं वहीं बच्चे समय से पहले वयस्क विचारों से अवगत हो रहें हैं । यद्यपि बच्चों के ज्ञान प्राप्ति की गति भी तेज हुई है।वे अधिक कुशाग्र बन रहें है।माँ और पिता दोनों के कामकाजी होने पर बच्चों के जीवन एवं संस्कारों पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा है ।विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने की ललक ने परिवारों में आधुनिकता का राग बजा तो है ,तरक्की दिखी तो है परंतु परिवारों ने बहुत कुछ खोया भी है ।हमारे कुटुंब विकास का भारतीय प्रतिमान क्या होगा ? मनुष्य हित में क्या रास्ता चुनना है यह कैसे निर्धारित होगा ? नया ज्ञान रखते हुए नए सृजन का रास्ता चुनना होगा । निर्माणों के पावन युग में हम चरित्र निर्माण न भूलें । अपने राष्ट्र में विकास कर सम्पूर्ण विश्व के लिए हम कल्याणकारी हों , तभी हमारा परिवार और हमारा जीवन सार्थक होगा।

          परिवार में रिश्ते बहुत महत्वपूर्ण होते हैं । रिश्तों पर संकट संस्कृति और राष्ट्र पर संकट होगा ।इसलिए रिश्तों की समझ , जितने रिश्ते उतनें कर्तव्य हैं , यह हमें समझना होगा तभी परिवार अपने उद्देश्य को पूरा कर पायेगा ।भारत को ऐसा राष्ट्र बनाना है की रिश्ते नाते बनाये रखते हुए हमें आर्थिक रूप से अधिक विकसित और समृद्ध बन सकें ।योग से पूरी दुनिया आकर्षित हो रही है । यदि हम कुटुंब प्रबोधन में यह सिखायें कि परिवार व्यवस्था बनाये रखते हुए भी अधिक शांति और ख़ुशी योग से अपने जीवन में ला सकतें हैं तो यह दुनिया के लिए आश्चर्य का विषय हो सकता है।भारत को यह सुविधा मिलनी ही चाहिए कि वह अपनी संस्कृति और संस्कारों की परिवार में रक्षा करते हुए , स्व की रक्षा करते हुए विकास के रास्ते पर आगे बढ़े ।संघ के स्वयंसेवक समाज के सहयोग से भारत के हर परिवार में पहुंच कर यह बताने का प्रयास कर रहें हैं की बच्चों को ऐसी शिक्षा देने और दिलाने का प्रयास करें जिससे बच्चों और पारिवारिक सदस्यों का जीवन स्व आधारित होनी चाहिए।स्व का अर्थ आधुनिकता विरोधी नहीं सर्वश्रेष्ठ होना चाहिए।हमारा परिवार पर्यावरण की भी रक्षा करेगा , अपनी जीवन शैली पर्यावरण के अनुकूल बने । घर की बनावट ऐसी होनी चाहिए की उसे दिखने से ही हिंदू घर की छवि बने। घर में पूजा का स्थान अवश्य हो । घर चाहे कितना छोटा ही क्यों न हो परंतु तुलसी का बिरवा अवश्य स्थापित हो । हो सके तो गमले में ही सही केले का पौधा भी लगा हो । घर पर ॐ का या स्वास्तिक का चिह्न अवश्य बना हो ।घर पर यथा स्थान मंगल ध्वज भगवा रंग में स्थापित हो ।सायंकाल संध्यावादन , संध्या पूजन की परंपरा डालनी चाहिए।मंगल ध्वनि , शंख, घंटा घड़ियाल बजने से , आरती पूजन होने से , सुविधानुसार समय समय पर यज्ञ हवन से भी वातावरण शुद्ध और आनंददायक बनता है।घर का निर्माण या नवीनीकरण करें तो वास्तुशास्त्र का ध्यान अवश्य रखें ।यह विज्ञान प्रकृति से तालमेल रखने की एक विधा है।भारत में चेतना विज्ञान अत्यधिक विकसित था यह तथ्य निर्विवाद है।भारत का आध्यात्म संस्कृति विस्तार है अतः विज्ञान और प्रकृति का समन्वय यहाँ पग- पग पर देखने को मिलता है।कुटुंब रचना में भी विज्ञान है । भारत का हैपीनेस इंडेक्स इस वर्ष आठ अंक बढ़ा है यह प्रसन्नता का विषय है।परिवार में बालक को सिखाना चाहिए की जैसी परिस्थिति हो उसे सयंम पूर्वक स्वीकारना चाहिए।

              कुटुंब प्रबोधन में शिक्षा,संस्कार संगति, एकात्मकता और परिवार की भूमिका का बड़ा महत्व है। ध्यान रखना होगा कि बालक ठीक से शिक्षा प्राप्त कर रहें हैं की नहीं । मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा सर्वश्रेष्ठ माना जाता है ।परिवार की घरेलू शिक्षा जो माँ, पिता और बड़े बूढ़ों से प्राप्त होती है वह व्यवस्थित होनी चाहिए।माँ पिता द्वारा बच्चों को आध्यात्मिक,सांस्कृतिक गीत, श्लोक, भजन, प्रातः स्मरण आदि कंठस्थ कराने चाहिए।इसी प्रकार परिवार के बड़ों को संस्कार देने में सक्षम होना चाहिए। बिस्तर पर सोते समय कहिनियों के माध्यम से संस्कार देने की परंपरा प्राचीनकाल से चली आ रही है। इसके लिए समय निकालना होगा ।ध्यान देना होगा की बालकों की संगति ठीक हो। मित्र, खेल समूह और बड़ों की संगति भी ठीक होनी चाहिए।परिवार में सहयोग की भावना विकसित कर के पारिवारिक एकात्मकता का पाठ पढ़ाना आज की महती आवश्यकता है।यह भी ध्यान रखना होगा कि पूरा परिवार समाज और राष्ट्र धर्म में योगदान दे कर अपनी भूमिका निभा रहा है की नहीं।बच्चों और बड़ों में यह संदेश जाना चाहिए कि देश हमें देता है सबकुछ तो हम भी कुछ देना सीखें।इसकी शुरुआत स्वयं से अर्थात् फर्स्ट पर्सन सिंगुलर नंबर आई से प्रारंभ होना चाहिए। भारत का अस्तित्व अबतक बचा हुआ है क्योंकि भारत ने अनेकों युद्ध और झंझावात झेले परंतु अपनी परिवार व्यवस्था बचा कर रक्खा हुआ है। युग की माँग है की यह परंपरा हम जारी रखें। चुनौतियां आज भी सामने हैं। छोटे बच्चों के हाँथ में मोबाइल हैं। ओटीटी प्लेटफार्म हैं। पारिवारिक संबंध टूट रहे हैं। मातापिता दोनों को कमाना पड़ रहा है। देर से शादी हो रही है।हम दो हमारे एक का नारा चल पड़ा है। डिंक फैमिली की अवधारणा प्रबल है । विवाह फेल हो रहें हैं। मातापिता में विवाह विच्छेद की संख्या बढ़ रही है। बच्चों को सिंगल पैरेंट के साथ जीवनयापन करना पद रहा है।परंतु इन चुनौतियों का सामना करने का संकल्प संघ ने लिया है तो उसे पूरी निष्ठा से निपटने के लिए कुटुंब प्रबोधन का प्रकल्प चलाया जा रहा है।संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा बेंगलुरु में भी विचार विमर्श और रणनीति बनाई गई है। कार्यक्रम की समीक्षा की जा रही है।सफलता के लिए समाज को एकजुट हो कर सामने आना पड़ेगा ।

         नारी की भूमिका परिवार प्रबोधन में सर्वाधिक अग्रणी है। इसके लिए परिवार में नारी का सम्मान होना चाहिए । नारी संचालक है अतः सम्मानपूर्वक उसे भूमिका के संचालक में आगे आने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जगह-जगह संवाद, संगोष्ठी,विचार गोष्ठी ,सम्मेलन , प्रवचन , लेखन, परिचर्चा का आयोजन हो रहा है।नारी माँ जगतजननी शक्ति स्वरूपा , मातृ शक्ति है । कुटुंब प्रबोधन में नारी शक्ति की अपार संभावनाएं हैं अतः वे आह्वान पर हर जगह आगे आ कर दायित्व संभाल रही हैं ।सम्पूर्ण देशभर में कुटुंब प्रबोधन के कार्य में मातृशक्ति सबसे आगे चल रहीं है यह हर्ष का विषय है।

                संघ ने कुटुंब प्रबोधन में छ विंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया है । यह हैं भाषा, भूषा,भोजन, भजन,भवन एवं भ्रमण ।भारत में 45 संघ प्रांत निर्धारित है ।प्रत्येक प्रांत में कुटुंब प्रबोधन के संयोजक दायित्व संभाल रहें हैं।महर्षि अरविंद का 15 अगस्त 1947 को रेडियो पर भाषण है जिसमें उन्होंने कहा था कि आज इस देश का विभाजन हुआ है लेकिन यह देश अखंड हो कर रहेगा । इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। आपको संघर्ष करना पड़ेगा , सारी बातें होंगी, लेकिन एकदिन ऐसा आएगा , यह अखंड होगा ।इस विंदु को संघ ने ध्यान में रक्खा है । शताब्दी वर्ष में घर-घर पहुँच कर राष्ट्रीय एकता का संदेश देना है । परिवार को तैयार करना है की वह नई ऊर्जा से भर कर पारिवारिक संस्कारों के संवर्धन का कार्य करे और परिवार जागरण के यज्ञ में अपना योगदान दें।भाषा के अंतर्गत मातृभाषा में बच्चों को प्राथमिक शिक्षा दिलाए। इसके अतिरिक्त एक अन्य भारतीय भाषा को संपर्क भाषा के रूप में पढ़ने दें। अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में एक विदेशी भाषा भी पढ़ने दें ।भूषा में विशेष ध्यान दें की बच्चे विशेषकर बच्चियाँ विदेशी फैशन की नकल न करते हुए शालीन भारतीय वस्त्र पहनें।विदेशों की नकल न करते हुए जंक फ़ूड पिज़्ज़ा बर्गर डिब्बा बंद खाद्य पदार्थ से बच्चे। हेल्दी खाना देश काल परिस्थिति के अनुसार अपने क्षेत्रानुसार मोटे अनाज को सम्मिलित करते हुए खायें और उसमें रुचि उत्पन्न करने का प्रयास करें। घर में प्रातः या सायंकाल पूरा परिवार एकत्र होकर भजन में भाग लें । अपनी घर को भारतीय परम्परा के अनुसार सजाएँ। गाँव, देहात, नगर को स्वक्ष बनाये । हिन्दू प्रतीक चिन्हों को घर पर प्रदर्शित करें। भगवा ध्वज लहरायें।और परिवार के साथ अपनें गांव नगर प्रांत के साथ साथ देश के प्रमुख तीर्थ स्थलों का भ्रमण करें।परिवार के विवाह कार्यक्रमों में दिखावा न करें वरन् वास्तविक सप्तपदी, सातवचन ,हिंदू संस्कार और विवाह के रस्मों, रिवाजों पर ध्यान दें। सादगी के साथ वास्तविक ख़ुशी प्राप्त करें । विवाहों का व्यापारीकरण न होने दें । वास्तविक परंपराओं को महत्व दें न कि आडंबर, दंभ, दिखावा करें ।निश्चय ही हम इस यज्ञ में जहाँ हैं , जैसे हैं , उसी स्वरूप में वहीं से अपना योगदान दें ।

       

         


CONTACT-NO- 9453140038


From Blogger iPhone client