पश्चिम बंगाल: डिलीट डिटेक्ट और डिपोर्ट
भारत भूमी प्राचीन काल से दुनिया के आकर्षण का केंद्र रही है। यहाँ की प्राकृतिक बनावट, जीवन पद्धति ,समुन्नत सभ्यता और संस्कृति,धन संपदा , प्राचीन गणतन्त्र तथा आध्यात्म आधारित जीवन पूरी दुनिया का आदर्श बना रहा। यही कारण रहा है कि यहाँ कोई लुटेरा बन कर आया कोई व्यापारी बन कर आया तो कोई ज्ञान विज्ञान से आकर्षित होकर भारत भूमि पर आया। कुछ को यह देश इतना आकर्षक लगा की वे यहाँ के समाज में घुलमिल गए तथा यहीं के हो कर रह गए। समस्या तब उत्पन्न हुई जब बाहर से मज़हब और रिलिजन के अनुयायी यहाँ कब्जा करने के इरादे से उत्पात मचाने लगे तथा डेमोग्राफी बदलने लगे। इस देश को उन्होंने धर्मशाला समझ लिया और हमसे शत्रुवत् व्यवहार करने लगे। स्वतंत्रता के बाद शासन व्यवस्था ऐसी आई की वोट लेकर सत्ता में बने रहने हेतु घुसपैठियों का तुष्टिकरण खुलेआम होने लगा । विदेशों में जन्मे मज़हब और रिलीजन के मतावलंबी आक्रामक रूप से देश के संसाधनों पर कब्जा करने लगे। लचर क़ानून व्यवस्था तथा लालची राजनीतिज्ञों का सहारा लेकर वे देश कब्जाने का सपना देखने लगे। उन्होंने संख्याबल के आधार पर सत्ता प्राप्त करने के उद्देश्य से घुसपैठ, धर्मांतरण, लव और भूमि जेहाद का रास्ता चुना । पश्चिम बंगाल , आसाम जम्मू काश्मीर , केरलम और पूर्वोत्तर के कई राज्य इस समस्या के केंद्र बन गए। सबसे खतरनाक स्थिति पश्चिम बंगाल और आसाम की हो गई। जनसांख्यिकीय बदलाव राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन गए। आर्थिक और सामाजिक समस्या तो पहले से ही था । आंतरिक अशांति, बाहरी खतरों और राष्ट्र की संप्रभुता का संकट खड़ा हो गया। बांग्लादेश और म्यांमार जैसे पड़ोसी देशों से घुसपैठ के कारण पश्चिमी बंगाल,असम , त्रिपुरा और बिहार के सीमावर्ती जिलों सहित देश के अन्य स्थानों में घुसपैठियों की संख्या एक अनुमान के अनुसार दस करोड़ तक पहुंच गई है। देश की सीमा पर तस्करी , राष्ट्र विरोधी गतिविधियों जैसे जासूसी , जमीनों पर कब्जे, क्षेत्रीय भाषाई टकराव , सांस्कृतिक पहचान पर संकट जैसी चुनौतियां खड़ी हो गई।इन क्षेत्रों में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर , असम आंदोलन समझौता, रोजगार, भूमि स्वामित्व जैसे विषय चर्चा के केंद्र बने। घुसपैठिये तय करने लगे कि सरकार कौन चलाएगा। संविधान के अनुच्छेद ३२६ में केवल भारतीय नागरिकों को वोट देने का अधिकार है परंतु घुसपैठियों के वोटर लिस्ट, राशन कार्ड, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस सब सुनियोजित तरीक़े से बनवा दिए गए। घुसपैठिया तो राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर वोट देगा नहीं वो तो यह देखेगा कि कौन उसे इस देश में रहने देगा। इन सब संकटों के बीच जनजागरण हुआ और बंगाल असम की जनता की निद्रा टूटी। सत्ता परिवर्तन हुआ तो व्यवस्थाएं बदली। यह एक ईश्वरीय चमत्कार जैसा हुआ है। सट्टा बदलते ही बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठियों की भीड़ वापस बांग्लादेश जाने के लिए इकट्ठी होने लगी है ।
बंगाल चुनाव में अपने भाषणों में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और बीजेपी के कई मंत्रियों ने बंगाल की जनता को यह आश्वासन दिया था कि चुनाव जीतने के बाद घुसपैठियों की समस्या को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए डिलीट, डिटेक्ट और डिपोर्ट किया जाएगा। देश के चुनाव आयोग ने एस आई आर प्रक्रिया से कुछ सीमा तक कुछ घुसपैठियों को वोट देने से रोका है। परंतु बंगाल में घुसपैठियों की संख्या करोड़ों में है। वामपंथी , कांग्रेस और ममता सरकार में ये घुसपैठिये अपनी इतनी गहरी पैठ बंगाल में बना चुके हैं कि उन्हें एक झटके में बाहर निकालना बहुत मुश्किल है। परंतु यह कार्य असंभव भी नहीं है। आवश्यकता है सत्ता की दृढ़ इक्षाशक्ति की। कुशल प्रशासनिक व्यवस्था तथा केंद्र सरकार की प्रभावी विदेश नीति की । सेंटर फॉर रिसर्च फॉर इंडो बांग्लादेश रिलेशन के अनुसार उत्तर और दक्षिण २४ परगना , नादिया, मुर्शिदाबाद , वीरभूमि , हावड़ा और कोलिकाता आदि स्थानों पर ब्लॉक स्तर पर शोध करने के बाद यह पाया है कि इन क्षेत्रों में सर्वाधिक बांग्लादेशी बहुत गहराई तक अपनी पैठ बना चुकें है। वर्ष २०११ की जनगणना में मुर्शिदाबाद में ६६%,मालदा में५१.२७% तथा उत्तर दिनाजपुर में मुस्लिम आबादी ५०% पाई गई थी जिसमें अधिकांश मुस्लिम १९७१ युद्ध के समय शरणार्थी बन कर आए थे। इनके लिंक बंगला देश में बहुत अच्छे हैं तथा ये आज भी बांग्लादेश से आए घुसपैठियों को शेल्टर दे कर देश और बंगाल के अन्य स्थानों पर बसाने का सिंडिकेट चलाते हैं। इन क्षेत्रों में अवैध मदरसों और मस्जिदों का जाल बिछा हुआ है जहाँ से ये सिंडिकेट अपना कार्य करते हैं। यहाँ से हिंदू पलायन कर रहें हैं क्यों कि भारत में ही संभव है हिंदुओं का पलायन । हिंदुओं को अब छोड़ना होगा भगोड़ापन। सरकार हिंदू या किसी भी समुदाय को सीमित संरक्षण दे सकती है । समस्या से डर कर भाग जाना कोई समाधान नहीं है। समाधान हिंदू एकता से ही आयेगा । बंगला देश भारत सीमा पर आज भी लगभग ७०० किलोमीटर तक फेंसिंग सुरक्षा के तार नहीं बिछे हैं। अब सरकार बदलने पर बॉर्डर सुक्यूरिटी फोर्स को ज़मीन हस्तांतरित कर दी गई है तथा युद्धस्तर पर बाड़बंदी का कार्य प्रारंभ किया जा रहा है। इस कार्य में समय लगेगा । घुसपैठ पर माधव गोडबोले की रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजी गई थी जिसमें घुसपैठ रोकने के लिए विगत सरकारों की तीव्र भर्त्सना की गई थी और वर्तमान सरकार के प्रयासों को नाकाफी बताया गया था । हो सकता है कि शेख हसीना की बांग्लादेश में सरकार थी जिससे भारत सरकार के अच्छे रिश्ते थे अतः शेख हसीना कहीं नाराज न हो जायं इस लिए तेजगति से कदम न उठाये गयें हों। आज बांग्लादेश में सरकार भारत विरोधी बर्ताव कर रही है अतः आवश्यकता है कि कड़ाई से घुसपैठ रोकने के सभी कदम उठायें जायँ ।
भारत सरकार और बंगाल सरकार को समन्वित रूप से मिल कर तेज गति से काम करने का समय आ गया है। धन या सुरक्षा एजेंसियों की बड़ी संख्या और मात्रा में व्यवस्था करनी होगी । खुफिया तंत्र को बड़ी संख्या में तैनाती कर के एनी संस्थाओं को सक्रिय करना होगा जिससे जो सरकारी कागजपत्र घुसपैठियों ने बनवा कर भारतीय होने की खानापूर्ति कर ली है उसे निरस्त किया जा सके । यह उचित समय है की बंगाल में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर कार्यक्रम तेजी से ईमानदारी पूर्वक सभी वैधानिक औपचारिकताओं को पूरा करते हुए प्रारंभ किया जाय । इस समय बंगाल की अधिकांश जनता वर्तमान सरकार का साथ देगी अतः अवसर को गवाना नहीं चाहिए। एसआईआर भी ताजा- ताजा हुआ है अतः इस दिशा में कुछ काम हो चुका है बाकी काम बहुत तेजी से पूरा करना होगा ।इस कार्य से डिलीट वाला कार्य होगा ।
दूसरा महत्वपूर्ण कार्य है डिटेक्ट करने का । अभी वर्तमान सरकार बहुत सावधानी पूर्वक सुविधाएं दे कर बंगलादेशियों को एक महीने का राशन दे कर बॉर्डर से अपने देश जाने की पहल कर रही है मगर जानेवालों की संख्या बहुत कम है। अभी आवश्यकता है बड़ी संख्या में डिटेंशन सेंटर के निर्माण करने की । इन सेंटरों में पहचाने गए विदेशियों को अस्थाई रूप से रख कर कारावास जैसी सुविधा प्रदान करनी होगी। इस कार्य पर खर्च बहुत आएगा । मुझे याद है की १९७१ में बांग्लादेशी शरणार्थियों के अतिरिक्त ख़र्चों को वहन करने के लिए इंदिरागांधी ने सम्पूर्ण देश में सेस लगाया था। उस समय दस पैसे के रेवेन्यू टिकट का दाम बीस पैसे कर दिया गया था । वर्तमान सरकार यदि आह्वान कर देशवासियों से बंगाल समस्या के लिए कोई कदम उठाती है तो देश की जानता इसमें सहयोग कर सकती है। वैसे साकार स्वयं सक्षम है। यह कार्य नितांत आवश्यक है।
तीसरा सबसे कठिन कार्य है डिपोर्ट करने का । बांग्लादेश की वर्तमान सरकार आसानी से इतनी बड़ी संख्या में अपनेही नागरिकों को लेने के लिए तैयार नहीं होगी। वह अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का हवाला देगी । बांग्लादेशी नागरिकता के पक्के सबूत माँगेगी । भारत साकार को अनेक क्या अधिकांश मामलों में अपने ही न्यायालय में जाना पड़ेगा जिससे यह सिद्ध किया जा सके कि भेजा जानेवाला व्यक्ति वास्तव में बांग्लादेशी या म्यामारी है । यह कहीं से भी भारतीय नागरिक नहीं है। यह एक कठिन प्रक्रिया है। समय बहुत लगेगा। यह भी संभव है की अनेक बांग्लादेशी या म्यामारी यह सिद्ध करनें में सफल हो जायँ की वे बहुत लंबे समय से भारत में रह रहें है और उन्हें भारत में ही रहने दिया जाय । परंतु भारत सरकार इनको भारत पर बोझ मानेगी। वर्तमान सरकार तो किसी क़ीमत पर उन्हें भारतीय स्वीकार नहीं करेगी न ही वह उन्हें भारत में रहने देगी। भले ही भारत सरकार उन्हें विदेशी नागरिक मानते हुए , वोटिंग अधिकार समाप्त करते हुए या भारतीय समस्त सुविधाओं , योजनाओं के लाभ से वंचित करते हुए भारत में कुछ और समय तक , जब तक बांग्लादेश उन्हें स्वीकार न करे तब तक के लिए उन्हें सीमित क्षेत्र में सश्रम कार्य करते हुए जीवन यापन की अनुमति दे । इस बीच भारत सरकार को अपने समस्त अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का प्रयोग करते हुए बांग्लादेश पर दबाव बनाना होगा की वह अपने नागरिकों को वापस ले और इसके बाद भी यदि बांग्लादेश न माने तो अंतिम उपाय यह होगा कि भारत सरकार सेना का प्रयोग करके बांग्लादेश की बॉर्डर का सीमोलंघन करे और उन्ही की ज़मीन को कब्जा करके भारत के घुसपैठियों को वहाँ झोपड़ी बनवाकर विस्थापित करे। इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कूटनीति का प्रयोग करके अन्य देशों को सूचित करते हुए विश्वास में लेना होगा ।