भारतीय नववर्ष का महत्व
लेखक :- अशोक कुमार सिन्हा,
उपाध्यक्ष,विश्व संवाद केंद्र , लखनऊ ।
भौतिकवादी विश्व को भारतीय विचारधारा एवं ज्ञान- विज्ञान ने प्रभावित किया है । भारत सृष्टि रचना का मूल विंदु है। वर्षों पूर्व कालगणना का केंद्र भारत की अवंती ( वर्तमान उज्जयिनी )नगरी ही थी। भारतीय नववर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नवसंवत्सर के रूप में प्रारम्भ होता है । प्राचीनतम सनातन धर्म में नवसंवत्सर उपयोगी , प्रभावी एवं व्यवहारिक है । भारत भूमि देवताओं के द्वारा पूजित है।भारतीय संस्कृति में प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठा कर जीवन जीना सिखाया जाता है। काल को निरंतर और चिरगामी माना जाता है ,यह अनादि है शिव है एवं समस्त ब्रह्मांड का मूल कारण है। ऋषि प्रज्ञा भारतीय वेद , दर्शनशास्त्र की यह पराकाष्ठा सम्पूर्ण अस्तित्व के समग्र चिंतन का परिचायक है।आधुनिक विज्ञान मानता है कि कालयात्रा एक बिंदु से प्रारंभ होती है । बिग- बैंग जब होता है वहाँ से सृष्टि की उत्पत्ति मानी जाती है। अन्य प्राचीन काल गणनाओं में से भारतीय कालयात्रा ही मात्र एक है जो आधुनिक विज्ञान के साथ मेल खाती है क्यों की भारतीय मनीषियों ने काल को खंड में भी बड़ी सुंदरता से समझा है और प्रस्तुत किया है। गणना सूक्षतम माप से लेकर विशाल स्तर तक अलग-अलग संज्ञाओं से की गई है जो ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान स्थिति तक काल यात्रा के रूप में वर्णित हैं।भारत में विविधता में एकता का एक सर्व समावेशी दर्शन मान्य है । संस्कृति सबकी एक चिरंतन खून रगों में हिंदू है , यह गीत हम संघ की शाखाओं में गाते आए हैं । भारत एक बड़ा देश है । भाषा, रहन - सहन , वेशभूषा , खानपान , रंगरूप में भिन्नता होने पर भी पूरे राष्ट्र में सांस्कृतिक एकता ही इस देश की धरोहर है । पूरे भारतवर्ष में विभिन्न नामों से नववर्ष मनाए जातें हैं जिसमें मुख्य हैं वसंतोत्सव, चैत्रमाह प्रतिपदा , बंगाल का नववर्ष है नवरात्र , आंध्र तेलंगाना में इसे कहतें हैं उगादि, तमिल क्षेत्र में इसका नाम है - विशु। महाराष्ट्र में नववर्ष है गुड़िपाड़वा । उत्तरपूर्व के राज्यों में इसे बिहू के नाम से जानते हैं।केरल में पोंगल को नव वर्ष होने का गौरव प्राप्त है। जैन मतावलंबी 13 पंथी श्रमण दीपावली को महावीर स्वामी की अवतरण तिथि एवं नव वर्ष के रूप में आयोजित करतें है। राजस्थान और गुजरात में व्यापारी इसी तिथि से नई बहियाँ बनाते हैं , पंजाबी इसे वैशाखी और सिंधी इसे चेटीचंद से जोड़ते हैं। सौराष्ट्र में इसे तुलसी विवाह कहतें हैं , पारसी इसे नवरोज नाम देते हैं ।आर्यसमाज इसे आर्यवत्सर कहता है।इस प्रकार भारतीय जीवन में यह नववर्ष एक ओर आध्यात्म और दूसरी ओर कृषि उत्पादन से प्रभावित है।लंबे कालखंड के ग़ुलामी में आत्मविस्मृति एवं आत्महीनता से ग्रस्त मैकाले एवं मार्क्स के मानसपुत्रों के प्रभाव से ग्रस्त स्वतंत्र भारत के राजपुत्रों नें पश्चिमी जगत के भौतिक चकाचौंध से अभिभूत होकर ग्रेगेरियन कैलेंडर पर आधारित पहली जनवरी को नववर्ष मनाना स्वीकार कर लिया। 1952 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नें प्रोफेसर मेघानाद साहा की अध्यक्षता में पंचांग सुधार समिति बनाई थी । इसी समिती के सुझाव पर ग्रेगेरियन कैलेंडर का पिछलग्गू शक संवत् बना जिसे राष्ट्रीय पंचांग कहा गया । भारत सरकार ने स्वयं को भारतीय संस्कृति का पुजारी दर्शाने के लिए 22 मार्च 1957 को पंचांग भी लागू कर दिया।
युग - युग से भारतीयों का यह मत रहा है कि मानव जीवन महाकाल की अखंड उपासना है।ब्रह्मांड चिंतन करते हुए खगोल तथा भूगोल की दशा और दिशा का विचार करके सूर्य चंद्र तथा नक्षत्र अंतरिक्ष का पूर्वाभास करके फलित गणित के आधार पर जो समयसारणी तैयार की गई उसे पंचांग कहा जाता है । उसके सहारे ग्रहगोचर स्थिति के शुभाशुभ योग की गणना की जाती है।इसकी परंपरा वैदिक युग से प्राप्त होती है किंतु इसे व्यवस्थित रूप दिया महाराज विक्रमादित्य ने । इस लिए भारतीय लोकजीवन में नववर्ष को विक्रम संवत्सर कहा जाता है । भारतीयों का यह नववर्ष प्रारंभ होता है चैत्र प्रतिपदा से । इसे संस्कृति का स्वर्णिम प्रभात कहा जाता है । भगवान भुवन भास्कर अपनी सिंदूरी किरणों के साथ जब उदयाचल से अवतरित होते हैं तब हम उसे भक्तिभाव पूरित प्रणामांजलि अर्पित करते हैं और फिर प्रारंभ होती है नववर्ष की मंगलबेला । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सामाजिक महत्व के जिन छ उत्सवों को वर्ष भर में मनाता है उनमे यह वर्ष प्रतिपदा के नाम से प्रसिद्ध है ।ब्रह्म पुराण के अनुसार ब्रह्माजी ने चैत्र मास शुक्लपक्ष के प्रथम दिन सूर्योदय होने पर जगत सृष्टि की । इसी कारण उसी दिन से नए संवत्सर का प्रारंभ माना जाता है ।राष्ट्र के स्वाभिमान व देश प्रेम को जगाने वाले अनेक प्रसंग चैत्रमास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से जुड़े हुए हैं ।
ऐतिहासिक महत्व :
1- शृष्टि रचना का प्रथम दिन : आज से एक अरब 95 करोड़ 58 लाख 85 हज़ार 128 वर्ष पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्मा जी ने जगत की रचना की थी।
2- प्रभु राम का राज्याभिषेक दिवस: प्रभु राम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अयोध्या आने पर अपने राज्याभिषेक के लिए चुना।
3-नवरात्र स्थापना: शक्ति आराधना और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नौरात्रि प्रारम्भ, कलश स्थापना , पूजन और ध्वजारोहण का दिन।यह शुभ दिन इस वर्ष 19 मार्च 2026 को पड़ेगा।
4- गुरु अंगददेव जी का प्रकटोत्सव: सिक्ख परंपरा के द्वितीय गुरु का जन्मदिन ।
5- आर्यसमाज स्थापना दिवस :समाज को श्रेष्ठ ( आर्य )मार्ग पर प ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन को आर्यसमाज स्थापना दिवस के रूप में चुना।
6-संत झूले लाल जन्म दिवस: सिंध समाज के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरुणावतार संत झूलेलाल का जन्मदिवस ।
7- डा . केशवराव बलिराम हेडगेवार जन्म दिवस : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक एवं संगठन के आद्य सरसंघचालक डा हेडगेवार का जन्म दिवस।
8- शालिवाहन संवत्सर का प्रारम्भ दिवस : विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना।
9- युगाब्द संवत्सर का प्रथमदिन महाराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक इसी दिन हुआ था ।
10- महाराज विक्रमादित्य द्वारा शकों पर प्राप्त विजय दिवस के उपलक्ष्य में विक्रमी संवत् का प्रारंभ दिवस ।विक्रमी संवत् 2083 का प्रारम्भ इस वर्ष इसी दिन से होगा।
11- युगाब्द संवत्सर 5125 का प्रथम दिन इस वर्ष मनाया जाएगा ।
12- महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन महीना और वर्ष की गणना करते हुए पंचांग की रचना की थी ।
13- इसी तिथि को रेवती नक्षत्र , विष्कुंभ योग में दिन के समय भगवान के प्रथम अवतार मत्स्यरूप का प्रादुर्भाव माना जाता है।
प्राकृतिक महत्व :
पतझड़ की समाप्ति और वसंत का प्रारम्भ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है। शरद ऋतु के पश्चात व ग्रीष्म के आगमन के पूर्व वसंत अपने चरम पर होता है । सभी पौधों, पेड़ आदि पर नए किसलय निकलतें है। आम के बृक्षों में बौर लगतीं हैं जिसकी मनमोहक सुगन्ध चहुँओर छा जाती है। कोयल की कूंक गुंजायमान होती रहती है। खेतों में फसल उम्मत और परिपक्व अवस्था में पहुँच जाती है।
आध्यात्मिक महत्व:
वर्ष प्रतिपदा से ही नौरात्री अर्थात् नौ दिन तक शुद्ध सात्विक जीवन जी कर शक्ति की आराधना , दिन-दुखियों की सेवा, सहायता हेतु समाज प्रेरित होता है। सभी मांगलिक कार्य इन नौ दिनों में निर्विघ्न माने जाते हैं। नवें दिन नौ कन्याओं व एक लंगूर ( किशोर) का पूजन कर आदरपूर्वक स्वादिष्ट भोजन करा कर दक्षिणा से उन्हें प्रफुल्लित किया जाता है।
वैज्ञानिक महत्व :
सौरमंडल के ग्रहों, नक्षत्रों की चाल और निरन्तर उनकी बदलती स्थिति पर ही हमारे दिन , महीने , वर्ष और उनके सूक्ष्मतम भाग आधारित होते हैं।पूरे भूचक्र अर्थात 360 डिग्री को बारह बराबर भागों में बांटा गया है जिसे राशि कहा जाता है। प्रत्येक नक्षत्रों को पुनः चार भागों में बांटा गया है जिसका एक चरण तीन डिग्री बीस मिनट का होता है । जन्म के समय जो राशि पूर्व दिशा में होती है उसे लग्न कहा जाता है।इसी वैज्ञानिक और गणितीय आधार पर विश्व की प्राचीनतम कालगणना की स्थापना हुई।
कैसे मनाये नया वर्ष :
नव वर्ष की पूर्व संध्या पर दीपदान करें। घरों में सायंकाल सात बजे शंख, घंटा घड़ियाल बजा कर सपरिवार मंगलध्वनि करके नव वर्ष का स्वागत करें। भवनों, व्यवसायिक स्थानों पर भगवा ध्वज गहरायें। द्वार पर शुभकामना तोरण बाँधे। शोसल मीडिया पर , छपे कार्ड द्वारा, यथाशक्ति होर्डिंग, बैनर , बधाई पत्रों, ईमेल, संदेश तथा एस एम एस द्वारा शुभकामना संदेश प्रेषित करे । प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व मंगलाचरण कर सूर्यदेव को प्रणाम करें। प्रभातफेरियां निकाले, हवन करें तथा जीवन के लिए हितकारी एक संकल्प लें। कालोनियों , अपार्टमेंट्स में परिचितों, अपरिचितों सभी से मुलाकात कर बधाई दें मिष्ठान बांटे तथा खुश रहे। वर्ष का प्रारम्भ आनंदित हो कर करें। किसी मंदिर , उपासनास्थल में पूजा करें। मन में स्व जागरण की अनुभूति करें ।आप सभी को नव वर्ष की शुभकानाएँ ।
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