Thursday, 21 May 2026

आत्मबोध जगाता वि.हिन्दू परिषद का कार्यकर्ता विकास वर्ग 

लेखक:- अशोक सिन्हा , उपाध्यक्ष , विश्व संवाद केंद्र, अवध , लखनऊ।

             विश्व हिंदू परिषद को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समवैचारिक संगठन के परिप्रेक्ष्य में देखना अनुचित नहीं होगा क्योंकि इसे संघ के स्वयंसेवकों ने साधु संतों तथा समाज के सहयोग से सांस्कृतिक और धार्मिक स्तर पर उस अवश्यकता के प्रत्युत्तर में स्थापित किया था जिसमें हिंदू समाज की सांस्कृतिक पहचान,, परंपराओं , धार्मिक संस्थानों के संरक्षण तथा वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक संवाद की आवश्यकता स्थापित करना था। संगठन का उद्देश्य समाज को सांस्कृतिक आधार पर संगठित करना , समरसता को बढ़ावा देना - कार्यों का विस्तार करना और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को सुदृढ़ करना है। समाज में सांस्कृतिक जागरूकता, धार्मिक सहिष्णुता , परम्पराओं के प्रति सम्मान और सामूहिक पहचान की भावना का विस्तार सहित सामाजिक एकता और आत्मबोध को इस संगठन की स्थापना से बल मिला है ।

                   विश्व हिंदू परिषद की स्थापना श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन वर्ष 1964 में मुंबई के पवई स्थित स्वामी श्री चिन्म्यमनंद के संदीपनी आश्रम में हुई । स्वयं सरसंघचालक माधवराव सदाशिव गोलवरकर के पहल पर और उनकी देखरेख में इस संगठन की नींव पड़ी । विश्व कल्याण की कामना से विश्व के हिंदुओं का सशक्त और अजेय संगठन खड़ा करना , हिंदू दर्शन , आस्थाओं,जीवन मूल्यों, परंपराओं, धर्म की रक्षा करने के साथ-साथ विश्वभर में फैले हिंदुओं से समन्वय स्थापित करना संगठन का प्रमुख कार्य है। संगठनात्मक तंत्र में सम्पूर्ण भारत को तेरह क्षेत्रों,47 प्रांतों,353 विभागों, 1125 जिलों, 10,330 प्रखंडों, 21,205 खंडों और 46,588 ग्राम व बस्तियों में बाटा गया है। विदेश के राष्ट्रों में चैप्टर स्थापित हैं। भारत में प्रन्यासी मंडल में 143 और विदेशों में 73 सदस्य कार्यरत हैं। इसके केंद्रीय स्थायी समिति के सदस्यों की संख्या 16 और कार्यकारिणी में 76 सदस्य हैं । अपनी स्थापना के बाद इसकी प्रथम विश्व हिंदू सम्मेलन प्रयाग कुंभ में जनवरी 1966 में संपन्न हुई जिसमें मैसूर महाराज चमराज वाडियार अध्यक्ष और दादासाहेब आप्टे जी को महामंत्री घोषित किया गया । परावर्तन (घरवापसी) को एक मुख्य कार्यक्रम घोषित किया गया। संगठन का बोधवाक्य “ धर्मो रक्षति रक्षितः “ और बोध चिन्ह “ अक्षय वटवृक्ष “ निर्धारित किया गया । द्वितीय विश्व हिंदू सम्मेलन जनवरी 1979 में पुनः प्रयाग कुंभ में हुआ जिसमें अट्ठारह राष्ट्रों के साठ हज़ार हिंदुओं सहित देश के समस्त शंकराचार्य, स्वामी, दलाई लामा, नागारानी गाईडील्यू की सहभागिता रही । प्रकृति पूजक बनवासी समुदाय हिंदू समाज का ही अभिन्न अंग है , इसकी घोषणा हुई।दिसम्बर 1969 में कर्नाटक के उडुपी धर्म संसद में हिंदुओं में छुआछूत को शास्त्र- बाह्य घोषित करते हुए उद्घोष किया गया कि “ हिंदव: सोदरा सर्वे, ना हिंदू पतितो भवेत “। इस घोषणा को व्यवहारिक रूप देने के लिए 1994 के धर्म संसद में काशी के डोमराजा को अनेक संतों द्वारा निमंत्रण दे कर उनके घर खिचड़ी को प्रसाद रूप में ग्रहण कर अगले दिन धर्मसंसद में मंच पर साधुसंतों के मध्य बैठा कर स्वागत किया गया। 

     विश्व हिंदू परिषद के महिलाओं के मध्य एक आयाम के रूप में दुर्गा वाहिनी और पुरुषों के मध्य बजरंग दल का गठन करना दूरगामी सोच का परिणाम था। 1982 में एकात्मकता यात्रा का आयोजन हुआ जिसमें छ करोड़ हिंदुओं में सहभाग किया। वर्तमान में परिषद के विभिन्न आयामों द्वारा 7152 सेवाकार्य शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक और स्वावलंबन के क्षेत्रों में संचालित हो रहें हैं। गोरक्षा एवं गोसंवर्धन के अंतर्गत नस्लसुधार , पंचगव्य अनुसंधान केंद्र , औषधि निर्माण केंद्र आदि संचालित हो रहे हैं। बजरंग दलों और गौरक्षकों द्वारा पच्चीस लाख गायों को कसाइयों के हाथों से मुक्त कराया गया। चालीस लाख हिंदुओं का मत परिवर्तन रोकने के साथ नौ लाख हिंदुओं की घर वापसी करायी गई है। श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन का एक नियोजित संघर्ष शिलापूजन , कारसेवा, न्यायालय में वाद का क्रमबद्ध कार्यक्रम विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल दुर्गा वाहिनी सहित समस्त राष्ट्रवादी संगठनों ने चलाया । 2024 का अक्षत आंदोलन और 2026 में मंदिर की सम्पूर्णता कार्यक्रम सबसे प्रभावी कार्यक्रम रहे । इसके अतिरिक्त श्री राम सेतु रक्षा , जम्मू एवं काश्मीर की अमरनाथ यात्रा कार्यक्रम में बजरंगदल जैसे संगठनों ने अतुलनीय योगदान किया । ग्यारह राज्यों में धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम पास कराना और समरसता कार्यक्रमों के माध्यम से परिषद ने जो कार्यकर्ताओं की फ़ौज खड़ी की यह आज के युवाओं के प्रेरणास्रोत बने।

             दुर्गा वाहिनियाँ और बजरंग दल सहित विश्व हिंदू परिषद के देव- देवियों ने जो राष्ट्र को योगदान दिया और बड़े बड़े कार्य संपादित किए इसके पीछे उनका समर्पण, अनुशासन, निष्ठा, राष्ट्रभक्ति और देशसेवा की भावना जगी एक अनूठे संगठन क्षमता और गहन प्रशिक्षण से जो प्रतिवर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक के आयोजित होने वाले संघ शिक्षा वर्ग के समतुल्य प्रशिक्षण कैंपों से जिसे परिषद प्रतिवर्ष देश विदेशों में प्रतिवर्ष आयोजित करता है।दुर्गावाहिनी , विश्व हिंदू परिषद तथा बजरंगदल के प्रशिक्षण शिविर वर्ष में एक बार अक्सर मई या जून के महीनों में आयोजित होते हैं क्यों की इस समय स्कूल कॉलेजों में अवकाश रहता है जिससे स्कूल प्रबंधन से बात कर वहाँ भवन और मैदान प्राप्त किया जा सकता है। छात्रों की गर्मियों की छुट्टी रहती है अतः उनको भी भाग लेने में आसानी होती है। यह शिविर बीस दिनों या उससे भी अधिक दिनों के आयोजित होते हैं। कार्यकर्ताओं और प्रशिक्षणार्थिओं को इतने दिनों तक घर जाने की अनुमति नहीं होती है। वे पूरे चौबीस घंटे का प्रशिक्षण कार्यक्रम बना कर वहीं अपना बिस्तर , खाने के बर्तन व आवश्यक कपड़े लेकर पूर्ण समर्पित भाव से वहाँ जातें है। मोबाइल प्रयोग की वहाँ अत्यंत न्यूनतम समय के लिए अनुमति रहती है। पूरे भवन और प्रशिक्षार्थियों की सुरक्षा व्यवस्था कार्यकर्ता स्वयं शिफ्टवार ड्यूटी लगा कर करतें हैं। वहाँ अस्थाई रूप से कार्यालय, भोजनालय, अतिथि कक्ष, स्टोर, चिकित्सालय, बौद्धिक कक्ष, प्रेस रूम, स्वागती कक्ष , योग , खेल , व्यायाम के लिए मैदान आदि की व्यवस्था प्रशिक्षण के पूर्व ही व्यवस्थित कर ली जाती है। समुचित शौचालयों, स्नानघर की व्यवस्था भी बनाई जाती है। व्यवस्था पर आने वाले व्यय को स्वयं कुछ सीमा तक प्रशिक्षणार्थी वहन करते है तथा कम पड़ने पर समाज , मंदिरों या धार्मिक संस्थाओं से चंदा माँग कर पूरा किया जाता है। भोजन व्यवस्था, रक्षा व्यवस्था, मीडिया प्रबंधन, बौद्धिक विभाग, परिवहन एवं पार्किंग विभाग, व्यवस्था विभाग,स्वक्षता विभाग, अतिथि विभाग, शारीरिक शिक्षण विभाग , प्रशिक्षक व्यवस्था और शिविराधिकारी की पूर्ण व्यवस्था शिविर प्रारम्भ होने के एक महीने या और अधिक पहले से ही विधिवत बना ली जाती है तथा तैयारियों का समय- समय पर बैठकें कर के व्यवस्था सुनिश्चित की जाती है।

                   अपने संगठनों की क्या आवश्यकता है। लक्ष्य प्राप्त करने के लिए क्या शारीरिक, बौद्धिक , आर्थिक , रणनीतिक आवश्यकता होगी इसका आंकलन करके ही संपूर्ण व्यवस्था तैयार की जाती है। प्रशिक्षण पाठ्यक्रम और विषयवस्तु क्या होगी इसकी तैयारी बहुत समय पहले से ही की जा चुकी होती है। प्रातः चार बजे से रात्रि शयन तक का पूर्ण कार्यक्रम पोस्टर बना कर नोटिसबोर्ड पर लगा दिया जाता है और सभी को सामूहिक एकत्रीकरण के समय घोषित कर के समझा दिया जाता है। सबके वस्त्रों और उनके रंगों के बारे में पहले से ही सूचना रहती है। प्रातःकाल उठते ही नित्यक्रिया से निपटने के बाद एक बड़े हाल में एकत्र हो कर प्रार्थना, प्रातः स्मरण पाठ का वाचन आदि करने के बाद सभी मैदान में पहुँच जाते हैं जहाँ शारीरिक गतिविधियों, खेलकूद , नियुद्ध, दंड प्रहार आदि के कार्यक्रम होते है । सम्पूर्ण उपस्थित संख्या को आयु, क्षमता के अनुसार गटों में विभाजित कर के खेल- कूद , व्यायाम कराए जातें है। प्रातः आठ बजे तक एक से डेढ़ घंटे का अवकाश जलपान के लिए दिया जाता है। पुनः दस बजे से भोजन अवकाश के मध्य तक विभिन्न आवश्यक विषयों पर बौद्धिक ( लेक्चर ) का आयोजन होता है। प्रबोधन से कुशल व्यवस्था संपादन का लक्ष्य लेकर यह कालांश पूर्ण किया जाता है। तत्पश्चात सामूहिक भोजन और विश्राम का समय होता है । सायंकाल का समय खेल कूद , विभिन्न शारीरिक और सैन्य रणनीति के अनुसार कार्य करने का होता है । संध्या वंदन वि लघु अवकाश के बाद रात्रि में सामूहिक भोजन तत्पश्चात सामूहिक सभा में चर्चा , बौद्धिक, प्रश्नोत्तर , तथा रात्रि दस बजे सिटी बजने पर रात्रि विश्राम हेतु निर्धारित स्थान पर जाना।

             दुर्गा वाहिनी और बजरंगदल के शिविर अलग- अलग होते है । दुर्गा वाहिनी के शिविर में आत्मरक्षा हेतु नियुद्ध, दंड प्रहार, और अस्त्र- शस्त्रों का विशेष प्रक्षिक्षण दिया जाता है। ऐसे विकास वर्ग में समाज को ध्येय के साथ जोड़ना, अनुशासन का कठोर अभ्यास करना, सबको साथ लेकर काम करना , अहंकार विहीन आत्मविश्वास उत्पन्न करना, सहकारियों से परामर्श करते हुए लक्ष्य पूरा करना , सहकारियों को अवसर एवं प्रोत्साहन देना , संकट के समय स्वयं आगे रहना , श्रेय सबको बाँटना, स्वयं पीछे रहना, आपदा प्रबंधन, समाज सुरक्षा , धर्म रक्षा हेतु कटिबद्ध रहना और अपने जैसा कुशल कार्यकर्ता निर्माण करना आदि गुण विकसित होते हैं।


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Sunday, 22 March 2026

भारतीय नववर्ष का महत्व

भारतीय नववर्ष का महत्व 


लेखक :- अशोक कुमार सिन्हा, 

        उपाध्यक्ष,विश्व संवाद केंद्र , लखनऊ ।

               भौतिकवादी विश्व को भारतीय विचारधारा एवं ज्ञान- विज्ञान ने प्रभावित किया है । भारत सृष्टि रचना का मूल विंदु है। वर्षों पूर्व कालगणना का केंद्र भारत की अवंती ( वर्तमान उज्जयिनी )नगरी ही थी। भारतीय नववर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नवसंवत्सर के रूप में प्रारम्भ होता है । प्राचीनतम सनातन धर्म में नवसंवत्सर उपयोगी , प्रभावी एवं व्यवहारिक है । भारत भूमि देवताओं के द्वारा पूजित है।भारतीय संस्कृति में प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठा कर जीवन जीना सिखाया जाता है। काल को निरंतर और चिरगामी माना जाता है ,यह अनादि है शिव है एवं समस्त ब्रह्मांड का मूल कारण है। ऋषि प्रज्ञा भारतीय वेद , दर्शनशास्त्र की यह पराकाष्ठा सम्पूर्ण अस्तित्व के समग्र चिंतन का परिचायक है।आधुनिक विज्ञान मानता है कि कालयात्रा एक बिंदु से प्रारंभ होती है । बिग- बैंग जब होता है वहाँ से सृष्टि की उत्पत्ति मानी जाती है। अन्य प्राचीन काल गणनाओं में से भारतीय कालयात्रा ही मात्र एक है जो आधुनिक विज्ञान के साथ मेल खाती है क्यों की भारतीय मनीषियों ने काल को खंड में भी बड़ी सुंदरता से समझा है और प्रस्तुत किया है। गणना सूक्षतम माप से लेकर विशाल स्तर तक अलग-अलग संज्ञाओं से की गई है जो ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान स्थिति तक काल यात्रा के रूप में वर्णित हैं।भारत में विविधता में एकता का एक सर्व समावेशी दर्शन मान्य है । संस्कृति सबकी एक चिरंतन खून रगों में हिंदू है , यह गीत हम संघ की शाखाओं में गाते आए हैं । भारत एक बड़ा देश है । भाषा, रहन - सहन , वेशभूषा , खानपान , रंगरूप में भिन्नता होने पर भी पूरे राष्ट्र में सांस्कृतिक एकता ही इस देश की धरोहर है । पूरे भारतवर्ष में विभिन्न नामों से नववर्ष मनाए जातें हैं जिसमें मुख्य हैं वसंतोत्सव, चैत्रमाह प्रतिपदा , बंगाल का नववर्ष है नवरात्र , आंध्र तेलंगाना में इसे कहतें हैं उगादि, तमिल क्षेत्र में इसका नाम है - विशु। महाराष्ट्र में नववर्ष है गुड़िपाड़वा । उत्तरपूर्व के राज्यों में इसे बिहू के नाम से जानते हैं।केरल में पोंगल को नव वर्ष होने का गौरव प्राप्त है। जैन मतावलंबी 13 पंथी श्रमण दीपावली को महावीर स्वामी की अवतरण तिथि एवं नव वर्ष के रूप में आयोजित करतें है। राजस्थान और गुजरात में व्यापारी इसी तिथि से नई बहियाँ बनाते हैं , पंजाबी इसे वैशाखी और सिंधी इसे चेटीचंद से जोड़ते हैं। सौराष्ट्र में इसे तुलसी विवाह कहतें हैं , पारसी इसे नवरोज नाम देते हैं ।आर्यसमाज इसे आर्यवत्सर कहता है।इस प्रकार भारतीय जीवन में यह नववर्ष एक ओर आध्यात्म और दूसरी ओर कृषि उत्पादन से प्रभावित है।लंबे कालखंड के ग़ुलामी में आत्मविस्मृति एवं आत्महीनता से ग्रस्त मैकाले एवं मार्क्स के मानसपुत्रों के प्रभाव से ग्रस्त स्वतंत्र भारत के राजपुत्रों नें पश्चिमी जगत के भौतिक चकाचौंध से अभिभूत होकर ग्रेगेरियन कैलेंडर पर आधारित पहली जनवरी को नववर्ष मनाना स्वीकार कर लिया। 1952 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नें प्रोफेसर मेघानाद साहा की अध्यक्षता में पंचांग सुधार समिति बनाई थी । इसी समिती के सुझाव पर ग्रेगेरियन कैलेंडर का पिछलग्गू शक संवत् बना जिसे राष्ट्रीय पंचांग कहा गया । भारत सरकार ने स्वयं को भारतीय संस्कृति का पुजारी दर्शाने के लिए 22 मार्च 1957 को पंचांग भी लागू कर दिया।

              युग - युग से भारतीयों का यह मत रहा है कि मानव जीवन महाकाल की अखंड उपासना है।ब्रह्मांड चिंतन करते हुए खगोल तथा भूगोल की दशा और दिशा का विचार करके सूर्य चंद्र तथा नक्षत्र अंतरिक्ष का पूर्वाभास करके फलित गणित के आधार पर जो समयसारणी तैयार की गई उसे पंचांग कहा जाता है । उसके सहारे ग्रहगोचर स्थिति के शुभाशुभ योग की गणना की जाती है।इसकी परंपरा वैदिक युग से प्राप्त होती है किंतु इसे व्यवस्थित रूप दिया महाराज विक्रमादित्य ने । इस लिए भारतीय लोकजीवन में नववर्ष को विक्रम संवत्सर कहा जाता है । भारतीयों का यह नववर्ष प्रारंभ होता है चैत्र प्रतिपदा से । इसे संस्कृति का स्वर्णिम प्रभात कहा जाता है । भगवान भुवन भास्कर अपनी सिंदूरी किरणों के साथ जब उदयाचल से अवतरित होते हैं तब हम उसे भक्तिभाव पूरित प्रणामांजलि अर्पित करते हैं और फिर प्रारंभ होती है नववर्ष की मंगलबेला । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सामाजिक महत्व के जिन छ उत्सवों को वर्ष भर में मनाता है उनमे यह वर्ष प्रतिपदा के नाम से प्रसिद्ध है ।ब्रह्म पुराण के अनुसार ब्रह्माजी ने चैत्र मास शुक्लपक्ष के प्रथम दिन सूर्योदय होने पर जगत सृष्टि की । इसी कारण उसी दिन से नए संवत्सर का प्रारंभ माना जाता है ।राष्ट्र के स्वाभिमान व देश प्रेम को जगाने वाले अनेक प्रसंग चैत्रमास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से जुड़े हुए हैं ।

ऐतिहासिक महत्व :

1- शृष्टि रचना का प्रथम दिन : आज से एक अरब 95 करोड़ 58 लाख 85 हज़ार 128 वर्ष पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्मा जी ने जगत की रचना की थी।

2- प्रभु राम का राज्याभिषेक दिवस: प्रभु राम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अयोध्या आने पर अपने राज्याभिषेक के लिए चुना।

3-नवरात्र स्थापना: शक्ति आराधना और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नौरात्रि प्रारम्भ, कलश स्थापना , पूजन और ध्वजारोहण का दिन।यह शुभ दिन इस वर्ष 19 मार्च 2026 को पड़ेगा।

4- गुरु अंगददेव जी का प्रकटोत्सव: सिक्ख परंपरा के द्वितीय गुरु का जन्मदिन ।

5- आर्यसमाज स्थापना दिवस :समाज को श्रेष्ठ ( आर्य )मार्ग पर प ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन को आर्यसमाज स्थापना दिवस के रूप में चुना।

6-संत झूले लाल जन्म दिवस: सिंध समाज के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरुणावतार संत झूलेलाल का जन्मदिवस ।

7- डा . केशवराव बलिराम हेडगेवार जन्म दिवस : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक एवं संगठन के आद्य सरसंघचालक डा हेडगेवार का जन्म दिवस।

8- शालिवाहन संवत्सर का प्रारम्भ दिवस : विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना।

9- युगाब्द संवत्सर का प्रथमदिन महाराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक इसी दिन हुआ था ।

10- महाराज विक्रमादित्य द्वारा शकों पर प्राप्त विजय दिवस के उपलक्ष्य में विक्रमी संवत् का प्रारंभ दिवस ।विक्रमी संवत् 2083 का प्रारम्भ इस वर्ष इसी दिन से होगा।

11- युगाब्द संवत्सर 5125 का प्रथम दिन इस वर्ष मनाया जाएगा ।

12- महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन महीना और वर्ष की गणना करते हुए पंचांग की रचना की थी ।

13- इसी तिथि को रेवती नक्षत्र , विष्कुंभ योग में दिन के समय भगवान के प्रथम अवतार मत्स्यरूप का प्रादुर्भाव माना जाता है।

प्राकृतिक महत्व :

              पतझड़ की समाप्ति और वसंत का प्रारम्भ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है। शरद ऋतु के पश्चात व ग्रीष्म के आगमन के पूर्व वसंत अपने चरम पर होता है । सभी पौधों, पेड़ आदि पर नए किसलय निकलतें है। आम के बृक्षों में बौर लगतीं हैं जिसकी मनमोहक सुगन्ध चहुँओर छा जाती है। कोयल की कूंक गुंजायमान होती रहती है। खेतों में फसल उम्मत और परिपक्व अवस्था में पहुँच जाती है।

आध्यात्मिक महत्व:

               वर्ष प्रतिपदा से ही नौरात्री अर्थात् नौ दिन तक शुद्ध सात्विक जीवन जी कर शक्ति की आराधना , दिन-दुखियों की सेवा, सहायता हेतु समाज प्रेरित होता है। सभी मांगलिक कार्य इन नौ दिनों में निर्विघ्न माने जाते हैं। नवें दिन नौ कन्याओं व एक लंगूर ( किशोर) का पूजन कर आदरपूर्वक स्वादिष्ट भोजन करा कर दक्षिणा से उन्हें प्रफुल्लित किया जाता है।

वैज्ञानिक महत्व :

             सौरमंडल के ग्रहों, नक्षत्रों की चाल और निरन्तर उनकी बदलती स्थिति पर ही हमारे दिन , महीने , वर्ष और उनके सूक्ष्मतम भाग आधारित होते हैं।पूरे भूचक्र अर्थात 360 डिग्री को बारह बराबर भागों में बांटा गया है जिसे राशि कहा जाता है। प्रत्येक नक्षत्रों को पुनः चार भागों में बांटा गया है जिसका एक चरण तीन डिग्री बीस मिनट का होता है । जन्म के समय जो राशि पूर्व दिशा में होती है उसे लग्न कहा जाता है।इसी वैज्ञानिक और गणितीय आधार पर विश्व की प्राचीनतम कालगणना की स्थापना हुई।

कैसे मनाये नया वर्ष :

                नव वर्ष की पूर्व संध्या पर दीपदान करें। घरों में सायंकाल सात बजे शंख, घंटा घड़ियाल बजा कर सपरिवार मंगलध्वनि करके नव वर्ष का स्वागत करें। भवनों, व्यवसायिक स्थानों पर भगवा ध्वज गहरायें। द्वार पर शुभकामना तोरण बाँधे। शोसल मीडिया पर , छपे कार्ड द्वारा, यथाशक्ति होर्डिंग, बैनर , बधाई पत्रों, ईमेल, संदेश तथा एस एम एस द्वारा शुभकामना संदेश प्रेषित करे । प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व मंगलाचरण कर सूर्यदेव को प्रणाम करें। प्रभातफेरियां निकाले, हवन करें तथा जीवन के लिए हितकारी एक संकल्प लें। कालोनियों , अपार्टमेंट्स में परिचितों, अपरिचितों सभी से मुलाकात कर बधाई दें मिष्ठान बांटे तथा खुश रहे। वर्ष का प्रारम्भ आनंदित हो कर करें। किसी मंदिर , उपासनास्थल में पूजा करें। मन में स्व जागरण की अनुभूति करें ।आप सभी को नव वर्ष की शुभकानाएँ ।

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Friday, 16 January 2026

राष्ट्र आराधना की प्रेरणा देते संघ गीत

राष्ट्र आराधना की प्रेरणा देते संघ गीत 

             *अशोक कुमार सिन्हा 

          राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदू समाज को संगठित कर उसे शक्तिशाली ,सामर्थ्य संपन्न बनाना चाहता है ।संघ का कार्य एक सार्वजनिक कार्य है।संघकार्य की चेतनाशक्ति कार्यकर्ता स्वयंसेवक हैं ।प्रतिदिन लगने वाली शाखा उसकी कार्यपद्धति है जिसकी पाँच विशेषताएँ है । पहली दैनिक, दूसरी एक घंटे का कार्यक्रम,तीसरी सर्व दूर , चौथी सभी के लिए और पांचवीं सामान्य कार्यक्रम ।प्रयास यह होता है कि जहाँ हिंदू हो वहाँ शाखा लगे ।कहीं पर भी जाइए वहाँ शाखा हो सकती है । कार्यकर्ता इन्ही शाखाओं पर तैयार या उत्पादित होते हैं।संघस्थान की मिट्टी में कार्यकर्ताओं की फसल उगती है।यह कार्यकर्ता समूह में कार्य करने वाला होता है।इस कार्यपद्धति को व्यक्ति निर्माण की संज्ञा मिली है।60 मिनट की सुनियोजित शाखा में शक्ति की उपासना ,अनुशासन,विजिगीषु वृत्ति और देशभक्ति की भावना स्वयंसेवक में विकसित होती है । वह एक सज्जन शक्ति का समुच्चय बन कर उभरता है।शाखा में योग, सूर्यनमस्कार,दौड़, दंड प्रहार,प्राथमिक समता, खेलकूद,देशभक्ति के गीत , अमृत वचनों के साथ मातृभूमि की प्रार्थना की जाती है।संघ के गीत राष्ट्र आराधना की प्रेरणा देतें है।ये गीत संदेशयुक्त प्रेरणादायी और हृदयग्राही होतें है। शब्द इतने सरल, स्पष्ट,मन को छूनेवाले होते हैं तथा सामूहिक गायन के रूप में गाते- गाते हृदय में भावना भर कर कभी-कभी आँसू भी छलका देते हैं ।इसकी एक ही धुन होती है जो जय-जय भारत के अर्थ समेटे होती है।समूहगान होने से हर कार्यकर्ता इसको निःसंकोच भाव से स्वतः गाना, गुनगुनाना सीख जाता है । उच्यस्वर में वह बेझिझक होकर गाने लगता है। धीरे -धीरे वह सबके सामने खड़े होकर सबके सामने गाता और गाते हुए दूसरों को अनुसरण कराना सीख जाता है ।यह गीत कौन लिखता है , कब लिखता है,कहाँ लिखता है , यह पता ही नहीं चलता है क्यों की रचनाकार स्वयंसेवक व प्रचारकों में से ही होते है परंतु वे कभी भी अपना नाम उजागर नहीं करते या कहिये की वे श्रेय नहीं लेना चाहते हैं।इन गीतों में देशप्रेम की अभिव्यक्ति, मातृभूमि से गहरा प्रेम , सम्मान ,समर्पण ,त्याग और बलिदान की भावना भरी होती है। इन गीतों को गणगीत कहा जाता है।कुछ स्वयंसेवक जिनका स्वर बहुत अच्छा होता है वे अभ्यास कर के संघ उत्सवों या विशेष अवसरों पर मुख्य वक्ता के भाषणों,जिन्हें संघ में बौद्धिक कहा जाता है , के ठीक पहले भाव उत्पन्न करने, श्रोताओं को एकाग्र करने तथा वक्ता कें लिए मार्गदर्शक विंदु या प्रस्तावना के रूप में एकल गीत के रूप में भी गाये जातें हैं। यह गीत कोरस नहीं होता।इस गीत को एक स्वयंसेवक ही पूर्ण आत्मविश्वास के साथ व्यवस्थित अभ्यास के बाद बिना किसी पार्श्व संगीत के गाता है।उल्लेखनीय है कि संघ के किसी गीत में किसी भी प्रकार के वाद्यसंगीत के उपकरणों का प्रयोग नहीं किया जाता है ।सभी गीत सुर, ताल, लय, छंद एवं संगीत के शास्त्रीय पद्धतियों से युक्त होते हैं। संघ गीत भारतवर्ष में बोली जाने वाली सभी भाषाओं में लिखे और गाए जातें हैं और देश - विदेश की सभी शाखाओं पर सब भारतीय भाषाओं के गीत गाये और दुहराए जातें है।संस्कृत और हिंदी के गीत अधिकांश संख्या में सभी भाषा- भाषी प्रदेशों के स्वयंसेवक निश्छल भाव से गाते मिल जाएँगे। स्वयंसेवकों के अंदर स्वाभाव से ही भाषा, प्रांत, जाति, क्षेत्रीयता का भेद संस्कारवश नहीं पनपने पाता तथा वे अपने अंदर सभी भाषाओं के प्रति आदर और प्रेम की भावना स्वभाववश रखने

 लगतें हैं।  

       सामान्यतः संघ गीतों को मातृ-वंदना , राष्ट्र-अर्चना , केशव माधव वंदन, पथ संचलन गीत, सहगान, एकल गान, जनजागरण का शंखनाद करते गीत,संघ उत्सवों के भाव अनुरूप गीत तथा प्रासंगिक एवं विविध गीतों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।संघ गीत जहाँ राष्ट्रीय एकता और अखंडता का संदेश देते हैं वहीं यह जाति, धर्म भाषा के उपर राष्ट्रीय एकता को महत्व देतें हैं।उत्साह और प्रेरणा के साथ-साथ जनमानस में साहस, जोश,कर्तव्यबोध, गौरवशाली इतिहास, भारतीय संस्कृति , स्वर्णिम अतीत,संघर्ष और हिंदू उपलब्धियों का चित्रण भी करते हैं।संघ गीतों की सरल प्रभावशाली भाषा ओजपूर्ण राष्ट्रीयता का संदेश देने वाली होती है।यह स्वयंसेवकों और सामान्य जनमानस में नैतिक मूल्यों का संचार करने के साथ- साथ उनमें सत्य, साहस,कर्तव्य, अनुशासन, सेवा , राष्ट्रीय भावना, जिम्मेदारी की भावना जैसे आदर्शों को मजबूत बनाने में सहायक सिद्ध हुई हैं ।संघ के सौ वर्षों की यात्रा में इन गीतों ने पाथेय बनने के साथ साथ राष्ट्र जागरण का अनुपम कार्य किया है।

           पूरे विश्व में संघ की शाखाओं पर प्रतिदिन परमपवित्र तत्वज्ञान केरूप में गुरु स्थान पर विराजित भगवा ध्वज के समक्ष आज जो प्रार्थना संस्कृत भाषा में गायी जाती है वह 1925 में पहले मराठी और हिंदी में गायी जाती थी । वह प्रार्थना संघ स्थापना के 14 वर्ष बाद फ़रवरी 1939 में नागपुर के सिंदरी बैठक में डा. बाबा साहेब आप्टे,बालासाहेब देवरस,अप्पाजी जोशी तथा नानासाहेब टालातुले की उपस्थिति में नरहरि नारायण भिड़े द्वारा संस्कृत भाषा में रूपांतरित किया गया जो 23 अप्रैल 1940 में पुणे के संघ शिक्षा वर्ग में यादवराव जोशी द्वारा गाया गया । इसमें कुल तीन श्लोक में तेरह पंक्तियां हैं जिसकी अंतिम पंक्ति हिंदी भाषा में भारत माता की जय से पूर्ण होता है।इसका प्रथम श्लोक भुजंग प्रयात छंद में रचित है जिसमें मातृवंदना की गई है।द्वितीय एवं तृतीय श्लोक मेघ निर्घोष छंद में रचित है।द्वितीय श्लोक में ईश्वर से अजेय शक्ति , सुशीलता, ज्ञान , वीरव्रत और अक्षय धियानिष्ठा जैसे पाँच गुणों की माँग की गई है।तृतीय श्लोक में ध्येय की पूर्ति का मार्ग प्रशस्त करने की प्रार्थना की गई है।इस प्रार्थना को अभी हाल में ही स्वप्रेरणा से सुमधुर संगीत में पिरो कर वाद्य यंत्रों की ध्वनि के साथ प्रसिद्ध फिल्मी जगत के संगीतकार एवं गायक शंकर महादेवन नें बड़ी सावधानी के साथ उसी स्वर में गाने का प्रयास किया है जैसी प्रार्थना सस्वर स्वयंसेवक संघस्थान पर गाते है। सोशल मीडिया पर यह प्रार्थना गीत बहुत प्रसारित भी हुया है ।कुछ संघ गीतों का सहजरूप में टीवी चैनलों के लिए बनाई गई फ़िल्मों में भी प्रयोग सामयिक संदर्भों के उपयोगिता की दृष्टि से किया गया है जो संघ गीतों के महत्व का प्रतीक है जैसे उदाहरण स्वरूप प्रसिद्ध टीवी सीरियल “चाणक्य “में एक पुराने संघ गीत “ हम करे राष्ट्र आराधन , तन से मन से धन से ,तन मन धन जीवन से “ को तक्षशिला के छात्रों द्वारा भगवा ध्वज हाँथ में लहरा कर 

गाते हुए दर्शाया गया है ।कदाचित जब इस सीरियल का प्रोमो दूरदर्शन को सीरियल के निर्देशक चंद्र प्रकाश द्विवेदी द्वारा आगे के एपिसोड फिल्माने की स्वीकृति के लिए जमा किया गया तब उस समय के तत्कालीन नरसिंहाराव सरकार के अधीन दूरदर्शन नें बिना कारण बताए बहुत दिनों तक स्वीकृति से रोक दिया था। विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने तब नरसिंहाराव जी से व्यक्तिगत रूप से मिलकर फ़िल्म प्रोमो को देखने और राष्ट्रीय और सांस्कृतिक महत्व के होने के कारण स्वीकृति देने की तथा अस्वीकृति की दशा में राष्ट्रव्यापी आंदोलन करने की बात कही थी ।अनुरोध को स्वीकार कर नरसिंहाराव जी ने दूरदर्शन से मंगा कर प्रोमो को देखा तथा कोई आपत्तिजनक विषयवस्तु को न पाकर आगे की फिल्मांकन की अनुमति प्रदान कराई।बाद में जब पूरी फ़िल्म बन कर प्रदर्शित हुई तो रामायण महाभारत सीरियल के बाद सबसे लोकप्रिय सीरियल सिद्ध हुई और संदर्भित संघ गीत भी दर्शकों में बहुत लोकप्रिय हुई।

              संघ शाखाओं पर गाये जाने वाले अनेक गीत हैं जो राष्ट्र के लिए जीने की प्रेरणा देतें हैं यथा “ धर्म के लिए जियें समाज के लिए जियें । ये धड़कने ये श्वास हो पुण्यभूमि के लिए। कर्म भूमि के लिए ।। इसी प्रकार का दूसरा गीत है -“ आर्य भूमि में गूंज उठा फिर जन -जन का आह्वान । भरत भूमि के साथ विश्व का करना है कल्याण। जागे वीर जवान- जागे वीर जवान ।।” एक अन्य गीत है -एक संस्कृति एक धर्म है, एक हमारा नारा। एक भारती की संतति हम , भारत एक हमारा ।। इसी प्रकार यह गीत भी बहुत लोकप्रिय था “ नमन है इस मातृभू को , विश्व का सिरमौर भारत। तप तपस्या साधना का, शौर्य का परिणाम भारत ।। “ जीवन पुष्प चढ़ायेंगे, माँ की ज्योति जगायेंगे।माँ की रक्षा हित हम शत-शत, हिंदू बलि हो जाएँगे।।

    सामाजिक समरसता को प्रेरित करता यह गीत बहुत प्रसिद्ध है- पथ का अंतिम लक्ष्य नहीं सिंहासन चढ़ते जाना , सब समाज को लिए साथ में , आगे है बढ़ते जाना।। इसी प्रकार का एक गीत है-“ हिन्दु जगे तो विश्व जगेगा, मानव का विश्वास जागेगा। भेद भावना तमस हटेगा, समरसता अमृत बरसेगा।।संस्कृत भाषा में एक गीत सबको स्मरण होगा “ मनसा सततम स्मरणीयम, बचसा सततम वदनीयम ।लोकहितम मम करणीयम ।।एक गीत जो बचपन में शरीर में रक्तसंचार को बढ़ा देता था - रक्त शिराओं में राणा का , रह - रह आज हिलोरे लेता । मातृभूमि का कण-कण तृण- तृण हमको आज निमंत्रण देता ।। दूसरा गीत है- यह हिमालय सा उठा , मस्तक न झुकने पाएगा।रोक दूँगा मैं प्रभंजन, जो प्रलय के गीत गाता।।” पंजाबी भाषा का एक गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था -पिता वारया ते लाल चारे वारे, ओ हिन्दु तेरी शान बदले।जन्म गुरांदा पटने साहिबदा, आनंदपुर डेरा लाया, ओ हिंदु तेरी शान बदले ।।

      संघ गीत की अनेकों शृंखलाएँ है जिनको सुनते गाते हम संस्कारित हुए है। भावी पीढ़ी नए तकनीकी से दृश्य श्रव्य माध्यम से इन गीतों को देखेगी, सुनेगी और प्रेरणा लेगी ।

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