Thursday, 21 May 2026

आत्मबोध जगाता वि.हिन्दू परिषद का कार्यकर्ता विकास वर्ग 

लेखक:- अशोक सिन्हा , उपाध्यक्ष , विश्व संवाद केंद्र, अवध , लखनऊ।

             विश्व हिंदू परिषद को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समवैचारिक संगठन के परिप्रेक्ष्य में देखना अनुचित नहीं होगा क्योंकि इसे संघ के स्वयंसेवकों ने साधु संतों तथा समाज के सहयोग से सांस्कृतिक और धार्मिक स्तर पर उस अवश्यकता के प्रत्युत्तर में स्थापित किया था जिसमें हिंदू समाज की सांस्कृतिक पहचान,, परंपराओं , धार्मिक संस्थानों के संरक्षण तथा वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक संवाद की आवश्यकता स्थापित करना था। संगठन का उद्देश्य समाज को सांस्कृतिक आधार पर संगठित करना , समरसता को बढ़ावा देना - कार्यों का विस्तार करना और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को सुदृढ़ करना है। समाज में सांस्कृतिक जागरूकता, धार्मिक सहिष्णुता , परम्पराओं के प्रति सम्मान और सामूहिक पहचान की भावना का विस्तार सहित सामाजिक एकता और आत्मबोध को इस संगठन की स्थापना से बल मिला है ।

                   विश्व हिंदू परिषद की स्थापना श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन वर्ष 1964 में मुंबई के पवई स्थित स्वामी श्री चिन्म्यमनंद के संदीपनी आश्रम में हुई । स्वयं सरसंघचालक माधवराव सदाशिव गोलवरकर के पहल पर और उनकी देखरेख में इस संगठन की नींव पड़ी । विश्व कल्याण की कामना से विश्व के हिंदुओं का सशक्त और अजेय संगठन खड़ा करना , हिंदू दर्शन , आस्थाओं,जीवन मूल्यों, परंपराओं, धर्म की रक्षा करने के साथ-साथ विश्वभर में फैले हिंदुओं से समन्वय स्थापित करना संगठन का प्रमुख कार्य है। संगठनात्मक तंत्र में सम्पूर्ण भारत को तेरह क्षेत्रों,47 प्रांतों,353 विभागों, 1125 जिलों, 10,330 प्रखंडों, 21,205 खंडों और 46,588 ग्राम व बस्तियों में बाटा गया है। विदेश के राष्ट्रों में चैप्टर स्थापित हैं। भारत में प्रन्यासी मंडल में 143 और विदेशों में 73 सदस्य कार्यरत हैं। इसके केंद्रीय स्थायी समिति के सदस्यों की संख्या 16 और कार्यकारिणी में 76 सदस्य हैं । अपनी स्थापना के बाद इसकी प्रथम विश्व हिंदू सम्मेलन प्रयाग कुंभ में जनवरी 1966 में संपन्न हुई जिसमें मैसूर महाराज चमराज वाडियार अध्यक्ष और दादासाहेब आप्टे जी को महामंत्री घोषित किया गया । परावर्तन (घरवापसी) को एक मुख्य कार्यक्रम घोषित किया गया। संगठन का बोधवाक्य “ धर्मो रक्षति रक्षितः “ और बोध चिन्ह “ अक्षय वटवृक्ष “ निर्धारित किया गया । द्वितीय विश्व हिंदू सम्मेलन जनवरी 1979 में पुनः प्रयाग कुंभ में हुआ जिसमें अट्ठारह राष्ट्रों के साठ हज़ार हिंदुओं सहित देश के समस्त शंकराचार्य, स्वामी, दलाई लामा, नागारानी गाईडील्यू की सहभागिता रही । प्रकृति पूजक बनवासी समुदाय हिंदू समाज का ही अभिन्न अंग है , इसकी घोषणा हुई।दिसम्बर 1969 में कर्नाटक के उडुपी धर्म संसद में हिंदुओं में छुआछूत को शास्त्र- बाह्य घोषित करते हुए उद्घोष किया गया कि “ हिंदव: सोदरा सर्वे, ना हिंदू पतितो भवेत “। इस घोषणा को व्यवहारिक रूप देने के लिए 1994 के धर्म संसद में काशी के डोमराजा को अनेक संतों द्वारा निमंत्रण दे कर उनके घर खिचड़ी को प्रसाद रूप में ग्रहण कर अगले दिन धर्मसंसद में मंच पर साधुसंतों के मध्य बैठा कर स्वागत किया गया। 

     विश्व हिंदू परिषद के महिलाओं के मध्य एक आयाम के रूप में दुर्गा वाहिनी और पुरुषों के मध्य बजरंग दल का गठन करना दूरगामी सोच का परिणाम था। 1982 में एकात्मकता यात्रा का आयोजन हुआ जिसमें छ करोड़ हिंदुओं में सहभाग किया। वर्तमान में परिषद के विभिन्न आयामों द्वारा 7152 सेवाकार्य शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक और स्वावलंबन के क्षेत्रों में संचालित हो रहें हैं। गोरक्षा एवं गोसंवर्धन के अंतर्गत नस्लसुधार , पंचगव्य अनुसंधान केंद्र , औषधि निर्माण केंद्र आदि संचालित हो रहे हैं। बजरंग दलों और गौरक्षकों द्वारा पच्चीस लाख गायों को कसाइयों के हाथों से मुक्त कराया गया। चालीस लाख हिंदुओं का मत परिवर्तन रोकने के साथ नौ लाख हिंदुओं की घर वापसी करायी गई है। श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन का एक नियोजित संघर्ष शिलापूजन , कारसेवा, न्यायालय में वाद का क्रमबद्ध कार्यक्रम विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल दुर्गा वाहिनी सहित समस्त राष्ट्रवादी संगठनों ने चलाया । 2024 का अक्षत आंदोलन और 2026 में मंदिर की सम्पूर्णता कार्यक्रम सबसे प्रभावी कार्यक्रम रहे । इसके अतिरिक्त श्री राम सेतु रक्षा , जम्मू एवं काश्मीर की अमरनाथ यात्रा कार्यक्रम में बजरंगदल जैसे संगठनों ने अतुलनीय योगदान किया । ग्यारह राज्यों में धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम पास कराना और समरसता कार्यक्रमों के माध्यम से परिषद ने जो कार्यकर्ताओं की फ़ौज खड़ी की यह आज के युवाओं के प्रेरणास्रोत बने।

             दुर्गा वाहिनियाँ और बजरंग दल सहित विश्व हिंदू परिषद के देव- देवियों ने जो राष्ट्र को योगदान दिया और बड़े बड़े कार्य संपादित किए इसके पीछे उनका समर्पण, अनुशासन, निष्ठा, राष्ट्रभक्ति और देशसेवा की भावना जगी एक अनूठे संगठन क्षमता और गहन प्रशिक्षण से जो प्रतिवर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक के आयोजित होने वाले संघ शिक्षा वर्ग के समतुल्य प्रशिक्षण कैंपों से जिसे परिषद प्रतिवर्ष देश विदेशों में प्रतिवर्ष आयोजित करता है।दुर्गावाहिनी , विश्व हिंदू परिषद तथा बजरंगदल के प्रशिक्षण शिविर वर्ष में एक बार अक्सर मई या जून के महीनों में आयोजित होते हैं क्यों की इस समय स्कूल कॉलेजों में अवकाश रहता है जिससे स्कूल प्रबंधन से बात कर वहाँ भवन और मैदान प्राप्त किया जा सकता है। छात्रों की गर्मियों की छुट्टी रहती है अतः उनको भी भाग लेने में आसानी होती है। यह शिविर बीस दिनों या उससे भी अधिक दिनों के आयोजित होते हैं। कार्यकर्ताओं और प्रशिक्षणार्थिओं को इतने दिनों तक घर जाने की अनुमति नहीं होती है। वे पूरे चौबीस घंटे का प्रशिक्षण कार्यक्रम बना कर वहीं अपना बिस्तर , खाने के बर्तन व आवश्यक कपड़े लेकर पूर्ण समर्पित भाव से वहाँ जातें है। मोबाइल प्रयोग की वहाँ अत्यंत न्यूनतम समय के लिए अनुमति रहती है। पूरे भवन और प्रशिक्षार्थियों की सुरक्षा व्यवस्था कार्यकर्ता स्वयं शिफ्टवार ड्यूटी लगा कर करतें हैं। वहाँ अस्थाई रूप से कार्यालय, भोजनालय, अतिथि कक्ष, स्टोर, चिकित्सालय, बौद्धिक कक्ष, प्रेस रूम, स्वागती कक्ष , योग , खेल , व्यायाम के लिए मैदान आदि की व्यवस्था प्रशिक्षण के पूर्व ही व्यवस्थित कर ली जाती है। समुचित शौचालयों, स्नानघर की व्यवस्था भी बनाई जाती है। व्यवस्था पर आने वाले व्यय को स्वयं कुछ सीमा तक प्रशिक्षणार्थी वहन करते है तथा कम पड़ने पर समाज , मंदिरों या धार्मिक संस्थाओं से चंदा माँग कर पूरा किया जाता है। भोजन व्यवस्था, रक्षा व्यवस्था, मीडिया प्रबंधन, बौद्धिक विभाग, परिवहन एवं पार्किंग विभाग, व्यवस्था विभाग,स्वक्षता विभाग, अतिथि विभाग, शारीरिक शिक्षण विभाग , प्रशिक्षक व्यवस्था और शिविराधिकारी की पूर्ण व्यवस्था शिविर प्रारम्भ होने के एक महीने या और अधिक पहले से ही विधिवत बना ली जाती है तथा तैयारियों का समय- समय पर बैठकें कर के व्यवस्था सुनिश्चित की जाती है।

                   अपने संगठनों की क्या आवश्यकता है। लक्ष्य प्राप्त करने के लिए क्या शारीरिक, बौद्धिक , आर्थिक , रणनीतिक आवश्यकता होगी इसका आंकलन करके ही संपूर्ण व्यवस्था तैयार की जाती है। प्रशिक्षण पाठ्यक्रम और विषयवस्तु क्या होगी इसकी तैयारी बहुत समय पहले से ही की जा चुकी होती है। प्रातः चार बजे से रात्रि शयन तक का पूर्ण कार्यक्रम पोस्टर बना कर नोटिसबोर्ड पर लगा दिया जाता है और सभी को सामूहिक एकत्रीकरण के समय घोषित कर के समझा दिया जाता है। सबके वस्त्रों और उनके रंगों के बारे में पहले से ही सूचना रहती है। प्रातःकाल उठते ही नित्यक्रिया से निपटने के बाद एक बड़े हाल में एकत्र हो कर प्रार्थना, प्रातः स्मरण पाठ का वाचन आदि करने के बाद सभी मैदान में पहुँच जाते हैं जहाँ शारीरिक गतिविधियों, खेलकूद , नियुद्ध, दंड प्रहार आदि के कार्यक्रम होते है । सम्पूर्ण उपस्थित संख्या को आयु, क्षमता के अनुसार गटों में विभाजित कर के खेल- कूद , व्यायाम कराए जातें है। प्रातः आठ बजे तक एक से डेढ़ घंटे का अवकाश जलपान के लिए दिया जाता है। पुनः दस बजे से भोजन अवकाश के मध्य तक विभिन्न आवश्यक विषयों पर बौद्धिक ( लेक्चर ) का आयोजन होता है। प्रबोधन से कुशल व्यवस्था संपादन का लक्ष्य लेकर यह कालांश पूर्ण किया जाता है। तत्पश्चात सामूहिक भोजन और विश्राम का समय होता है । सायंकाल का समय खेल कूद , विभिन्न शारीरिक और सैन्य रणनीति के अनुसार कार्य करने का होता है । संध्या वंदन वि लघु अवकाश के बाद रात्रि में सामूहिक भोजन तत्पश्चात सामूहिक सभा में चर्चा , बौद्धिक, प्रश्नोत्तर , तथा रात्रि दस बजे सिटी बजने पर रात्रि विश्राम हेतु निर्धारित स्थान पर जाना।

             दुर्गा वाहिनी और बजरंगदल के शिविर अलग- अलग होते है । दुर्गा वाहिनी के शिविर में आत्मरक्षा हेतु नियुद्ध, दंड प्रहार, और अस्त्र- शस्त्रों का विशेष प्रक्षिक्षण दिया जाता है। ऐसे विकास वर्ग में समाज को ध्येय के साथ जोड़ना, अनुशासन का कठोर अभ्यास करना, सबको साथ लेकर काम करना , अहंकार विहीन आत्मविश्वास उत्पन्न करना, सहकारियों से परामर्श करते हुए लक्ष्य पूरा करना , सहकारियों को अवसर एवं प्रोत्साहन देना , संकट के समय स्वयं आगे रहना , श्रेय सबको बाँटना, स्वयं पीछे रहना, आपदा प्रबंधन, समाज सुरक्षा , धर्म रक्षा हेतु कटिबद्ध रहना और अपने जैसा कुशल कार्यकर्ता निर्माण करना आदि गुण विकसित होते हैं।


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