Tuesday, 28 February 2023

उत्तरप्रदेश की पत्रकारिता

 

   
                                                         उत्तर प्रदेश की पत्रकारिता

                                    *अशोक कुमार सिन्हा

  उत्तर प्रदेश में पत्रकारिता का सम्बन्ध इसाई मिशनरी विरोध और आजादी के आन्दोलन से रहा है |यहाँ पत्रकार एवं पत्रकारिता दोनों अपनी मिशनरी कार्य शैली के कारण अपनी अलग पहचान बनाने में अग्रणी रहें है | हिंदी का पहला अख़बार 1826 में उदन्त मार्तंड’’ कलकत्ता से जरूर निकला परन्तु उसके संपादक व् प्रकाशक उत्तर प्रदेश के कानपुर से गए प.युगुल किशोर सुकुल थे | उत्तर प्रदेश में श्री गोविन्द रघुनाथ थत्ते के संपादकत्व में राजा शिव प्रसाद सितारे हिंद’’ ने जनवरी 1845 में बनारस अखबार’’ का प्रकाशन प्रारंभ किया था जो प्रदेश का पहला अख़बार माना जाता है | बनारस से ही श्री तारा मोहन मिश्र ने 1850 में ‘सुधाकर’ का प्रकाशन किया जिसकी लिपि देवनागरी थी | 1852 में आगरा से मुंशी सदासुख लाल के संपादकत्व में ‘बुद्धि प्रकाश’ का प्रकाशन हुआ | ऐतिहासिक महत्व के ‘कविवचन सुधा’ का प्रकाशन 1868 में भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने वाराणसी से किया जिसने हिंदी पत्रकारिता में एक इतिहास रचा |पहले यह मासिक छपता था जो बाद में पाक्षिक छपने लगा | इसके प्रकाशन से हिंदी पत्रकारिता का नया युग प्रारम्भ हुआ | यह हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में छपता था | यहीं से भारतेन्दु जी ने हरिश्चंद्र मैगज़ीन ,हरिशंद्र चन्द्रिका और बाला बोधिनी नामक पत्रिकाएं भी प्रकाशित की |

             स्वाधीनता आन्दोलन के समय प्रदेश के पत्रकारिता का मूल स्वर राष्ट्रीयता ,राष्ट्र हित और जनजागरण था| सन 1877 में प्रयाग से प.बाल कृष्ण भट्टने ‘हिंदी प्रदीप’ मासिक पत्र का प्रकाशन हिंदी प्रवर्धनी सभा प्रयाग के सहयोग से प्रारंभ किया |इस क्रांतिकारी प्रयास से पत्र को अंग्रेजी शासन का कोपभाजन बनाना पड़ा क्योंकि इसमें राष्ट्रीयता की प्रखरता इतनी तेज थी जो अंग्रेजों को सहन नहीं हो रही थी | प्रदेश के प्रतापगढ़ में एक छोटी सी रियासत थी कालाकांकर ,जहाँ अंग्रेजियत में पले व्  इंग्लैण्ड से पढ़े  राजा थे रामपाल सिंह | इन्होने कालाकांकर से ही रायल शीट के दो पन्नों का दैनिक अखबार ‘हिन्दोस्थान’ का प्रकाशन कराया जिसके सम्पादक थे प.मदन मोहन मालवीय जिनकी मान्यता थी ‘पत्रकारिता एक महान वैज्ञानिक कला है’| मालवीय जी नें 1907 में प्रयाग से ‘अभुदय’ तथा अंग्रेजी भाषा में ‘The Leader’ नामक पत्र भी निकाला | सन 1871 में प. बुद्धि बल्लभ पन्त ने अल्मोड़ा से ‘अल्मोड़ा समाचार’ निकाला जिसे अंग्रेजों ने बंद करा दिया | महर्षि दयानंद से प्रेरणा ले कर मुंशी बख्तावर सिंह ने 1870 में शाहजहाँपुर से ‘आर्य दर्पण’ साप्ताहिक निकाला | ऐतिहासिक महत्त्व की कालजयी साहित्यिक पत्रिका ‘सरस्वती’ सन 1900 में प्रकाशित होनी प्रारंभ हुई |

             राष्ट्रिय स्वाधीनता संग्राम के समय 1920 में काशी के शिवप्रसाद गुप्त ने दैनिक ‘आज’ की नींव रक्खी जिसके प्रथम संपादक श्री प्रकाश जी थे| दुसरे नंबर पर इसके सम्पादक प.बाबूराव विष्णु पराड़कर बने जो मूलतः महाराष्ट्र के थे  परन्तु ‘आज’ को इन्होने नया आयाम,नई गति,निर्भीक राष्ट्रीय विचारधारा व् हिंदी को सुन्दर स्वरुप  प्रदान की  | इनपर अंग्रेजों ने राजद्रोह का अभियोग भी लगाया | क्रांतिकारी पत्रकारिता के क्रम में पराड़करजी के सहयोग से 1929-30 में श्री सीताराम के संपादकत्व में  गुप्तरूप से ‘रणभेरी’का प्रकाशन किया गया जिसके पीछे पूरी अंग्रेज पुलिस और सी.आई.डी. लगी रही परन्तु उसे पकड़ नहीं सकी |कालांतर में दैनिक आज का अंग्रेजी संस्करण Today भी प्रकाशित हुआ तथा ‘अवकाश’ पत्रिका का भी प्रकाशन हुआ परन्तु यह बाद में बंद हो गया|

                      काशी में सन 1930-1942 के मध्य और आज़ादी के बाद 1975-77 में भूमिगत हो कर साइक्लोस्टाईल या हस्तलिखित भूमिगत पत्रों का प्रकाशन आन्दोलन को गति प्रदान करने के लिए बड़े पैमाने पर किया गया| रणभेरी,शंखनाद ,खबर आदि नामों से प्रकाशित इन पत्रों में संपादक व् प्रकाशक के नाम प्रायः शहर कोतवाल और कलेक्टर मुद्रित रहते थे| ये पत्र विभिन्न स्थानों से और स्थान बदल कर निकाले  जाते थे | स्वतंत्रता आन्दोलन के समय रणभेरी नामक गुप्त पत्र का प्रकाशन  शहर कोतवाली के एक सिपाही के कमरे से साइक्लोस्टाईल मशीन लगा कर किया जा रहा था और रात के अँधेरे में ही ४ बजे भोर में उसे घरों के दरवाजे के नीचे से चुपके-चुपके सरका दिया जाता था ,जब कि शहर की पूरी सी.आई.डी. और पुलिस उसे शहरभर ढूढती रहती थी| इन पत्रों के माध्यम से सरकारी दमन का विरोध खुल कर किया जाता था |इन पत्रों से सम्बंधित मुख्य रूप से आचार्य नरेंद्र देव व् विष्णु राव पराड़कर की गिरफ्तारी की गिरफ्तारी कभी नहीं हो पायी | भूमिगत प्रेस ने देश की स्वतंत्रता आन्दोलन की ज्वाला प्रज्वलित करनें में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई |

                      इलाहाबाद में जन्मे परन्तु कानपुर को कर्मस्थली बना कर प्रसिद्ध क्रन्तिकारी श्री गणेश शंकर विद्यार्थी ने ‘प्रताप’ साप्ताहिक निकाला जो बाद में दैनिक हो गया |विद्यार्थी जी ने इस पत्र के माध्यम से न केवल क्रांतिकारियों की मदद की वरन पत्रकारिता के उच्य मानदंडों व् आदर्शों को भी स्थापित किया |शहीद भगत सिंह ने भी इस अखबार में गुप्त रह कर 6 महीने तक उप सम्पादक का कार्य किया | बनारस से सन 1932 में ही प्रमुख साहित्यिक पत्र ‘जागरण’ निकला जिसके संस्थापक थे प.विनोद शंकर व्यास और सम्पादक थे आचार्य शिव पूजन सहाय| यह पाक्षिक पत्र जय शंकर प्रसाद के मार्गदर्शन में अपने  साहित्यिक स्वरूप में प्रसिद्ध हुआ | गोरखपुर से 1919 में प.दशरथ द्विवेदी नें ‘स्वदेश’ नामक साप्ताहिक पत्र निकाला जिसके देशभक्ति पूर्ण लेखों के कारण संस्थापक संपादक द्विवेदी जी व् लेख लिखने के कारण ‘उग्र’ जी को जेल जाना पड़ा | पूर्वांचल का यह प्रसिद्ध पत्र विदेशों में भी मंगा कर पढ़ा जाता था|

                 प्रदेश की प्रमुख साहित्यिक साप्ताहिक एवं मासिक पत्रिकाओं में हंस ,सरस्वती, माधुरी,अभुदय,सनातन धर्म,संसार,संगम,देशदूत,समाज,मर्यादा,स्वार्थ,चाँद एवं सुधा आदि मील का पत्थर सिद्ध हुईं |श्री शिव मंगल गांधी ने राष्ट्रिय विचारधारा से ओतप्रोत ‘जीवन’साप्ताहिक निकाला |शिवकुमार शास्त्री ने 1915 में ज्ञान शक्ति व् गया प्रसाद शुक्ल सनेही नें ‘कवी’नामक पात्र निकाला |बागी बलिया से बलिया गज़ट,बिहान,संसार नामक पत्र प्रकाशित हुए | मिर्ज़ापुर के बदरी नारायण चौधरी ‘प्रेमधन’ द्वारा सम्पादित ‘आनंद कादिम्बनी’ व् खिचड़ी समाचार भी अपनी निर्भीक पत्रकारिता के लिए याद किया जाता है | स्वतंत्रता पूर्व इन पत्रों का मूल स्वर राष्ट्रीयता,राष्ट्रहित,स्वतंत्रता और जनजागरण था जो स्वतंत्रता बाद क्षेत्रीय समस्याओं पर केन्द्रित हो गया |

                    इलाहाबाद से ‘भारत’ और ‘अमृत पत्रिका’ नामक दो समाचारपत्र निकले थे ,इसके अतिरिक्त यहाँ से ‘सुकवि’ ‘सुमित्रा’ मासिक व् ‘रामराज्य’ साप्ताहिक तथा वर्तमान और ‘विश्वामित्र’ दैनिक पत्र भी प्रकाशित हुए |

                    लखनऊ से विप्लव ,वासंती ,रसवंती ,बालविनोद,युग चेतना ,पांचजन्य,राष्ट्रधर्म और तरुण भारत का प्रकाशन महत्वपूर्ण है |1947 के बाद यहाँ से नवजीवन,स्वतंत्र भारत, The pioneer,National Herald,The Times Of India,The Hindustan Times, The Indian Express,The Economic Times, नव भारत टाइम्स ,राष्ट्रीय सहारा,हिन्दुस्तान, आज ,राष्ट्रीय स्वरुप,स्वतंत्र चेतना ,कौमी आवाज,कुबेर टाइम्स,अमर उजाला ,अमृत प्रभात,डी. एन. ए.,जन संदेश टाइम्स,उर्दू दैनिक आग ,मरकज़ जदीद,आई नेक्स्ट,उर्दू रोजनामा,न्यू हेरम्ब टाइम्स,और अवधनामा जैसे महत्वपूर्ण अखबारों का प्रकाशन हो रहा है |राजधानी होने के कारण लगभग सभी टी.वी.चैनल और समाचार एजेंसियां यहाँ कार्यरत हैं| राज्य सूचना विभाग द्वारा ‘उत्तर प्रदेश सन्देश’नामक सुन्दर पत्रिका का प्रकाशन होता है | प्रदेश के प्रमुख शहरों जैसे कानपुर ,गोरखपुर,फैजाबाद,वाराणसी,आगरा,मेरठ,और सहारनपुर से कई महत्वपूर्ण  समाचारपत्रों का प्रकाशन हो रहा है| फैजाबाद से जनमोर्चा,मेरठ से रामराज्य,और बटुक,आगरा से उजाला व् सैनिक के प्रकाशन का उल्लेख करना आवश्यक है| गोरखपुर से ‘कल्याण’ और मथुरा से ‘युग निर्माण’ नामक धार्मिक पत्रिकाएं और लखनऊ सहित सभी महत्वपूर्ण सहरों से बड़ी संख्या में अच्छी पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही है |

                  उत्तर प्रदेश के प्रमुख व् विशिष्ट पत्रकारों में प.युगुल किशोर शुकुल,भारतेंदु हरिश्चंद्र ,प.मदन मोहन मालवीय,महावीर प्रसाद द्विवेदी ,गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबू राव विष्णु पराड़कर,श्री प्रकाश, प.कमलापति त्रिपाठी, डा.सम्पूर्णानन्द,मुकुट बिहारी वर्मा,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’,रघुवीर सहाय, शीला झुनझुनवाला ,अक्षय कुमार जैन,अशोक जी ,लक्ष्मी शंकर व्यास,अच्युदानंद मिश्र, नरेन्द्र मोहन ,डा.विद्या निवास मिश्र ,भगवान् दास अरोड़ा,जय प्रकाश भारती, अतुल माहेश्वरी,अशोक अग्रवाल , के.विक्रम राव ,शार्दुल विक्रम गुप्त,भानु प्रताप शुक्ल,वचनेश त्रिपाठी,वीरेश्वर द्विवेदी,राजनाथ सिंह सूर्य,नन्द किशोर श्रीवास्तव,आनंद मिश्र अभय,ओम,बलदेव भाई शर्मा,नरेंद्र भदौरिया, प्रकाश पांडेय आदि के नाम प्रमुख हैं|  

           उत्तर प्रदेश 2,38,566 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला 21 करोड़ से भी अधिक जनसँख्या वाला प्रदेश है | पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य दैनिक जीवन की मुख्य गतिविधियों ,राजनैतिक घटनाओं,सामजिक जीवन के विविध पक्षों को प्रस्तुत करना है साथ ही वह साहित्यिक भाषा और उनकी विधाओं का भी विकास करती है| स्वत्रंयोत्तर भारत में उत्तर प्रदेश की पत्रकारिता का आयाम और उद्देश्य तेजी से बदला है | तकनिकी का तेजी से विकास हुआ है साथ ही बाज़ारवाद के  प्रभाव ने पत्रकारिता का स्वरुप बदला है | इन सब के वावजूद प्रदेश की पत्रकारिता ने बहुत तेजी से विकास किया है और अपने नए आयाम तलाशे हैं |                               

 

  *लेखक उत्तर प्रदेश के वरिष्ट प्रशासनिक अधिकारी पद से सेवानिवृत्त हैं,सम्प्रति लखनऊ जनसंचार एवं पत्रकारिता संस्थान के निदेशक|

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Wednesday, 28 September 2022

भारतीय जानता पार्टी का भारत में विस्तार

 

भारतीय जनता पार्टी का भारत में विस्तार
                                                       *अशोक कुमार सिन्हा
भारत को समृद्धि, एकता, शक्तिशाली, स्वावलम्बी और आदर सहित सम्मान दिला कर सम्पूर्ण विश्व में सर्वोच्च स्थान दिलाने का संकल्प ले कर एक राष्ट्रवादी राजनैतिक संगठन के रूप में इस दल का गठन किया गया था। नये नाम के साथ इसकी स्थापना 8 अप्रैल 1980 को नई दिल्ली के कोटला मैदान में एक विशाल कार्यकर्ता सम्मेलन बुला कर किया गया था, जिसके प्रथम अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी निर्वाचित हुये थे। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दल का भारत के राजनैतिक क्षितिज पर यह पुनर्जन्म था। इसका इतिहास भारतीय जनसंघ (चुनाव चिन्ह-दीपक) से जुड़ा हुआ है। 1947 में भारतीय स्वतन्त्रता के बाद कई ऐतिहासिक घटनायें घटित हुई। महात्मा मोहनदास करमचन्द गान्धी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगा। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कालान्तर में कोई साक्ष्य न मिलने पर  प्रतिबन्ध को निराधार पाकर प्रतिबन्ध हटा लिया था। सरदार पटेल की मृत्यु के बाद कांग्रेस और जवाहर लाल नेहरू का भारत पर अधिनायकत्व स्थापित होने लगा था। भारतीय जनमानस को लगने लगा था कि पण्डित नेहरू अल्पसंख्यक तुष्टिकरण, छद्म समाजवाद, परमिट कोटा राज, राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति लापरवाही, जम्मू एवं कश्मीर विषय पर शेख अब्दुल्ला के साथ खड़े होने की प्रवृत्ति तथा विस्थापितों के प्रति अनदेखी आदि के कारणों से समाज में व्याकुलता बढ़ाने वाले सिद्ध हो रहे हैं। बांग्लादेश और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर भयंकर अत्याचार होने लगे । भारतीय जनमानस ने बंटवारे के समय के भीषण विभीषिका को झेला था। राष्ट्रभक्त जनता के मन में कई प्रश्न उठ रहे थे । पूर्व में भी भारतीय जनता  खिलाफत आन्दोलन, मोपला काण्ड, जिन्ना और मुस्लिमों को विशेष महत्व देते कांग्रेस को देख चुकी थी। भारत के बहुसंख्यक समाज को लगा कि हमारा हित वर्तमान परिस्थितियों में कहां सुरक्षित है? बंगाल के भद्र राजनीतिज्ञ श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1923 से 1946 तक हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके थे। संविधान निर्माण के समय से ही कश्मीर सम्बन्धी अनुच्छेद 370 के वे घोर विरोधी थे। उनका दृष्टिकोण राष्ट्रीय हित और भारत की आवश्यकता में था। उनका नारा था- एक देश- दो विधान- दो प्रधान नहीं चलेंगे। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक माधवराव सदाशिव गोलवलकर से भी मिलकर विचार विमर्श किया और सहयोग मांगा। उस समय डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी कांग्रेस में ही थे परन्तु वे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल, पं. मदनमोहन मालवीय, डॉ. सुभाषचन्द्र बोस जैसे राष्ट्रवादी विचारों से ओत प्रोत थे। उन्होंने कांग्रेस से त्यागपत्र देकर 1951 में भारतीय जनसंघ नामक नये राजनैतिक दल का गठन किया जिसके वे प्रथम अध्यक्ष बने। बाद में इस दल के अध्यक्ष क्रमश: चन्द्रमोली शर्मा, प्रेमचन्द डोगरा, आचार्य डीपी घोष, पीताम्बर दास, ए. रामाराव, डॉ. रघुबीर, बच्छराव व्यास रहे। 1966 में बलराज मधोक और 1947 में दीनदयाल उपाध्याय अध्यक्ष बने। उसके बाद चार वर्षों तक अटल बिहारी वाजपेयी तथा 1977 तक लालकृष्ण आडवाणी अध्यक्ष रहे। भारतीय जनसंघ ने प्रारम्भ से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मित्र भाव रखा तथा संगठन मंत्री के रूप में अधिकाशंत: संघ के प्रशिक्षित, निष्ठावान एवं कर्मठ प्रचारक ही जाते रहे।
भारतीय जनसंघ ने 1953 में जम्मू-कश्मीर पर आन्दोलन चलाया था। पं. दीन दयाल उपाध्याय मुखर्जी के संगठन मंत्री थे वे पर्दे के पीछे से सम्पूर्ण कमान सम्भाले थे। पं. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की योजनाबद्ध हत्या कश्मीर के जेल में हुई थी। 1952 में हुये राष्ट्रीय चुनाव में भारतीय जनसंघ को मात्र 3 सीटें मिली थी। 1977 में इन्द्रागाँन्धी द्वारा देश पर थोपे गये आपातकाल के समाप्ति के पश्चात भारतीय जनसंघ अन्य दलों के साथ जनता पार्टी में विलय हो गया फलत: कांग्रेस चुनाव हार गई। तीन वर्षों तक सरकार चलाने के बाद 1980 में जनता पार्टी विघटित हो गई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दोहरी सदस्यता को आधार बना कर मोरारजी देसाई की सरकार गिरा दी गई थी और भारतीय जनसंघ के पदचिन्हों को पुनर्संयोजित करते हुये महाराष्ट्र के मुम्बई शहर में समुद्र के किनारे छ: अप्रैल 1980 को लाखों जनता के समक्ष नई राजनैतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी के नाम से बनी। इस दल की मुख्य विचारधारा हिन्दू राष्ट्र, प्रखर राष्ट्रवाद, आर्थिक उदारीकरण, अखण्ड मानवतावाद रखा गया। प्रथम अध्यक्ष 1980 में अटल बिहारी वाजपेयी बने जो 1980 से 1986 तक पदासीन रहे। बाद के दिनों में क्रमशः: लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, लालकृष्ण आडवाणी, कुशामऊ ठाकरे, बंगारू लक्ष्मण, जन कृष्णमूर्ति, वेंकैया नायडू, लालकृष्ण आडवाणी राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह, अमित शाह और वर्तमान जगत प्रकाश नड्डा इस महान दल के अध्यक्ष बने। बीजेपी ने राष्ट्रवाद के साथ गाँधीवादी समाजवाद को भी अपनाया। 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद प्रधानमंत्री इन्द्रागाँधी की हत्या हो गई।
तत्पश्चात राजीव गाँधी को सहानुभूति लहर में कांग्रेस के रूप में 404 लोकसभा सीटों पर विजय मिली और भारतीय जनता पार्टी को मात्र 2 सीटों पर ही विजय हासिल हुई जिसमें पहली सीट मेहसाणा (गुजरात) के एके पटेल और दूसरी सीट आन्ध्रप्रदेश की स्वामकोडा सीट से चन्दू भाई पाटिया जगन रेड्डी को प्राप्त हुई। तब से भारतीय जनता पार्टी निरन्तर विस्तार करती हुई 2014 और फिर 2019 के चुनाव में 303 और पूरे गठबन्धन को 353 सीटें प्राप्त हुई हे। इस प्रकार कांग्रेस के बाद बीजेपी पहली ऐसी पार्टी है जो पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई है। 2014 में 543 लोकसभा सीटों में 282 सीटें बीजेपी को मिली थी जो 2019 में बढ़ कर 303 हुई हैं।
बीजेपी को 2014 में वोट प्रतिशत 31' था जो बढ़ कर 2019 में 37.36' हो गई। एनडीए के साथ इसका संयुक्त वोट प्रतिशत 45' तथा वोटर संख्या 60.37 करोड़ तक पहुंच गई है। 2019 में बीजेपी 437 स्थानों पर चुनाव लड़ी थी। 10 राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों में बीजेपी अकेले दम पर सभी सीटें जीती। कुल 12 राज्यों में 50' से अधिक मत प्राप्त हुये। इस चुनाव में जातीय वंशवाद एवं परिवारवाद के नारा के संकेत मिले। आज बीजेपी भारतीय संसद और राज्य विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व के मामलों में यह भारत की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी है और प्राथमिक सदस्यता के मामले में यह पूरे विश्व का सबसे बड़ा राजनैतिक दल है।
बीजेपी अब 42 वर्ष से भी अधिक पुरानी पार्टी के रूप में अपने संगठन, इतिहास, विचारों, राजनीति और नेताओं व सदस्यों के कारण एक महान राजनैतिक दल के रूप में विश्वविख्यात हो चुकी है। इसके सम वैचारिक संगठनों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भारतीय जनता युवा मोर्चा से नये युवाओं का सदैव सहयोग सदस्यता तथा नया उत्साह प्राप्त होता रहता है। इस दल की उपलब्धियाँ अनेकों है जो भारत के गौरव को बढ़ाने वाली है। आज इस दल की लोकप्रियता भारत में चरम पर है। इस दल का जनसमर्थन लगातार बढ़ रहा है। भाजपा ने 1989 में 85, 1991 में 120 तथा 1996 में 161 सीटें मिली जो इस बात का प्रमाण है कि लगातार यह दल तीव्र गति से लोकप्रिय होता गया। 1998 में इस दल ने 182 लोकसभा सीटों पर विजय प्राप्त की जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में जनतांत्रिक गठबन्धन की सरकार बनी थी। 1996 में पर्याप्त समर्थन न मिलने के कारण सरकार 13 दिन के बाद ही गिर गई थी यद्यपि अटल बिहारी वाजपेयी के उस समय के अन्तिम भाषण की याद आज पूरे राष्ट्र को है। बीजेपी की विशेषता यह है कि यह सुदृढ़, सशक्त, समृद्ध, समर्थ एवं स्वावलम्बी भारत के निर्माण हेतु सक्रिय रहती है। इसके पास कर्मठ, ईमानदार तथा चरित्रवान कार्यकत्र्ताओं व नेताओं की भरमार है। पार्टी की कल्पना एक ऐसे राष्ट्र की है जो आधुनिक दृष्टिकोण से युक्त एक प्रगतिशील एवं प्रबुद्ध समाज का प्रतिनिधित्व करता है तथा प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं सांस्कृतिक मूल्यों से प्रेरणा लेते हुये महान विश्व शक्ति एवं विश्व गुरु के रूप में विश्व पटल पर स्थापित हो। इसके साथ ही विश्व शान्ति तथा न्याययुक्त अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को स्थापित करने के लिये विश्व के राष्ट्रों को प्रभावित करने की क्षमता रखे। भारतीय संविधान में निहित मूल्यों और सिद्धान्तों के प्रति निष्ठा पूर्वक कार्य करते हुए लौकतान्त्रिक व्यवस्था पर आधारित राज्य को यह दल अपना आधार मानती है।
पोखरण परमाणु विस्फोट, राममन्दिर निर्माण में व्यापक सहयोग तथा आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी सहित भूमिपूजन, अनुच्छेद-370 की समाप्ति तथा सफलतापूर्वक कश्मीर को उग्रवादियों से मुक्त कराने के प्रयास, उरी सर्जिकल स्ट्राइक, सेना को विस्तारित कर उसे स्वावलम्बी बनाने का सफल प्रयास, कोरोना काल में देश को बचाने हेतु टीकाकरण का विश्व कीर्तिमान, समाज व्यवस्था के साथ बड़ी संख्या में गरीबों को मुफ्त राशन, विश्व स्तरीय सड़कों का संजाल, सीएए विधान को पास कराकर उससे उपजे आन्दोलनों पर काबू पाना, तलाक व्यवस्था की समाप्ति आदि ऐसे कार्य हैं जो भारतीय जनमानस पर अपनी अमिट छाप छोड़ चुके हैं। इसके अतिरिक्त भी भारतीय जनमानस को ऐसे सभी कई कार्य योजनाएं, दंगा रहित प्रदेश, अपराधियों पर अंकुश, स्वास्थ्य योजना आदि कार्य हैं जो जनमानस में दल के लिए विश्वास उत्पन्न करते हैं।
आज कुठ बातें यदि इस दल के समर्थन में साथ में हैं तो कुछ बाधाएं ऐसी हैं कि पार्टी के विस्तार में बाधा भी मानी जाती हैं। जैसे पार्टी मुख्य रूप से हिन्दी प्रदेशों यानी उत्तर भारत में अधिक लोकप्रिय है परन्तु केरल, तमिलनाडु, पं0 बंगाल, पंजाब, काश्मीर, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे स्थानों पर यह अपना प्रभाव नहीं बढ़ा पा रही है। यद्यपि इन स्थानों पर विचारधारा और सिद्धान्त भी भाजपा के लिए अनुकूल नही है। कही परिवारवाद, वंशवाद प्रभुत्व में है तो कहीं जनसंख्या अनुपात उचित नहीं है। कहीं-कहीं वामपंथ बाधक है तो कहीं क्षेत्रवाद और भाषा बाधक बन रही है। क्षेत्रीय दल अपने निहित स्वार्थों के कारण पहले से प्रदेशों में सत्तारूढ़ है।बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ऐसे ही प्रदेशों में राजनैतिक संपर्क कर के विपक्षी एकता कस्वर साध रहें है. ऐसी परिस्थिति में भाजपा अपने विस्तार को नया पंख दे कर विस्तार की नई योजना बना रही हैं। वर्तमान में ऐसे प्रदेश जहां ठीक से भाजपा अपना संगठन नहीं खड़ा कर सकी थी, वहां युद्ध स्तर पर संगठन खड़ा कर रही है। संसदीय दल में बड़ा परिवर्तन कर सभी को प्रतिनिधित्व दिया गया है। मंत्रिमण्डल विस्तार में भी सभी को साथ लिया गया है।जे पि नद्दा का कार्यकाल एक वर्ष बढ़ा कर उन्हें दक्षिण भारत में बीजेपी की पैठ बढाने को कहा गया है .अमित शाह स्वयं बिहार के सीमान्त क्षेत्र पूर्णिया का दौरा कर के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को यह सन्देश देने का प्रयास कर रहें है की बीजेपी को सबका साथ और सबका विश्वास चाहिए . मोदी की लोकप्रियता इस समय सर्वोच्य शिखर पर है . वे विश्वव्यापी राजनैतिक व्यक्तित्व के शिखर पर अपने को स्थापित कर चुके हैं.देश की जनता इस उपलब्धि पर गर्व का अनुभव कर रही है.ममता बनर्जी की पार्टी भ्रष्टाचार के चक्रव्यूह में फसी दिखाई पड रही हैं. तेजस्वी  जेल जाने के मुहाने पर बैठे हुए हैं. पंजाब और राजस्थान में आप और कांग्रेस सर्कार अपने ही चक्रव्यूह में फसी दिखाई पद रही है .सम्पूर्ण घटनाक्रम को जनता बैचैनी के साथ मूल्यांकन कर रही है.विपक्षी एकता बनाने में कई बाधाएं आ रही है .पी .ऍफ़ आई . पर प्रतिबन्ध लगने के उपरांत मुस्लिम तुष्टीकरण के बयान दे कर अपने पैर में कुल्हाड़ी मार रहें हैं.पुर्वोत्तर के राज्यों में बीजेपी अपनी पैठ बना चुकी है . केरल और तमिलनाडु बीजेपी के लिए अभी भी कठिन लग रही है .आन्ध्र और तेलंगाना में स्थिति पहले की अपेक्षा अच्छी हुई है.यदि कार्यकर्ताओं का मनोबल बढाया गया तो परिणाम आचे मिल सकतें है.
आशा है कि आगामी दिनों में पार्टी संघटन को  नया आयाम दे कर 2024 का चुनाव् परिणाम  पूर्ण बहुमत से प्राप्त करेगी।
                       *-लेखक वरिष्ठ लेखक व विश्व संवाद केंद्र, लखनऊ, के सचिव हैं |

 

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Friday, 29 July 2022

स्व जागरण में हिंदी पत्रकारिता का योगदान

 स्व जागरण में हिन्दी पत्रकारिता का योगदान

अशोक कुमार सिन्हा
'हिन्दी, हिन्दू हिन्दुस्थान' का नारा देश के 'स्व' जागरण एवं स्वतन्त्रता आन्दोलन के लिये प्रसिद्ध राष्ट्रवादी पत्रकार, शिक्षा विद, राजनेता एवं स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी पं0 मदन मोहन मालवीय जी ने दिया था। यह नारा इतना प्रसिद्ध हुआ कि आज तक इसका प्रयोग हो रहा है। देश की हिन्दी पत्रकारिता देश में  'स्व'  जागरण तथा स्वतन्त्रता आन्दोलन की ध्वजवाहिका रही है और आजादी के पचहत्तर वर्ष पूर्ण होने के की बाद भी इसकी महत्ता बनी रहेगी। देश में आज भी प्रिन्ट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा सोशल मीडिया देश के, स्वनागरण में पूरी निष्ठा से रत है यही कारण है कि चाहे पूरे देश में राष्ट्रवाद देशप्रेम और  'स्व' जागरण का कार्य एक साथ सम्भव हो रहा है। बाबू विष्णुराव राव पराड़कर जी ने कहा था कि ''परतन्त्रता विष नदी मांगल्यविध्वंसिनी''। अन्याय, अज्ञान, प्रपीडऩ और प्रवंचना के संहारक हिन्दी के ही पत्र-पत्रिकाएँ अग्रज भूमिका में रही है। स्वतन्त्रता आन्दोलन से ले कर आज तक 'स्व' जागरण के महायज्ञ में हिन्दी पत्रकारिता की डाली गई आहुति सतत स्मरणीय रहेगी और आज भी सार्थक भूमिका निभा रही है। पत्रकारिता जनभावना की अभिव्यक्ति रही है। स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय कहा जाता था कि:-
खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो।
जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।।
भारत की हिन्दी पत्रकारिता ने जनमानस की भाव लहरियों पर अद्भुत प्रभाव डालने का कार्य किया है। स्वतन्त्रता के 75वें वर्ष में प्रवेश करने के बाद भी आज यह अनन्त यात्रा जारी है। बस रूप परिवर्तित हुआ है। भाव वही बना हुआ है। 'स्व' जागरण हेतु महार्षि अरविन्द, भूपेन्द्र नाथ दत्त, डॉ. एनी बेसेन्ट, बाल गंगाधर तिलक, प. मदन मोहन मालवीय, गणेश शंकर विद्यार्थी और महात्मा गान्धी जैसे महापुरुषों ने राष्ट्र के 'स्व' जागरण हेतु समाचार पत्रों से अपना सम्बन्ध रखा। राष्ट्रीय चेतना के अन्तर्गत मातृभूमि का स्तवन, स्वदेश गौरव-गान, अतीत चिन्तन, राष्ट्रीय जागरण, वीर प्रशस्ति, संघर्ष, 'स्व' से, प्रेम, यवनो के प्रति घृणा, स्वदेशी का प्रचार, समाज सुधार, राष्ट्रभाषा के विषय हिन्दी पत्रकारों के प्रिय विषय होते थे। महर्षि अरविन्द घोष ने कहा था कि राजनैतिक स्वतन्त्रता राष्ट्र की प्राण वायु है और इसकी अवज्ञा कर के सामाजिक सुधार, नैतिक उत्थान और 'स्व' का जागरण असम्भव है। हिन्दी पत्रकारिता ने न केवल जनमानस में 'स्व' की भावना भरी वरन जागरण कर के संघर्ष का वातावरण निर्माण किया। तभी अंग्रेजों ने भारत छोड़ा। उदन्त मार्तण्ड, बंगदूत, समाचार सुधावर्षण, बनारस अखबार, पयामे आजादी एक जुट हो कर जनजागरण और स्वतन्त्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है का नारा लगाया। संवाद कौमुदी, दैनिक आज, रणभेरी, कविवचन सुधा, भारत मित्र जैसे समाचारपत्रों ने नवजागरण और भारतीयता तथा स्वदेशी का उद्घोष किया। पत्रकारों में बालकृष्ण भट्ट, प्रताप नारायण मिश्र राधा चरण गोस्वामी, प्रेमधन, अम्बिकादत्त व्यास, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, लाल-बाल-पाल की तिकड़ी ने जनजागरण में प्राण फूंक दिया था। बच्चा-बच्चा स्वदेशी का गीत गाने लगा। स्वतन्त्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे पा कर रहेगें- भारतवासियों के सर पर चढ़ कर बोलने लगा। कालाकांकर से और बाद में प्रयागराज से प्रकाशित 'हिन्दुस्तान' मे संस्कृति और स्वदेश के प्रति जागरूक बनाया। बाबू विष्णुराव पराड़कर के लेखों पर अंग्रेजों को सेंसरशिप लगानी पड़ी। बालमुकुन्द गुप्त, अम्बिका प्रसाद वाजपेयी, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपतराय, गणेश शंकर विद्यार्थी, जैसे उग्र राष्ट्रवादी पत्रकारों को ने देश के अन्दर 'स्व' का इतना प्रचण्ड लहर पैदा कर दिया कि अंग्रेजो के दांते खट्टे हो गये। लोकमान्य तिलक के सन्देशों को जन-जन तक पहुंचाने के लिये पूजा से प्रकाशित केसरी का हिन्दी संस्करण को पं. माधवराव सपे्र ने 13 अप्रैल 1907 को नागपुर से निकाला। मराठी केसरी के विभिन्न लेखों का हिन्दी अनुवाद कर के हिन्दी केसरी में प्रकाशित किया जाता था। प्रयागराज से प्रकाशित 'स्वराज' नामक साप्ताहिक के सम्पादक शान्ति नारायण भटनागर को 'स्व' जागरण के अपराध में जेल जाना पड़ा। काशी की नागरी प्रचारिणी पत्रिका (1897) तथा सरस्वती (1900) ने अपने साहित्यिक स्वरूप से स्वदेशी और हिन्दी भाषा के अलख को जगाये रखना।
महात्मा गान्धी के स्वाधीनता आन्दोलन, असहयोग आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन तथा भारत छोड़ो आन्दोलन को नवजीवन, हरिजन, युगान्तर बन्दे मातरम्, नवशाक्ति संध्या, अभ्युदय, कर्मयोगी, मर्यादा, आज, प्रताप, स्वतन्त्र भारत, अर्जुन, वर्तमान कर्मवीर, हिन्दू पंच, सुधा, विशाल भारत आदि बसों हिन्दी पत्र में राष्ट्रीय चेतना में परिवर्तित कर दिया।
बाबूराव विष्णु पराड़कर ने 1943 में काशी से 'संसार' नामक पत्र का प्रकाशन किया। दैनिक आज के प्रधान सम्पादक रहे तथा 'रणभेरी' नामक गुप्त पत्र निकाल कर काशी सहित पूर्वाचंल में स्वतन्त्रता आन्दोलन में जन जागरण करते रहे। मराठी मूल के होते हुए इन्होंने हिन्दी भाषा के लिये अतुलनीय कार्य किया। 'स्व' जागरण हेतु इन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था। माखनलाल चतुर्वेदी मूलतः: कवि एवं पत्रकार थे। वे कहते थे कि युग के घटनाओं के नियंत्रक, संचालक, आलोचक और लेखक को ही पत्रकार कहते हैं। नवीन युग का निर्माण करना भी पत्रकार की जिम्मेदारी है।
समाज में 'स्व' के जागरण हेतु अर्वाचीन युग बहुत ही सार्थक एवं निष्ठावान रहा। अब धारणा है कि पत्रकारिता मिशन से व्यवसाय हो गया है। मेरा मानना है कि पत्रकारिता का व्यवसाय से जुडऩा युग धर्म है। कोई स्वरूप समाज में स्थाई नहीं रहता। युग बदलने पर स्वरूप भी, अवश्य बदलेगा। स्वतन्त्रता काल में पत्रकारिता शस्त्र एक शस्त्रशाला दोनो थी पत्रकारिता। स्वतन्त्रता के समय पत्रकारों एवं वकीलों की अहम भूमिका थी। आज की पत्रकारिता भी जनजागरण के कार्य में उसी निष्ठा से रत है। राष्ट्रवाद का इतनी तेजी से प्रचार-प्रसार एवं भारतीय समाज का संगठित होना इस बात का प्रमाण है। राजस्थान में कन्हैयालाल के गर्दन काटने और अमरावती में हृदय विदारक घटना के प्रति समाज को खड़ा करने में पत्रकारिता एवं सोशल मीडिया की अहम भूमिका रही। जैसे स्वतन्त्रता युग में चौरी-चौरा काण्ड और जलियांवाला बाग की घटना को पूरे विश्व में पत्रकारिता के माध्यम से विस्तारित किया गया। उसी प्रकार आज भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में टी0वी0 और सोशल मीडिया अपनी भूमिका को उसी प्रकार सटीकता के साथ उठा रहा है। राम जन्मभूमि, कृष्ण जन्मभूमि, ज्ञानवापी में शिव मन्दिर प्रकरण के साथ-साथ ताजमहल, कुतुब मीनार, लखनऊ के लक्ष्मण टीला पर समाज के 'स्व' को जगाने का कार्य जनसामान्य के साथ हिन्दी मीडिया पूरी निष्ठा के साथ कर रही है।
मीडिया जनता के प्रतिनिधि होने के साथ साथ गूंगी जनता के मुखर वकील की भूमिका आज भी निभा रही है। पत्रकारिता के साथ राष्ट्रीय जागरण का लम्बा इतिहास जुड़ा हुआ है। मीडिया ने 1947 के समय भी यह सिद्ध किया था कि स्वतन्त्रता मात्र एक मनोभाव, विचार या नारा नहीं वरन जीवन जीने की बुनियादी शर्त है। ये इतना बड़ा मूल्य है कि उसके लिये आप प्राणों की बाजी भी लगा सकते हैं। कुछ भी गंवा सकते है। पत्रकारिता ने हमें वह मूल्य दिया है। यही भाव इस समय समाज को राष्ट्रभाव के जागरण में हिन्दी पत्रकारिता सहित सभी भारतीय भाषाओं में हो रहा है। पत्रकार विद्वान नहीं विद्यावान होता है। हमारी परम्परा रही है कि विद्वान में थोड़ा सा प्रभुता बोध होता है जब कि विद्यावान में विनम्रता। जब आप में विनम्रता होती है तो लक्ष्य प्राप्ति में बाधाएँ कम आती है।
आज की पत्रकारिता आधुनिक जीवन का विश्वकोष बन गई है। अकेले उत्तर प्रदेश से 42 समाचारपत्र असहयोग आन्दोलन के समर्थन में निकले थे। जनता के लिये काम करना पत्रकारिता का महत्वपूर्ण कार्य बन गया है। ऐसा नहीं था कि पुराने समय में पत्रकारिता उद्योग नहीं था। स्वदेश, स्वराज औ स्वाजागरण को पत्रकारिता ने अपना लक्ष्य बना लिया था। आज भी पत्रकारिता में राष्ट्रवाद की भावना जनता के सम्मान की रक्षा तथा उसकी समस्याओं को सुलझाने में मीडिया की भूमिका अहम है। सूचना के अधिकार ने इस 'स्व' के जागरण में एक अहम भूमिका निभाई है। हिन्दी भाषी क्षेत्र से प्रकाशित, प्रसारित और सोशल मीडिया के सहयोग से जनसहभागिता स्व का निर्धारण तथा उसके प्रति नवजागरण का कार्य करने के लिये मीडिया धन्यवाद की पात्र है।
(लेखक विश्व संवाद केन्द्र लखनऊ के प्रमुख, पत्रकारिता के अध्यापक तथा पूर्व प्रशासनिक अधिकारी हैं।)

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Friday, 8 April 2022

अटर प्रदेश चुनाव: जीता सबका विश्वास

 

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