Friday, 28 February 2025

संघ का प्रचार विभाग

संघ का प्रचार विभाग: एक परिचय         अशोक कुमार सिन्हा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना भारत के नागपुर में वर्ष 1925 में डा. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी । संघ स्थापना का मूल उद्देश्य सम्पूर्ण हिंदू समाज का संगठन एवं व्यक्ति निर्माण करना था । चरित्रवान,अनुशासित,राष्ट्रभक्त समाज खड़ा करना चाहता है संघ ।हिंदू समाज का अर्थ है सम्पूर्ण समाज जो भारत को अपना देश ,अपनी मातृ/ पितृ भूमि मानता हो , उसकी परंपराओं के प्रति , उसके ऐतिहासिक महापुरुषों के प्रति , देश की सुरक्षा और उसके समृद्धि के प्रति,जिनकी अव्यभिचारी एवं एकान्तिक निष्ठा हो -वे जन हिंदू व राष्ट्रीय कहे जायेंगे, चाहे उनकी उपासना पद्धति अलग अलग ही क्यों न हो ।संघ उस समाज को भी संगठित करना चाहता है जो टेक्नीकली भारत का नागरिक बन कर रहना चाहते हैं ।वे सब हिंदू ही कहे जाएँगे । हिंदू ही इस राष्ट्र का सबसे अधिक जिम्मेदार नागरिक है क्यों कि इस देश का भाग्य और भविष्य हिंदुओं से ही जुड़ा हुआ है । हिंदू यह नाम है राष्ट्र का । वह राष्ट्र का रूप और प्राण है । हिंदुओं का संगठन अर्थात राष्ट्रीय संगठन ।संघ का उद्देश्य अपने इस भारत को दुनिया का एक सर्वश्रेष्ठ देश बनाना है ।ज्ञान विज्ञान ,अर्थ एवं सुरक्षा की दृष्टि में यह देश स्वावलंबी , अजेय और संपन्न हो । इसी कामना से प्रतिदिन शाखा के माध्यम से संघ व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन का कार्य करता है । संघ का स्वयंसेवक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संगठन खड़ा कर के सेवा का कार्य करता है ।

          संघ अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे करने जा रहा है । संघ स्थापना काल के समय जो परिस्थितियाँ थी उनमें समय -समय पर बदलाव होते रहे । संघ पहले प्रचार परांमुख था । देश सेवा ,समाज सेवा और मातृभक्ति को वह प्रचार का विषय नहीं मानता है । आज भी वह समस्त समाजसेवा के कार्य को सम्पूर्ण समाज के सहयोग से ही करता है अतः प्रचार कर के श्रेय अकेले संघ नहीं लेना चाहता है। कार्य करने से जो स्वयं प्रसिद्धि प्राप्त हो वही प्रचार है । जितना कार्य उसकी ही प्रसिद्धि समाज में हो , यही उचित है। इसी लिए संघ अनावश्यक प्रचार न करते हुए कार्य करने में विश्वास रखता है । परंतु संघ की बढ़ती प्रगति , कार्य व लोकप्रियता से अनेक लोगों के आँख की किरकिरी भी यह संगठन बना । जो शक्तियाँ देश विदेश में भारत को संगठित और शक्तिशाली होते नहीं देखना चाहती थीं, उनके नज़र में संघ भी खटकने लगा । देश के अंदर भी जिनके राजनैतिक हित, वोट बैंक और तुष्टिकरण के उपर संकट आने लगा , वे अपने भी संघ के उपर आरोप लगाने लगे । वामपंथियों ने तो लगातार संघ के उपर प्रहार करना जारी रक्खा।संघ पर देश में तीन बार प्रतिबंध लगे परंतु संघ हर बार सत्य की परीक्षा में उबरा और उसपर से प्रतिबंध लगाने वालो ने ही प्रतिबंध हटाया । संघ के समक्ष कई बार परिस्थितियां बदली ।देश का विभाजन हुआ , कई बार देश पर विदेशी आक्रमण हुए , समाज को बाँटने का प्रयत्न हुआ , घुसपैठ, मतांतरण , लव जिहाद , दंगे, रामजन्मभूमि आंदोलन ,इतिहास का विकृतिकरण , आपातकाल का दंश और हिंदू समाज पर अनेकों प्रहार हुए । प्राकृतिक आपदाएं आई परंतु संघ अविचल देश और समाज की सेवा में लगा रहा और समाज को सचेत करते हुए उसे संगठित करने का कार्य करता रहा । देश के उपर के आए हर संकट पर संघ समाज के साथ कंधे से कंधा मिला कर डटा रहा । अपने अपर लगे आरोपों का समय समय पर प्रतिउत्तर भी देता रहा । 

       भूमण्डलीकरण के कारण संचार व्यवस्था में क्रांति आई । 1948 में बालेश्वर अग्रवाल नामक एक स्वयंसेवक ने संघ के सहयोग से हिन्दुस्थान समाचार नामक एन न्यूज़ एजेंसी खड़ा किया ।उस समय संघ छोटा था , धनाभाव था परंतु हिन्दुस्थान समाचार की तकनीकी सबसे अच्छी थी । हिंदी में सत्य समाचारों का प्रेषण होने लगा । फिर प्रिंट मीडिया आई, समाचार पत्र आया , दृश्य संवाद आया । जानता तक पहुँच बढ़ी । रेडियो , दूरदर्शन , TV, इंटरनेट का युग आया।मोबाइल युग आया और आज देश में 120 करोड़ लोगों से अधिक के पास इंटरनेट मोबाइल है। सोशल मीडिया युग में आर्टिफीसियल इंटेलजेंस का प्रवेश हो चुका है ।समाज प्रबोधन में संघ ने भी इन सब साधनों का प्रयोग किया है ।

       संघ ने भी अपने संगठन में परिवर्तन किया है । शताब्दी वर्ष आते- आते 6 कार्य विभाग क्रमशः शारीरिक,बौद्धिक,व्यवस्था,संपर्क , सेवा एवं प्रचार विभाग कार्यरत हैं। 8 गतिविधियों में क्रमशः कुटुंब प्रबोधन ,गो सेवा, समग्र ग्राम्य विकास,सामाजिक समरसता,धर्म जागरण , सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण और मुख्य मार्ग विस्तार । 43 सम वैचारिक संगठन जो 6 समूहों में विभाजित किए गए हैं यथा वैचारिक,शिक्षा,आर्थिक , सामाजिक , सेवा एवं सुरक्षा समूह के अंतर्गत आते हैं । डेढ़ लाख से अधिक सेवा कार्य सम्पूर्ण देश में स्वयंसेवकों एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा संचालित हैं ।उनहत्तर हज़ार से अधिक स्थानों पर दैनिक प्रातः एवं सायं शाखाएं लगतीं है। सैतीस हज़ार साप्ताहिक मिलन, सत्रह हज़ार मासिक मिलन,व मंडली संचालित हैं। सम्पूर्ण विश्व को पाँच भागों में विभक्त कर विदेशों में तीन हज़ार से अधिक स्थानों पर भारतीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू स्वयंसेवक संघ नाम से विदेश विभाग शाखाएं संचालित कर रहा है।संघ के शताब्दी वर्ष में पंचप्रण नामक पंचमुखी कार्य योजना कार्यान्वित की जा रही है जो क्रमशः सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण , स्वदेशी भाव जागरण एवं नागरिक कर्तव्य के रूप में संचालित है। इसके अतिरिक्त विमर्श एवं सज्जन शक्ति संपर्क, समन्वय भाव जागरण का भी कार्य सम्पादित किया जा रहा है।

       रामजन्मभूमि आंदोलन के समय 1992 में अयोध्या में ग्राउंड जीरो से सम्पूर्ण विश्व को त्वरित समाचार हिंदी और अंग्रेजी में उपलब्ध कराने के उद्येश्य से प्रथम विश्व संवाद केंद्र स्थापित किया गया था जो बाद में लखनऊ में ट्रस्ट के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया था । आज ऐसा ही विश्व संवाद केंद्र 35 की संख्या में सम्पूर्ण भारत के सभी प्रदेशों में अपनी भवनों में स्थापित एवं संचालित हैं।यहाँ से विभिन्न पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन ,प्रेस वार्ता, नारद जयंती, विभिन्न महापुरुषों की जयंतियाँ, पत्रकार मिलन एवं सम्पर्क, गोष्ठियां आदि संचालित हो रहें है।

         संघ के छ कार्य विभाग के अंतर्गत प्रचार विभाग की जो स्थापना सम्पूर्ण भारत में की गई है उसका आज भी उद्देश्य राष्ट्रीय विचारों का प्रसार करना ,राष्ट्र विरोधी विभाजनकारी अलगाववादी शक्तियों के प्रति समाज में जागरूकता निर्माण और हिंदुत्व की सकारात्मक बातें, तथ्यात्मक जानकारी मीडिया के माध्यम से समाज तक पहुंचाना है। प्रचार विभाग का कार्य संघ का प्रचार करना या किसी व्यक्ति का प्रचार करना नहीं है। संघ की कार्य पद्दति ही प्रचार है । 

          प्रचार की जो पद्धति अपनायी जाती है उनमें प्रमुख हैं :- सोशल एवं इलेट्रानिक मीडिया के उपलब्ध माध्यमों का उपयोग,अपनी समानांतर प्रचार व्यवस्था खड़ा करना ,जहाँ कार्य नहीं वहाँ विचार पहुँचाने के उद्देश्य से जागरण पत्र/पत्रिकाओं का प्रकाशन,पांचजन्य एवं ऑर्गनाइज़र जैसी राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं का प्रकाशन,साहित्य विक्री, कंटेंट जेनरेशन,नागरिक पत्रकारिता प्रशिक्षण,मीडिया संवाद के अंतर्गत पत्रकारों की मीडिया प्रोफ़ाइल तैयार करना,मीडिया के मालिकों से ले कर रिपोर्टरों तक का नाम पता ईमेल,फ़ोन,और उनके विचारों की जानकारी रखना,मीडिया संपर्क का तंत्र विकसित करना, पत्रकारिता के छात्रों से संपर्क व संवाद ,टी वी पैनल डिस्केशंस में अपना विचार रखने वाले कार्यकर्ता का निर्माण करना,नारद जयंती आयोजित कराना,पत्रकारों के लिए संघ परिचय वर्ग तथा मीडिया कॉनक्लेव आयोजन ,संघ के बड़े उत्तरदायित्व धारी अधिकारियों के प्रवास के समय पत्रकारों से उनके निवास या कार्यस्थल पर सम्पर्क कराना ,स्तंभ लेखकों ,संपादकों , ब्लॉगरों, पोर्टल संचालकों से संपर्क , साहित्योसव मनाना, फ़िल्म महोत्सव का आयोजन करना , शाखा / नगर स्तर तक प्रचार दायित्वधारी बनाना , तथा प्रचार कार्यालयों की स्थापना , संसाधन, टेक्नोलॉजी , आर्थिक व्यवस्था , क़ानूनी व्यवस्था तथा प्रचार के सभी 

 की टोली खड़ी करना व वार्षिक कैलेंडर बनाना ।

       प्रचार विभाग के नौ आयाम तथा प्रांत स्तर तक आयाम प्रमुखों को दायित्व सौपना भी प्रचार विभाग का कार्य है । ये नौ आयाम है क्रमशः जागरण पत्रिका, सोशल मीडिया,स्तंभ लेखक,फ़िल्म , कार्यालय व्यवस्था,साप्ताहिक पत्रिका,साहित्य विक्री,कंटेंट जेनेरेशन तथा मीडिया संवाद ।

      अखिल भारतीय स्तर से ले कर नगर स्तर तक सम्पूर्ण भारत में प्रचार प्रमुख का गठन है । प्रांत स्तर पर डाटा बैंक , आर्काइव्स प्रकोष्ठ स्थापना , पुस्तकालयों की स्थापना , मीडिया मानेटरिंग का कार्य , पेपर कटिंग , समाचार तथा सूचनाओं का प्रेषण , फोटोग्राफी व वीडियो कैमरों का संचालन कार्य संपन्न होता है । यथा आवश्यकता वीडियो एवं साउंड स्टूडियो भी संचालित है। कम्युनिटी रेडियो स्टेशन का भी संचालन अपेक्षित रहता है।रेडियो जॉकी से भी संपर्क तथा उन्हें सांस्कृतिक , महापुरुषों की जीवनियाँ आदि उपलब्ध कराया जाता है।टीवी सीरियल निर्माता , फ़िल्म निर्माताओं , फ़िल्म निर्देशकों , फ़िल्म लेखकों आदि से भी सम्पर्क कर के उनको देशभक्ति पूर्ण निर्माण एवं लेखन के प्रति प्रेरणा देने का अनुरोध किया जाता है । फ़िल्मों में भी भारतीय विचारमूल्य दिखे यह अनुरोध रहता है।इन सब कार्यों के लिए अपने कार्यकर्ताओं को बराबर कार्यशालाओं के माध्यम से प्रशिक्षित भी किया जाता है।आज प्रचार कार्यकर्ता पर्यावरण, स्वच्छता,दिव्यांग कल्याण्, नारी स्वाभिमान जागरण,सांस्कृतिक मूल्यों का पुनर्जागरण में सहायता, सहभागिता कर रहा है। 

                        लेखक विश्व संवाद केंद्र लखनऊ के सचिव तथा उत्तर प्रदेश प्रांतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी हैं।


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संघ का प्रचार विभाग-एक परिचय

संघ का प्रचार विभाग: एक परिचय         अशोक कुमार सिन्हा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना भारत के नागपुर में वर्ष 1925 में डा. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी । संघ स्थापना का मूल उद्देश्य सम्पूर्ण हिंदू समाज का संगठन एवं व्यक्ति निर्माण करना था । चरित्रवान,अनुशासित,राष्ट्रभक्त समाज खड़ा करना चाहता है संघ ।हिंदू समाज का अर्थ है सम्पूर्ण समाज जो भारत को अपना देश ,अपनी मातृ/ पितृ भूमि मानता हो , उसकी परंपराओं के प्रति , उसके ऐतिहासिक महापुरुषों के प्रति , देश की सुरक्षा और उसके समृद्धि के प्रति,जिनकी अव्यभिचारी एवं एकान्तिक निष्ठा हो -वे जन हिंदू व राष्ट्रीय कहे जायेंगे, चाहे उनकी उपासना पद्धति अलग अलग ही क्यों न हो ।संघ उस समाज को भी संगठित करना चाहता है जो टेक्नीकली भारत का नागरिक बन कर रहना चाहते हैं ।वे सब हिंदू ही कहे जाएँगे । हिंदू ही इस राष्ट्र का सबसे अधिक जिम्मेदार नागरिक है क्यों कि इस देश का भाग्य और भविष्य हिंदुओं से ही जुड़ा हुआ है । हिंदू यह नाम है राष्ट्र का । वह राष्ट्र का रूप और प्राण है । हिंदुओं का संगठन अर्थात राष्ट्रीय संगठन ।संघ का उद्देश्य अपने इस भारत को दुनिया का एक सर्वश्रेष्ठ देश बनाना है ।ज्ञान विज्ञान ,अर्थ एवं सुरक्षा की दृष्टि में यह देश स्वावलंबी , अजेय और संपन्न हो । इसी कामना से प्रतिदिन शाखा के माध्यम से संघ व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन का कार्य करता है । संघ का स्वयंसेवक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संगठन खड़ा कर के सेवा का कार्य करता है ।

          संघ अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे करने जा रहा है । संघ स्थापना काल के समय जो परिस्थितियाँ थी उनमें समय -समय पर बदलाव होते रहे । संघ पहले प्रचार परांमुख था । देश सेवा ,समाज सेवा और मातृभक्ति को वह प्रचार का विषय नहीं मानता है । आज भी वह समस्त समाजसेवा के कार्य को सम्पूर्ण समाज के सहयोग से ही करता है अतः प्रचार कर के श्रेय अकेले संघ नहीं लेना चाहता है। कार्य करने से जो स्वयं प्रसिद्धि प्राप्त हो वही प्रचार है । जितना कार्य उसकी ही प्रसिद्धि समाज में हो , यही उचित है। इसी लिए संघ अनावश्यक प्रचार न करते हुए कार्य करने में विश्वास रखता है । परंतु संघ की बढ़ती प्रगति , कार्य व लोकप्रियता से अनेक लोगों के आँख की किरकिरी भी यह संगठन बना । जो शक्तियाँ देश विदेश में भारत को संगठित और शक्तिशाली होते नहीं देखना चाहती थीं, उनके नज़र में संघ भी खटकने लगा । देश के अंदर भी जिनके राजनैतिक हित, वोट बैंक और तुष्टिकरण के उपर संकट आने लगा , वे अपने भी संघ के उपर आरोप लगाने लगे । वामपंथियों ने तो लगातार संघ के उपर प्रहार करना जारी रक्खा।संघ पर देश में तीन बार प्रतिबंध लगे परंतु संघ हर बार सत्य की परीक्षा में उबरा और उसपर से प्रतिबंध लगाने वालो ने ही प्रतिबंध हटाया । संघ के समक्ष कई बार परिस्थितियां बदली ।देश का विभाजन हुआ , कई बार देश पर विदेशी आक्रमण हुए , समाज को बाँटने का प्रयत्न हुआ , घुसपैठ, मतांतरण , लव जिहाद , दंगे, रामजन्मभूमि आंदोलन ,इतिहास का विकृतिकरण , आपातकाल का दंश और हिंदू समाज पर अनेकों प्रहार हुए । प्राकृतिक आपदाएं आई परंतु संघ अविचल देश और समाज की सेवा में लगा रहा और समाज को सचेत करते हुए उसे संगठित करने का कार्य करता रहा । देश के उपर के आए हर संकट पर संघ समाज के साथ कंधे से कंधा मिला कर डटा रहा । अपने अपर लगे आरोपों का समय समय पर प्रतिउत्तर भी देता रहा । 

       भूमण्डलीकरण के कारण संचार व्यवस्था में क्रांति आई । 1948 में बालेश्वर अग्रवाल नामक एक स्वयंसेवक ने संघ के सहयोग से हिन्दुस्थान समाचार नामक एन न्यूज़ एजेंसी खड़ा किया ।उस समय संघ छोटा था , धनाभाव था परंतु हिन्दुस्थान समाचार की तकनीकी सबसे अच्छी थी । हिंदी में सत्य समाचारों का प्रेषण होने लगा । फिर प्रिंट मीडिया आई, समाचार पत्र आया , दृश्य संवाद आया । जानता तक पहुँच बढ़ी । रेडियो , दूरदर्शन , TV, इंटरनेट का युग आया।मोबाइल युग आया और आज देश में 120 करोड़ लोगों से अधिक के पास इंटरनेट मोबाइल है। सोशल मीडिया युग में आर्टिफीसियल इंटेलजेंस का प्रवेश हो चुका है ।समाज प्रबोधन में संघ ने भी इन सब साधनों का प्रयोग किया है ।

       संघ ने भी अपने संगठन में परिवर्तन किया है । शताब्दी वर्ष आते- आते 6 कार्य विभाग क्रमशः शारीरिक,बौद्धिक,व्यवस्था,संपर्क , सेवा एवं प्रचार विभाग कार्यरत हैं। 8 गतिविधियों में क्रमशः कुटुंब प्रबोधन ,गो सेवा, समग्र ग्राम्य विकास,सामाजिक समरसता,धर्म जागरण , सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण और मुख्य मार्ग विस्तार । 43 सम वैचारिक संगठन जो 6 समूहों में विभाजित किए गए हैं यथा वैचारिक,शिक्षा,आर्थिक , सामाजिक , सेवा एवं सुरक्षा समूह के अंतर्गत आते हैं । डेढ़ लाख से अधिक सेवा कार्य सम्पूर्ण देश में स्वयंसेवकों एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा संचालित हैं ।उनहत्तर हज़ार से अधिक स्थानों पर दैनिक प्रातः एवं सायं शाखाएं लगतीं है। सैतीस हज़ार साप्ताहिक मिलन, सत्रह हज़ार मासिक मिलन,व मंडली संचालित हैं। सम्पूर्ण विश्व को पाँच भागों में विभक्त कर विदेशों में तीन हज़ार से अधिक स्थानों पर भारतीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू स्वयंसेवक संघ नाम से विदेश विभाग शाखाएं संचालित कर रहा है।संघ के शताब्दी वर्ष में पंचप्रण नामक पंचमुखी कार्य योजना कार्यान्वित की जा रही है जो क्रमशः सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण , स्वदेशी भाव जागरण एवं नागरिक कर्तव्य के रूप में संचालित है। इसके अतिरिक्त विमर्श एवं सज्जन शक्ति संपर्क, समन्वय भाव जागरण का भी कार्य सम्पादित किया जा रहा है।

       रामजन्मभूमि आंदोलन के समय 1992 में अयोध्या में ग्राउंड जीरो से सम्पूर्ण विश्व को त्वरित समाचार हिंदी और अंग्रेजी में उपलब्ध कराने के उद्येश्य से प्रथम विश्व संवाद केंद्र स्थापित किया गया था जो बाद में लखनऊ में ट्रस्ट के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया था । आज ऐसा ही विश्व संवाद केंद्र 35 की संख्या में सम्पूर्ण भारत के सभी प्रदेशों में अपनी भवनों में स्थापित एवं संचालित हैं।यहाँ से विभिन्न पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन ,प्रेस वार्ता, नारद जयंती, विभिन्न महापुरुषों की जयंतियाँ, पत्रकार मिलन एवं सम्पर्क, गोष्ठियां आदि संचालित हो रहें है।

         संघ के छ कार्य विभाग के अंतर्गत प्रचार विभाग की जो स्थापना सम्पूर्ण भारत में की गई है उसका आज भी उद्देश्य राष्ट्रीय विचारों का प्रसार करना ,राष्ट्र विरोधी विभाजनकारी अलगाववादी शक्तियों के प्रति समाज में जागरूकता निर्माण और हिंदुत्व की सकारात्मक बातें, तथ्यात्मक जानकारी मीडिया के माध्यम से समाज तक पहुंचाना है। प्रचार विभाग का कार्य संघ का प्रचार करना या किसी व्यक्ति का प्रचार करना नहीं है। संघ की कार्य पद्दति ही प्रचार है । 

          प्रचार की जो पद्धति अपनायी जाती है उनमें प्रमुख हैं :- सोशल एवं इलेट्रानिक मीडिया के उपलब्ध माध्यमों का उपयोग,अपनी समानांतर प्रचार व्यवस्था खड़ा करना ,जहाँ कार्य नहीं वहाँ विचार पहुँचाने के उद्देश्य से जागरण पत्र/पत्रिकाओं का प्रकाशन,पांचजन्य एवं ऑर्गनाइज़र जैसी राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं का प्रकाशन,साहित्य विक्री, कंटेंट जेनरेशन,नागरिक पत्रकारिता प्रशिक्षण,मीडिया संवाद के अंतर्गत पत्रकारों की मीडिया प्रोफ़ाइल तैयार करना,मीडिया के मालिकों से ले कर रिपोर्टरों तक का नाम पता ईमेल,फ़ोन,और उनके विचारों की जानकारी रखना,मीडिया संपर्क का तंत्र विकसित करना, पत्रकारिता के छात्रों से संपर्क व संवाद ,टी वी पैनल डिस्केशंस में अपना विचार रखने वाले कार्यकर्ता का निर्माण करना,नारद जयंती आयोजित कराना,पत्रकारों के लिए संघ परिचय वर्ग तथा मीडिया कॉनक्लेव आयोजन ,संघ के बड़े उत्तरदायित्व धारी अधिकारियों के प्रवास के समय पत्रकारों से उनके निवास या कार्यस्थल पर सम्पर्क कराना ,स्तंभ लेखकों ,संपादकों , ब्लॉगरों, पोर्टल संचालकों से संपर्क , साहित्योसव मनाना, फ़िल्म महोत्सव का आयोजन करना , शाखा / नगर स्तर तक प्रचार दायित्वधारी बनाना , तथा प्रचार कार्यालयों की स्थापना , संसाधन, टेक्नोलॉजी , आर्थिक व्यवस्था , क़ानूनी व्यवस्था तथा प्रचार के सभी 

 की टोली खड़ी करना व वार्षिक कैलेंडर बनाना ।

       प्रचार विभाग के नौ आयाम तथा प्रांत स्तर तक आयाम प्रमुखों को दायित्व सौपना भी प्रचार विभाग का कार्य है । ये नौ आयाम है क्रमशः जागरण पत्रिका, सोशल मीडिया,स्तंभ लेखक,फ़िल्म , कार्यालय व्यवस्था,साप्ताहिक पत्रिका,साहित्य विक्री,कंटेंट जेनेरेशन तथा मीडिया संवाद ।

      अखिल भारतीय स्तर से ले कर नगर स्तर तक सम्पूर्ण भारत में प्रचार प्रमुख का गठन है । प्रांत स्तर पर डाटा बैंक , आर्काइव्स प्रकोष्ठ स्थापना , पुस्तकालयों की स्थापना , मीडिया मानेटरिंग का कार्य , पेपर कटिंग , समाचार तथा सूचनाओं का प्रेषण , फोटोग्राफी व वीडियो कैमरों का संचालन कार्य संपन्न होता है । यथा आवश्यकता वीडियो एवं साउंड स्टूडियो भी संचालित है। कम्युनिटी रेडियो स्टेशन का भी संचालन अपेक्षित रहता है।रेडियो जॉकी से भी संपर्क तथा उन्हें सांस्कृतिक , महापुरुषों की जीवनियाँ आदि उपलब्ध कराया जाता है।टीवी सीरियल निर्माता , फ़िल्म निर्माताओं , फ़िल्म निर्देशकों , फ़िल्म लेखकों आदि से भी सम्पर्क कर के उनको देशभक्ति पूर्ण निर्माण एवं लेखन के प्रति प्रेरणा देने का अनुरोध किया जाता है । फ़िल्मों में भी भारतीय विचारमूल्य दिखे यह अनुरोध रहता है।इन सब कार्यों के लिए अपने कार्यकर्ताओं को बराबर कार्यशालाओं के माध्यम से प्रशिक्षित भी किया जाता है।आज प्रचार कार्यकर्ता पर्यावरण, स्वच्छता,दिव्यांग कल्याण्, नारी स्वाभिमान जागरण,सांस्कृतिक मूल्यों का पुनर्जागरण में सहायता, सहभागिता कर रहा है। 

                        लेखक विश्व संवाद केंद्र लखनऊ के सचिव तथा उत्तर प्रदेश प्रांतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी हैं।

उन

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Friday, 15 September 2023

इंडिया की जगह भारत बोलें

 

इंडिया की जगह भारत बोलें  

                  अशोक सिन्हा

      भारत देश  को स्वतन्त्र हुए 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में देश अमृत महोत्सव मना  रहा है | इस अवसर पर देशवासियों ने स्वावलंबन, “स्व” की पहचान को बढ़ावा देने वाले प्रतीकों को प्राथमिकता देना और आत्मनिर्भरता की शपथ ली है|गुलामी के चिन्हों को हटा कर आत्मगौरव जगाया जा रहा है | ऐसे समय पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक श्री मोहन भागवत जी ने देशवासियों का आह्वान किया है कि हमें दैनिक व्यवहार में india  के स्थान पर अपने देश के प्राचीन नाम भारत का ही अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए| यह आह्वान सर्वथा समीचीन और सार्थक है | स्वतंत्रता के बाद भारतीय संस्कृति.सभ्यता, और सनातन धर्म की अत्यधिक उपेक्षा हुई है | संविधान निर्माण के समय इस देश का एक ही नाम रखा जाय इस पर बहुत बहस हुई थी| अधिकाँश की राय थी की भगवान् ऋषभदेव के पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर (स्कन्द पुराण,अद्ध्याय 37) इस देश का नाम भारत पड़ा अतः संविधान में देश का नाम  भारत ही रक्खा जाय | इस बात का समर्थन करने वाले सेठ गोविन्द दास,कमलापति त्रिपाठी ,कल्लूर  सुब्बा राव,,राम सहाय और हरगोविंद पन्त प्रमुख सदस्य थे | बाबा भीमराव आम्बेडकर जी ने भी बहुत अच्छी बहस की | इस अवसर पर सभा को अवगत कराया गया कि india नाम कोई बहुत पुराना नाम नहीं है |वेदों में तथा  पुराणों में कहीं  इसका जिक्र नहीं है | इसका प्रयोग यूनानियों, और अंग्रेजों ने देश की पहचान धूमिल करने हेतु  प्रारम्भ किया था | इसमें  भारत की आत्मा नहीं झलकती है|परन्तु अनेक तर्कों के बाद भी संविधान के अनुक्षेद एक में India that is Bharat लिखा गया | यह नामकरण निहित दृष्टिकोण से किया गया | अब भारत के स्वतन्त्र हुए 75 वर्षों का कालखंड बीत गया है  और आज भी कुछ लोग भारत जैसे प्राचीन नाम के स्थान पर  India नाम को अधिक प्रयोग करते हुए अपने को गौरवान्वित अनुभव कर रहें हैं | ऐसे लोग भूल जातें है की यह युग भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण  का काल है |हम गुलामी के हर चिन्ह को मिटाना चाहतें है

 

 व्याकरण के अनुसार विशिष्ठ नाम ( प्रॉपर नाउन ) का अनुवाद नहीं होता है |जैसे किसी व्यक्ति का नाम हजारा सिंह हो तो उसे इंग्लिश में  थाउजेंडा सिंह नहीं कहेंगे ,क्यों की यह उसका विशिष्ठ नाम है |उसे अंग्रेजी भाषा में भी  Hajara Singh ही लिखा जायेगा | इसी प्रकार धर्म को भी अंग्रेजी भाषा में Dharma ही लिखा जाता है | देश के नाम में यही सूत्र काम  करता है | अमेरिका को English में भी America ही कहते हैं| जापान को English में भी Japan ही कहते हैं| भूटान को English में भी Bhutan ही कहते हैं| श्रीलंका को English में भी Sri Lanka ही कहतेहैं, बांग्लादेश को English में भी Bangladesh ही कहतें और बोलते है | नेपाल को English में भी Nepal ही कहते हैं, पाकिस्तान को English में भी Pakistan ही कहते हैं| फिर भारत को English में India क्यों कहते हैं? Oxford Dictionary के पृष्ठ नं० 789 पर लिखा है Indian जिसका मतलब ये बताया है old-fashioned & criminal peoples अर्थात् पिछडे और घिसे-पिटे विचारों वाले अपराधी लोग। अत: इण्डिया (India) का अर्थ हुआ असभ्य और अपराधी लोगों का देश। भारत माता तथा भारतीयों का अपमान करने के लिए विदेशियों ने भारत को India  नाम रखा था। इससे देश में भ्रम उत्पन्न हुआ और हम स्व से दूर होते गए | फलतः  भारत के तीन नाम प्रचालन में आ गए 1- भारत 2- हिंदुस्तान  3- India.

भारत नाम  की प्राचीनता के कई प्रमाण प्राचीन ग्रंथो में उपलब्ध है | विष्णु पुराण में वर्णन आया है :-

 उत्तरम् यत् समुद्रस्य, हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।

 वर्षं तद् भारतम् नाम, भारती यत्र संतति:।।

                                   - विष्णु पुराण 2.3.1

अर्थात्: समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो देश स्थित है उसका नाम "भारत" है और उसकी संतानें यानी उसके निवासी "भारती" कहे जाते हैं|

 

विष्णु पुराण के दूसरे खंड के तीसरे अध्याय के 24वें श्लोक के अनुसार-

 

गायन्ति देवाकिल गीतकानिधन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयपुरूषा सुरत्वात्

अर्थ है- देवता हमेशा से यही गान करते हैं कि, जिन्होंने स्वर्ग और अपवर्ग के बीच में बसे भारत में जन्म लिया, वो मानव हम देवताओं से भी अधिक धन्य हैं.

महाभारत के आदिपर्व में दूसरे अध्याय के श्लोक 96 के अनुसार -

शकुन्तलायां दुष्यन्ताद् भरतश्चापि जज्ञिवान
यस्य लोकेषु नाम्नेदं प्रथितं भारतं कुलम्

अर्थ है- राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत के नाम से यह भरतवंश संसार में प्रसिद्ध हुआ.  दुष्यंत और शकुंलता की प्राचीन प्रेम कहानी बहुत प्रचलित है. राजा दुष्यंत और शकुंतला के बेटे के नाम भरत पर ही देश का नाम भारत पड़ा

 

भागवत पुराण के अध्याय में एक श्लोक के अनुसार-

येषां खलु महायोगी भरतो ज्येष्ठश्रेष्ठगुण
आसीद् येनेदं वर्षं भारतमिति व्यपदिशन्ति

अर्थ है कि- भगवान ऋषभ को अपनी कर्मभूमि अजनाभवर्ष में 100 पुत्र प्राप्त हुए थे, जिनमें उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र महायोगी भरत को अपना राज्य दिया.कहा जाता है कि इन्हीं के नाम से देश का नाम भारतवर्ष पड़ा.

इसके साथ ही अन्य पुराण जैसे स्कंद पुराण, ब्रह्मांड पुराण, अग्नि पुराण और मार्कंडेय पुराण आदि में भी भारत नाम का उल्लेख  मिलता है. यही कारण है कि, आज भी जब हिंदू धर्म में कोई भी पूजा या अनुष्ठान होते हैं तो इसकी शुरुआत में जब संकल्प लिया जाता है तो इसमें भारत के कई प्राचीन नामों का उच्चारण किया जाता है. जैसे जम्बू द्वीपे भारत खंडे आर्यावर्ते आदि , लेकिन इन नामों में इंडिया का जिक्र नहीं आता है | हम भारत माता की जय का उद्घोष बड़े गर्व से करते है | यह नारा स्वतंत्रता संग्राम का नारा है | गाँधी जी ने भारत छोड़ो का नारा दिया था | हौसला बढ़ने वाले शब्द मन को मजबूत करतें है |

संविधान का पहला अनुच्छेद इन शब्दों के साथ शुरू होता है : इंडिया, दैट इज़ भारत...।इसे भारत दैट इज इंडिया भी लिखा जा सकता है | राष्ट्रगान में भारत भाग्य विधाता  शब्द प्रमुखता से आता है। भारत संचार निगम लिमिटेड, भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड, भारत पेट्रोलियम जैसे दर्जनों उदाहरण हैं। ऐसा नहीं है कि भारत शब्द अचानक ही देश की चेतना में लाया  जा रहा हो। भुबनेश्वर, ओडिशा की हाथीगुम्फा के अभिलेखों में इसके पहले प्रमाण मिलते हैं। कलिंग के राजा खारवेल (50 ई.पू.) के साम्राज्य का वर्णन करते हुए यह अभिलेख कहता है कि अपने शासनकाल के दसवें वर्ष में उन्होंने भारतवर्ष की विजय का अभियान छेड़ा। भारत या भारतवर्ष शब्द से भारतीयों का गहरा भावनात्मक लगाव है और कोई भी इसे ठेस नहीं पहुंचाना चाहेगा। खुद पं. नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में लिखा है कि भारत माता का मतलब है उसके लोग और उसकी जीत का मतलब है उसके लोगों की जीत। अमिताभ बच्चन और वीरेंद्र सहवाग ने  भारत नाम के  पक्ष में  टिप्पणियां कीं। अक्षय कुमार ने अपनी आगामी फिल्म की टैगलाइन बदल ली। लॉजिस्टिक कंपनी ब्लू डार्ट ने बड़ा एलान किया है। कंपनी ने अब अपनी प्रीमियम सेवा डार्ट प्लस का नाम बदलकर भारत प्लस कर दिया है। ब्लू डार्ट कंपनी  ने अपने फैसले की वजह बताते हुए कहा, "यह कदम हमारे उपभोक्ताओं की लगातार विकसित होती जरूरतों के साथ कदमताल करने की प्रक्रिया के लिए लक्षित है।" कंपनी ने कहा कि वह सभी हितधारकों को इस बदलाव वाली यात्रा से जुड़ने का न्योता देती है, जिससे हम भारत को पूरी दुनिया और दुनिया को भारत से जोड़ना जारी रख रहे हैं। प्रधानमंत्री इंडोनेशिया यात्रा पर गए तो अधिकृत घोषणा की गई कि भारत के प्राइम-मिनिस्टर आसियान समिट में शामिल होने जा रहे हैं! 

                                 भारत की प्राचीनता को ध्यान में रखते हुए भारत के सर्वोच्य न्यायालय में इस देश का नाम केवल भारत रखने के लिए एक वाद भी दायर किया गया था जिसको एस. ऐ . बोबडे की अध्यक्षता में तीन जजों की खंड पीठ ने वाद को निरस्त कर दिया था | तर्क यह दिया गया था कि संविधान के अनुसार दोनों ही नाम प्रयोग किया जा सकता है | राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मू ने जी 20 सम्मलेन के अवसर पर सितम्बर २०२३ में  जब रात्रिभोज  के अवसर पर भेजे गए निमंत्रण पत्र पर प्रेसिडेंट ऑफ़ भारत लिखा तब  विपक्ष के दलों ने हंगामा खड़ा किया की देश का नाम बदलने का प्रयास हो रहा है | मोदी I.N.D.I.A. नामक विपक्षी गठबंधन को घृणा करते हैं और उसे तोड़ना चाहतें है | नरेंद्र मोदी ने इसकी बिना परवाह करते हुए समेलन में भारत के प्रधानमंत्री का खूब प्रयोग किया और नाम पट्टिका भी लगाई | पूरे  विश्व में सन्देश गया कि भारत अपने पुराने नाम भारत से ही विश्व में पुकारा जाना पसंद करता है | देश के निवासियों में इस कारण गर्व की अनुभूति हुई और एक नवचेतना का संचार हुआ | आज आवश्यकता इस बात की है कि जनभावना और भारत के “स्व” का पुनर्जागरण करने हेतु हम भारत के लोग इंडिया के स्थान पर आज से केवल भारत नाम का ही प्रयोग करें तथा राजनीतिज्ञों को विवश करें की समय और सामर्थ्य आने पर जनभावना के अनुसार संविधान में संशोधन कर के देश का एक ही नाम भारत करें |

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* लेखक उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी हैं |सम्प्रति विश्व संवाद केंद्र लखनऊ के सचिव |संपर्क :९४५३१४००३८

 

          

 

 

 

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Tuesday, 22 August 2023

एक उत्पाद से अंत्योदय

 

                                                        एक जिला  एक उत्पाद से अन्त्योदय 

                                                                                                                   - अशोक सिन्हा 

समाज के आर्थिक, सामाजिक, एवं राजनैतिक रूप से पिछड़े, गरीब, कमजोर वर्ग का उत्थान हो सके, इस निमित्त सबसे आखिरी व्यक्ति के उत्थान का प्रयास ही अन्त्योदय है। स्व. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के मूल में अन्त्योदय है। सामाजिक एवं आर्थिक विकास के द्वारा कौशल सामाजिक एवं आर्थिक विकास के द्वारा कौशल विकास और अन्य उपायों के माध्यम से आजीविका के अवसरों में वृद्धि करते हुए व्यक्ति का सामाजिक स्तर से ऊपर उठाना इस उद्देश्य की पूर्ति करता है। सबसे गरीब व्यक्ति को सहायता कैसे पहुंचे इसके लिये अनेक सामाजिक एवं राजनैतिक संगठन सक्रिय प्रयास करते रहते हैं। सरकार एवं शासन व्यवस्था भी अपनी ओर से अनेकों योजनाएं चलाते रहते हैं। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस दिशा में गम्भीरता से प्रयास हुए हैं। यह कहना नितान्त उचित होगा। भारत की समृद्धि में लघु एवं कुटीर उद्योगों का सर्वाधिक योगदान रहा है। जब प्रत्येक गांव आत्मनिर्भर था और प्रत्येक गांववासी हुनरमंद होता था तब भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था। भारत का वैभव विश्व में विख्यात था। सम्पूर्ण विश्व से भारत में व्यापारी आकर व्यापार करते थे। ढाका मलमल, केरल के मसाले, कन्नौज का इत्र और एक से बढ़कर कृषि उत्पाद भारत की पहचान होते थे। पूरा विश्व इन वस्तुओं से सम्मोहित था। उस समय अन्त्योदय की आवश्यकता नहीं थी। कालान्तर में जब भारत में आक्रान्ता आये, देश गुलाम हुआ तब लूट और बेकारी बढ़ी। औद्योगिकीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप ही बदल दिया। गांव में हस्तशिल्प का ह्रास हुआ और  परम्परागत उद्योग-धन्धे चौपट हो गये। यह स्थिति गरीबी बढ़ाने वाली हुई। कालांतर में समाज में विभाजन हुआ | श्रम का महत्त्व कम होने लगा और बाबूगिरी, अफसरशाही सम्मानसूचक माने जाने लगे  |कामगार, कृषक, मजदूर वर्ग द्वितीय श्रेणी का नागरिक माना जाने लगा। बेरोजगारी बढ़ी और देश में गरीबी बढ़ी। गरीब देश विश्वगुरु नहीं बन सकता। भारत घर छोड़कर अन्यत्र भटकना नहीं पड़ता है को यदि विश्व का सिरमौर बनना है तो उसे समाज के अन्तिम पायदान पर बैठे हर नौजवान को काम देने का अवसर प्रदान करना होगा तथा हर हुनर को हाट प्रदान करना होगा। इस प्रयास से केवल और केवल सरकारी नौकरी या नौकरी करने की तीव्र दबावयुक्त भावना पर रोक लगेगी और अनावश्यक बेरोजगारी पर अंकुश लगेगा। हाथ को जब काम मिलेगा तब हुनर विकसित होगा और देश की वास्तविक प्रगति होगी। उत्पादन और बाजार के मध्य समन्वय भी बनेगा तथा निर्यात  भी बढ़ेगा । 

उत्तर प्रदेश सरकार ने इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु एक जिला एक उत्पाद योजना को जनवरी २०१८ से लागू किया है, जिसकी भारत ही नहीं विश्व में चर्चा हो चुकी है। राज्य में इससे लाखों युवकों को काम मिला है। तथा राज्य सरकार की ओर से 5 वर्षों में हुनरमंद व्यक्तियों को 26000 रुपये की सहायता भी दी जा रही है । हुनर हाट लगाकर बाजार के अवसर भी प्रदान किए जा रहे हैं। इस योजना का मुख्य उद्देश्य प्रदेश के प्रत्येक जनपद के हस्तकला, हस्तशिल्प एवं विशिष्ठ हुनर को सुरक्षित एवं विकसित करना है। इससे सम्बंधित जनपद में रोजगार सृजन और आर्थिक संमृद्धि का लक्ष्य पूरा हो रहा है | जनपद में  विशिष्ठ उत्पाद के लिए कच्चामाल, डिजाइन, प्रशिक्षण, तकनीकी और बाजार भी उपलब्ध कराया जा रहा है। इससे अत्यन्त छोटे स्तर पर अच्छा लाभ मिलने के साथ परिवार व घर छोड़कर अन्यत्र  भटकना नही पड़ता है | छोटे -छोटे गाँव  भी भारत में अपनी पहचान बना रहे है  | नई तकनिकी से श्रेष्ठ उत्पादन होने लगे हैं और सहज अनुदान, विपणन की सुविधा तथा प्रशिक्षण का कार्य किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश की सफलता को देखरकर देश के 17 राज्यों में 54 इनक्यूकेशन केन्द्र खोले गये हैं। 35 राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों के 707 जिलों को केन्द्रीय खाद्य एवं प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय द्वारा एक जिला एक उत्पाद के लिए अनुमोदित कर दिया गया है। 17 राज्यों में कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, केरल, सिक्किम, आन्ध प्रदेश, उड़ीसा एवं उत्तराखण्ड शामिल है। इन सभी राज्यों में 470 जिला स्तरीय प्रशिक्षण केन्द्र बने हैं।



उपरोक्त उत्पादों को अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता प्रदान की गई है। यह उत्पाद एक ब्राण्ड बने हैं और यह ब्राण्ड यू.पी की पहचान होगी। इस योजना के अन्तर्गत लघु, मध्यम और नियमित उद्योगों को मदद प्रदान की जा रही है। अनुदान व्यवस्था सामान्य सुविधा केन्द्र, विपणन सुविधा, आधुनिक तकनीकी प्रशिक्षण की सुविधा राज्य सरकार उपलब्ध करा रही है। लक्ष्य 25 करोड़ बेरोजगार युवाओं को रोजगार व नौकरी देने का लक्ष्य है और राज्य का सकल घरेलू उत्पादन में उल्लेखनीय उपलब्धि मिल रही है। पारम्परिक उद्योगों की तेजी से स्थापना हो रही है और छोटे-छोटे गांवों का नाम विदेशों में भी पहुंच रहा है। उत्तर प्रदेश की संस्कृति का भी प्रसार हो रहा है। जी-20 के राष्ट्राध्यक्षों को ओ. डी. ओ. पी. देकर प्रधानमंत्री ने भी उत्तर प्रदेश का मान बढ़ाया।


विदेशी मेहमानों को वाराणसी की गुलाकी मीनाकारी कपलिंग्स, गणेश प्रतिमा, बांदा का शजर स्टोन कपलिंग्स, कन्नौज का इत्र, लखनऊ का चिनककारी वस्त्र, मुरादाबादी पीतल बाउल सेट, खुर्जा के कप प्लेट्स, सीतापुर के आसन, बरेली के जरी जरदोजी से बने उपहार, दिये गये जो बहुत पसंद किए गए। अब उ.प्र. के उपहार देश-दुनिया के बड़े निवेशकों के ऑफिस व घरों की शोभा बढ़ा रहे हैं। सरकार के रोड शो इवेंट में अपनी मिट्टी- संस्कृति की सुगंध तभी महका रही है। योगी सरकार लखनऊ के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में इस प्रयास की विश्वव्यापी चर्चा की गई तथा प्रत्यक्ष स्टाल लगे जहाँ दर्शकों की भारी भीड़ जमा थी | संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट में यह उल्लेख हुआ है कि भारत में 13.5 करोड़ जनसंख्या को गरीबी रेखा से ऊपर लाकर विश्व से गरीबी दूर करने का विशेष कार्य किया गया है जो पूरे यूरोप की जनसंख्या से भी अधिक है। यही है अन्त्योदय अब धरातल पर काम दिखने लगा है। यदि देश प्रथम, राष्ट्र प्रथम, संस्कृति प्रथम, व्यक्ति की गरिमा और श्रम का सम्मान प्रथम इस भावना से देश के राजनेता, श्रमिक, नागरिकगण कार्य करेंगे तो अन्त्योदय का सूरज अवश्य चमकेगा। भारत की गरिमा बढ़ेगी और राष्ट्र की विश्व को दिशा देने की क्षमता बढ़ेगी। भारती अति प्राचीनकाल से अपनी श्रमशक्ति, मानव कल्याण और विश्व को एक कुटुम्ब मान कर सर्वहितकारी भावना से कार्य करने के लिए प्रसिद्ध रहा है। पुनः सांस्कृतिक आजादी और पुनर्जागरण का काल आया है। पं. दीनदयाल उपाध्याय के स्वप्न को साकार और सार्थक बनाने का यह अवसर अवश्य देश का मान-सम्मान बढ़ाने वाल सिद्ध होगा।



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Thursday, 8 June 2023

भारतीय संस्कृति का विश्वव्यापी स्वरूप

 भारतीय संस्कृति का विष्वव्यापी स्वरूप

अषोक कुमार सिन्हा
सांस्कृति राष्ट्र की नैसर्गिक इकाई को आज राष्ट्र राज्यों में बांट कर संचरण बाधित कर दिया गया है अतः सांस्कृतिक सजीवता विरल हो गई है। आज भारतीयों की स्थिति यह हो गयी है कि वह स्वयं को पहचाननें में कठिनाई का अनुभव कर रहें हैं। भारत जैसे गौरवषाली राश्ट्र की सर्वकल्यायकारी सनातन संस्कृति की महानता उसके विष्वव्यापी ज्ञान और आध्यात्मिकता के कारण है। षाष्वत सत्य के सतत खोज में भारतीय ऋशि विज्ञानियों ने सम्पूर्ण विश्व में जा कर अपने ज्ञान का अलख जगाया। जिस समय विष्व के अधिकांश देष सभ्यता के विकास की प्रथम सीढ़ी पर थे, उस समय भारत अपनी सभ्यता और संस्कृति के कारण विष्वगुरु माना जाता था। विश्व के कोने-कोने से विद्यार्थीगण भारत में ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने के लिये तक्षषिला, नालन्दा, विक्रमशिला एवं वाराणसी के महान विद्वानों के पास आया करते थे। ऐसे विद्याथियों की ज्ञान पिपासा शान्त करने की क्षमता केवल भारत में थी। एक ओर फाहियान और ह्वेनसांग भारत के विश्वविद्यालयों में विद्याध्ययन के लिये आते थे तब दूसरी ओर यहाँ के आचार्य, ऋशि और विद्वान सुदूर देषों में संस्कृति और धर्म, आध्यात्म का दीप जला रहे थे। भारतीय संस्कृति और धर्म-विज्ञान के प्रचार-प्रसार में अगस्त्य मुनि का नाम विश्व के अन्य भागों में भारत का ज्ञान का दीप जलाने वालों में प्रथम स्थान रखता है। इन्होने दक्षिण पूर्व एशिया के अर्द्धसभ्य राष्ट्रों में ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित करने का कार्य किया। इन्होने दक्षिण भारत से वरुण द्वीप, शंख द्वीप, मलय द्वीप और यव द्वीप सहित अनेक देशों की सांस्कृतिक यात्रा की, जहाँ इनके नाम की षपथ ली जाती है। दीपंकर बुद्ध से जावा, सुमात्रा, सेलिबीज, श्याम और अन्नाम में ज्ञान प्रकाशित हुआ। मौर्य शासक सम्राट अशोक ने पूर्व-पष्चिम, उत्तर-दक्षिण चारों दिशाओं में धर्म प्रचारक भेजे। इसा की मातृभूमि में बुद्ध की शिक्षाएँ अशोक ने पहुँचायीं थी। स्वयं बुद्ध ने साठ अर्हत विभिन्न दिशाओं में धर्म प्रसार के लिये नियुक्त किये थे। इन्ही धर्म प्रचारकों ने हिमालय के किरात लोगों और स्वर्ण भूमि के आग्नेय लोगों के बीच भारतीय संस्कृति व धर्म का बीजारोपण किया। अशोक के पुत्र महेन्द्र तथा पुत्री संघमित्रा ने सिंहल द्वीप के अनुराधपुर नगर मे बोधि वृक्ष की शाखा रोपी। जावा और सुमात्रा में नालन्दा शिक्षित धर्मपाल ने अपने शिश्य शीलभद्र व धर्मकीर्ति के साथ संस्कृति व धर्म पताका लहरायी। 65 ई. में कष्यप, मतंग और धर्मरत्न ने तथा बुद्धभद्र ने चीन में ज्ञान का दीपक जलाया। कुमारजीव का नाम संस्कृत और चीनी भाशा के प्रकाण्ड विद्वान के रूप में चीन में जाना जाता है। सार्वभौम मस्तिश्क का सिद्धान्त चीनी दर्शन को भारत की देन है। 372 ई. में बौद्ध धर्म चीन से कोरिया पहुँचा और वहीं से भारतीय संस्कृति का प्रवेष जापान में हुआ। मंगोलिया का सम्बन्ध भारत से ईसा के आठवीं षताब्दि में जुड़े। प्रज्ञा नामक भारतीय विद्वान ने संस्कृति का बौद्ध ग्रन्थों का मंगोल भाषा में अनुवाद किया। नालन्दा प्रशिक्षित पद्मसम्भव ने तिब्बत में 30 वर्श प्रवास किया और नागरिक व धार्मिक कानून बनाये। विक्रमषिला विष्वविद्यालय प्रषिक्षित दीपषंकर श्रीज्ञान ने नेपाल, तिब्बत, भूटान, सिक्किम और भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में, जीवन, आचार-विचार, व्यवहारों और भारतीय संस्कृति से प्रमाणित किया। नेपाल ने अपने को हिन्दू राश्ट्र घोशित किया।
    बगदाद के खलीफा हारुल-रषीद के प्रषासन में भारतीय संस्कृति के प्रवाह से बगदाद का दरबार आप्लावित था। बरभक नामक वहाँ के वजीर भारतीय वैद्यों को बुला कर बगदाद में वैद्य के पदों पर नियुक्त करते थे। अरब विद्यार्थियों को वे भारत पढ़ने के लिये भेजते थे। भारत से गणित व संगीत को अरब लोगों ने ही यूरोप पहुँचाया। पंचतंत्र की कहानियाँ भी उन्ही के द्वारा विदेशों में पहुँची। भारत ही वह महान देष है जिसने विश्व को उपनिषदों और भगवत गीता का ज्ञान दिया। भारत में गुप्त साम्राज्य की प्रस्थापना होने से पहले ही भारत के जलयान पश्चिमी एशिया के अनेक भागों की यात्रा करते रहते थे। मुख्य रूप से पष्चिमी देशों की ओर से बसरा को भारत का प्रवेश द्वार माना जाता था। बहुमूल्य रत्नों, मोतियों, रजत, स्वर्ण के साथ अनेक उपयोगी वस्तुओं का व्यापार भारत की ओर से किया जाता था। ईसा की पहली दो शताब्दियों में पेत्रा नामक स्थान भारतीय वाणिज्यिक व्यापारिक वस्तुओं के विक्रय का प्रमुख केन्द्र था। दजला और फरात नामक दो नदियों के संगम पर बसा हुआ ‘उबला’ नामक नगर भारतीय वस्तुओं के खरीद का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था। म्यानमार, स्याम, कम्बोडिया, हिन्द चीन, जावा, मेडागास्कर, अरब, पुर्तगाल, समुद्रमार्ग से भारतीयों ने सभ्यता और संस्कृति का प्रचार-प्रसार करने वाले नौचालक वर्ग से जुड़े भारतीय ही थे। दक्षिण में, चोल राजाओं की राजधानी कावेरीपट्टनम एक सुप्रसिद्ध बन्दरगाह था और राजेन्द्र चोल ने मलय द्वीप पर विजय प्राप्त कर भारतीय संस्कृति का व्यापाक प्रसार किया। चम्पा द्वीप से भारतीय सीधे चीन पहुँचते थे। चीन में हुवाई षान के नाम से प्रसिद्धि पाने वाले भारतीय भिक्षु हरिचन्द ने ईसा की पाँचवी शताब्दी में चीन हो कर मेक्सिको की यात्रा की थी।
    हरिचन्द अपने षिश्यों के साथ भरतीय ज्ञान, आध्यात्म की ज्योति जगा कर वृद्धावस्था में पुनः चीन आ गये। उन्होने योरोपवासियों से पूर्व ही अमेरिका की खोज कर ली थी। इस यात्रा का वर्णन एडवर्ड पी0 विनिंग नामक विदेषी लेखक ने ‘अज्ञात कोलम्बस’ षीर्शक से किया है। अफगानिस्तान, नेपाल, तिब्बत, खोतान, मंगोलिया, श्रीलंका, म्यान्मार, थाईलैण्ड, कम्बोडिया, चम्पा जावा, बाली, बोर्नियो, चीन, जापान आदि अनेकानेक देषों में गणपति गणेष की पूजा अर्चना होती रही है। इण्डोनेषिया की मुद्रा या नोटों पर आज भी गणेष का चित्र अंकित रहता है। स्वर्ण भूमि एयरपोर्ट पर समुद्रमथंन की सोने की बड़ी सी मूर्ति बनी है। श्रीलंका में रामायण का 7150 वर्श पुराना सम्बन्ध है। रामसेतु उसका जीवित प्रमाण है।
    हिन्दू जीवन मूल्यों का प्रसार रामायण और रामकथा के माध्यम से लगभग 7 हजार 150 वर्शों से अधिक पुराना है। राम के प्रमाण रूस, इजिप्ट, से ले कर वियतनाम तक विस्तारित हैं। कोरिया जापान का सीधा सम्बन्ध अयोध्या राज्य से है। अयोध्या की राजकुमारी का विवाह कोरिया के षासक किम से हुआ था। आज भी भारत के साथ-साथ राम के जीवनवृत्त से सम्बन्धित षिलापट्ट विदेषों के पुरातत्व सर्वेक्षकों के लिये आष्चर्य का विशय है। सुप्रसिद्ध इतिहासवेत्ता बी.यस. वाकणकर द्वारा मिश्र से तीसरी षताब्दी में ब्राह्मी लिपि के एक षिलालेख को खोज निकालने से वहाँ वैदिक हिन्दू संस्कृति की विद्यमानता की पुश्टि होती है। यह षिलालेख मिश्र की राजधानी काहिरा के संग्रहालय में आज भी सुरक्षित है। अबीसीनिया में बड़ी संख्या में कुशाणकालीन स्वर्ण मुद्राएँ प्राप्त हुई है। इतिहासकार अलबरूनी ने लिखा है कि खुरासान, फारस, इराक, मोसुल और सीरिया तक बौद्ध धर्म का बहुत अधिक प्रचार-प्रसार हो चुका था। सिख मत के प्रणेता गुरुनानक देव जी सन 1518 में अपने दो षिश्यों बाला और मरदाना के साथ सूरत से अरब देष गये। उनकी स्मृति में अदन में आज भी एक मन्दिर विद्यमान है। वे जेद्दा, मक्का भी गये थे, बगदाद, हलीब, तेहरान, इस्फान, तुर्किस्तान, ताषकन्द बुखारा, समरकन्द और अफगानिस्तान की यात्राएँ भी की और इस्लाम के गढ़ में जा कर भारत की सांस्कृतिक दिग्विजय का झण्डा गाड़ा था। भारत का विचार चिन्तन एवं संस्कृतियाँ श्रेश्ठ है लेकिन जब तक हम सामाजिक स्तर पर संगठित नहीं होंगे तब तक संस्कृतियों का संरक्षण एवं उत्थान सम्भव नहीं है। सभी पुरातन संस्कृतियाँ एक दूसरे का सम्मान करें परन्तु रुपान्तरण के दबाव से मुक्त रहें। यही भारतीय परम्परा है। पारिवारिक संस्कार, प्रकृति के प्रति आदर भाव और उनके संरक्षण के माध्यम से हमे पूरे विष्व में सार्थक बने। मानवता के लिये सुखोन्मुखी विचार के कारण विष्व में भारतीय विचार की व्यापकता रही। आज संसार में 3500 वर्श पुरानी ऋग्वेद की प्रति उपलब्ध है। नीति, सिद्धान्त, कर्म आध्यात्म का आज जितना भी साहित्य उपलब्ध है, वह इन वर्शों के बाद का है। संसार भर के भाषा विज्ञानियों ने यह स्वीकार कर लिया है और दुनिया की एकमात्र वैज्ञानिक भाषा संस्कृत है। ब्रिटिष संग्राहल में ब्रिटेन में एक चौखट जैसा स्तम्भ है जिसमें नाग, स्वास्तिक और मयूर के चिन्ह है। एक अन्य पत्थर पर स्वास्तिक और अश्टदल कमल उत्कीर्ण है। स्वास्तिक और मयूर भारतीय चिन्ह है जो केवल वैदिक मन्दिरों में हो सकते हैं जो प्रमाण है कि ईसा पूर्व ब्रिटेन में वैदिक संस्कृति और मन्दिर हुआ करते थे। रोम और इटली के प्राचीन इतिहास की लगभग प्रत्येक पुस्तक में ‘वेस्टा’ मन्दिरों का जिक्र है जो विश्णु से सम्बन्धित हैं। इसे समझने के लिये ‘क्यूमंट’ की विष्व प्रसिद्ध पुस्तक रोमन सम्राटों की धारणाएँ (स्ष्म्जमतदपजम कमे म्उचमतंअतष्े त्वउंदे 1896) के पृश्ठ 442 महत्वपूर्ण है जिसमें लिखा है कि रोमन सम्राटों की धारणाएँ तथा उनके राजकुलों में होने वाली विधि भारतीय राकुलों जैसी ही थी। वेद कहते हैं ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ पूरा विष्व एक परिवार है। अफ्रीका की जुलू परम्पराएँ भी कहती हैं ‘उबुन्टू’ मानव एक है। दक्षिण अफ्रीका का आर्य समाज आन्दोलन इसी उबुन्टू भावना के साथ खड़ा होकर कार्य कर रहा है। संकल्पमंत्र कहता है कि ‘‘जम्बूद्वीपे भारत खण्डे आर्यावर्तेकदेषे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे बौद्धावताराय।’’ हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म एक वृक्ष की दो षाखाओं की तरह हैं। इसी तरह नाग पूजा की विधि भारतीय धर्म तन्त्र के साझा सूत्र हैं। नाग पूजा पूरे विष्व में होती है। ब्राह्मण और ब्राह्मण देवताओं का नाग से नाता बहुत बड़ा है। जल के साथ नाग का सम्बन्ध भारत की सीमाओं से भी परे जाता है। बाली जैसे द्वीपों सहित बासुकी या नाग वासुकी को जल देवता वरुण का सहयोगी माना जाता है।
आत्मवत सर्व भूतेशु
परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीड़नम।।
    हमारे पास स्वाभाविक रूप से यह अनुभव और विचार है कि सभी भगवान उस एक ही दिव्य सत्य के अनेक रूप है जो पूरे जगत में अन्तर्भूत है। संस्कृति उन सब गुणों का समूह है जिन्हें मनुष्य शिक्षा तथा प्रत्यत्नों द्वारा प्राप्त करता है जिसके आधार पर मनुष्य का व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन विकसित होता है। भारतीय संस्कृति ने पूरे विश्व को इसी आधार पर विविधता और व्यापकता तथा समन्वय से प्रभावित किया है। भारतीय संस्कृति ज्ञान प्रधान संस्कृति है:-
ईशावाश्यमिदं सर्व यत किन्चजगत्यां जगत।
तेन त्यक्तेन भुंजीयाः मा गृधः कास्यस्वित घनम्।।
    दुनियाँ में जो भी जीवन है, सब ईश्वर से भरा हुआ है। कोई चीज ईष्वर से खाली नही हैं। यहाँ केवल उसी की सत्ता है। वही सबका मालिक है। यह समझ कर हमें सब उसी को समर्पण करना चाहिये, और जो कुछ उसके पास से मिले उसे प्रसाद समझ कर ग्रहण करना चाहिये। यहाँ मेरा कुछ भी नही, सब ईश्वर का है। यही विचार/ज्ञान इशोपनिषद देता है। धर्म, कर्म, आत्मा, पुर्नजन्म हिन्दुत्व, आश्रम, मोक्ष मातृपूजा भारतीय जीवन के मूल तत्व है। पूरा विश्व इस ज्ञान से पूर्व में प्रभावित होता रहा है। अनेक कष्टों, कुविचारों के परिणाम देख पुनः विश्व भारत की ओर देख रहा है।
- लेखक विश्व संवाद केन्द्र लखनऊ के सचिव एवं पूर्व प्रशासनिक अधिकारी हैं।From Blogger iPhone client